बस्तर पुलिस संदिग्ध संगठनों को उपलब्ध करवा रही अनाधिकृत सूचनायें

बस्तर के पुलिस अफसर बेलगाम, सिविल सेवा आचरण नियमावली का कर रहे उल्लंघन

भूमकाल समाचार @ बस्तर

बस्तर में पुलिस के आचरण को लेकर कई बार सवाल खड़े होते रहे हैं | कई मामलों में पुलिस पर बलात्कार और हत्या तक के आरोप लगे हैं | ऐसे मामले अब सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों के माध्यम से न्यायालय की चौखट तक पहुँचने शुरू हो गए हैं | लेकिन जब पुलिस के वरिष्ठ अफसरों का व्यवहार भी जनता के प्रतिकूल हो जाए तो इसे आप क्या कहेंगे | सरकार द्वारा बार-बार यह गाइड लाइन जारी की जाती है कि आपको कैसे जनता के साथ व्यवहार करना है | इस लोकतांत्रिक देश में सरकारी सेवकों को अपना आचरण दुरुस्त रखने नियमावली भी बनाया गया है | किन्तु अक्सर देखा गया है कि इस नियमावली का पूर्ण रूप से पालन नहीं हो पा रहा है | जिसके कारण आम जनता में सरकार के प्रति रोष उत्पन्न होता है |

श्री के सन्‍थानम की अध्‍यक्षता में गठित भ्रष्‍टाचार निरोधक समिति की सिफारिशों के आधार पर लोक सेवाओं में सत्‍यनिष्‍ठा बनाए रखने की दृष्टि से सरकारी कर्मचारियों के आचरण नियमों को संशोधित किया गया था और कर्मचारियों के लिए आचार संहिता बनाते हुए केन्‍द्रीय सिविल सेवाएं (आचरण) नियमावली, 1964 अधिसूचित की गई । केन्‍द्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियमावली, 1964 का द्विभाषिक संस्‍करण 1986 में प्रकाशित किया गया था और तब से अब तक इसका कोई संस्‍करण प्रकाशित नहीं हुआ है । इसी बीच नियमों के कई उपबंध संशोधित किए गए हैं और अनेक स्‍पष्‍टीकरण भी जारी किए गए हैं ।

सिविल सेवा आचरण नियमावली के अनुसार तत्परता और शिष्टाचार के विषय में स्पष्ट उल्लेखित है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी अपने सरकारी कर्तव्‍यों के निष्‍पादन में अशिष्‍ट व्‍यवहार नहीं करेगा | जनता से अथवा अन्‍यथा अपने सरकारी कार्य व्‍यवहार में कोई विलंबकारी युक्ति नहीं अपनाएगा और न ही उसे दिए गए कार्य को करने में जान-बूझकर देरी करेगा । लेकिन जगदलपुर के पुलिस अधीक्षक राजेन्द्र नारायण दाश ने यह कदाचार भी किया | पत्रकार प्रभात सिंह ने एक आम नागरिक की हैसियत से दिनांक 07 सितम्बर 2016 को फोन कर जानकारी चाही कि आपके अधीनस्थ दरभा थाना प्रभारी कौन हैं | तो शिष्टाचार से  सवाल का जवाब देना छोड़ पुलिस अधीक्षक राजेन्द्र नारायण दाश ने उल्टे प्रभात सिंह से उनका पद नाम पूछा और साथ ही अपने संपर्क नंबर कहाँ से मिला की जानकारी पूछने लगे | सारी जानकारी लेने बाद कहने लगे की “मेरा यह नम्बर किसने दिया, जाओ जैसे मेरा यह नंबर मिला है वैसे ही दरभा थाना प्रभारी का नंबर खोजकर पता लगा लो |” जबकि उनका यह फोन नंबर बस्तर के कई संगठनों के व्हाट्स एप्प ग्रुप में लम्बे समय से अनाधिकृत रूप से जुड़ा हुआ है | अंदाजा लगा सकते हैं कि बस्तर में जो पुलिस अधिकारी पत्रकारों से ऐसा व्यवहार कर रहे हैं  वे क्या आम जनता से ठीक से व्यवहार करते होंगे |

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प्रभात सिंह द्वारा 07 सितम्बर 2016 को किये गए कॉल रिकार्ड का स्क्रीनशॉट

सिविल सेवा आचरण नियमावली, 1964 के नियम 11 के अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी अनाधिकृत सुचना सम्प्रेषण नहीं कर सकता है | इस बात का उल्लेख गृह मंत्रालय कार्यालय ज्ञापन संख्‍या 24/54/58-स्‍थापना तारीख 12 अप्रैल, 1954 में वर्णित हैं  | जिसके अनुसार कोई भी सरकारी कर्मचारी कोई भी ऐसा दस्‍तावेज या सूचना जो उसे सरकारी ड्यूटी पर काम करने के दौरान मिली हो, प्रत्‍यक्ष रूप से अन्‍य सरकारी कर्मचारियों या गैर सरकारी व्‍यक्तियों तक नहीं पहुंचा सकता है । किन्तु जगदलपुर के पुलिस अधीक्षक ने उस फोन कॉल पर प्रभात सिंह द्वारा मिली सुचना को उनके करीबी और बस्तर पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति व्हाट्स एप्प में शेयर करने वाले एक संदिग्ध संगठन बस्तर संघर्ष समिति के अध्यक्ष फारुख अली को प्रेषित कर दिया |

जिसके बाद फारुख अली ने उसी 07 सितम्बर की रात करीब साढ़े 11 बजे प्रभात सिंह को अप्रत्यक्ष रूप से उस सुचना का उल्लेख करते हुए सवाल-जवाब किया | साथ ही प्रभात सिंह को आपत्तिजनक सन्देश उनके मोबाइल नंबर पर फारुख अली ने भेजे | फोन में बातचीत के दौरान  “भाई” और  “यार” जैसे शब्दों का इस्तेमाल फारुख अली ने किया है | जबकि प्रभात सिंह फारुख अली से कभी मिले ही नहीं तो फिर ऐसे शब्दों के इस्तेमाल पर ही उन्होंने सवाल उठाया है | फोन पर रात के साढ़े 11 बजे प्रभात सिंह का लोकेशन किस मकसद से संदिग्ध संगठन का मुखिया जानना चाह रहा हैं | इस पर प्रभात सिंह ने फिर से अपनी किडनैपिंग और ऐसे संदिग्ध संगठन के लोगों द्वारा हमले किये जाने की आशंका व्यक्त की है | उनका कहना है कि, यह सब उन अधिकारियों के प्रश्रय का ही नतीजा है जिसके कारण संदिग्ध लोग आम लोगों को डराने का दुस्साहस कर रहे हैं |IMG-20160717-WA0061

यह एक प्रकार से धमकी समझा जा सकता हैं क्योंकि फारुख अली और  कई प्रकार के नाम वाले संदिग्ध संगठनों से जुड़े सुब्बा राव, महेश राव और संतोष तिवारी जैसे लोगों ने पत्रकार प्रभात सिंह के खिलाफ आईजी बस्तर शिव राम प्रसाद कल्लूरी एवं पुलिस अधीक्षक राजेन्द्र नारायण दाश के साथ मिलकर फर्जी मामला पंजीबद्ध करवाया था | जिसके कारण पत्रकार प्रभात सिंह को सवा तीन माह जेल में गुजारना पड़ा | दिल्ली में पत्रकार प्रभात सिंह के प्रेस-कांफ्रेंस के बाद जारी हुई तस्वीरों को लेकर एक टेम्पलेट बनाकर इन संदिग्ध संगठनों से जुड़े लोगों ने सोशल मीडिया पर जारी कर दिया | जिसमें पत्रकार प्रभात सिंह को नक्सली समर्थक बताकर इन लोगों ने दुष्प्रचारित किया | जिस दिन प्रभात सिंह दिल्ली में पत्रकार वार्ता ले रहे थे उसी दिन  राजेन्द्र नारायण दाश का एक धमकी भरा फेसबुक स्टेटस भी जारी हुआ और साथ में एक संदिग्ध संगठन अग्नि का भी गठन उसी दिन हुआ | जिसके बाद देश भर की मीडिया में इस मामले को लेकर समाचार प्रकाशित हुए |

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फारुख अली द्वारा प्रभात सिंह को किये कॉल रिकार्ड का स्क्रीनशॉट
फारुख अली द्वारा पत्रकार प्रभात सिंह को भेजा गया आपत्तिजनक सन्देश

इससे पहले भी राज्य सरकार ने बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के एक प्रशिक्षु आई.ए.एस. अधिकारी द्वारा सरकारी अस्पताल के निरीक्षण के दौरान एक मरीज के पलंग पर जूते पहने हुए पैर रखकर बातचीत करने की घटना सामने आई थी । प्रशिक्षु अधिकारी के इस आचरण को सामान्य शिष्टाचार और मर्यादा के प्रतिकूल बताते हुए राज्य शासन ने इस पर अप्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि सभी शासकीय अधिकारियों तथा कर्मचारियों से अपेक्षा की है कि वे अपनी ड्यूटी के दौरान तथा सार्वजनिक जीवन में आम जनता से मर्यादित व्यवहार करें और शिष्टाचार की सामान्य परिपाटी तथा शासकीय सेवा की आचरण संहिता का भी ध्यान रखें।

व्हाट्स ग्रुप में अप्राधिकृत रूप से जुड़ना भी सिविल सेवा आचरण नियम का उल्लंघन

यदि सिविल सेवाएं (आचरण) नियमावली, 1964 के नियम 11 और अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियमावली, 1968 के नियम 9 एवं संगठनों से जुड़ने सम्बंधित नियमों को देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी भी रूप से पत्रकारों या किसी संगठनों से लम्बे समय तक लगातार जुड़े नहीं रह सकता है | जिसमें आज के डिजिटल युग का व्हाट्स एप्प जैसा निजी समूह भी शामिल है | बस्तर में कई सरकारी सेवक अपने नाम से या कई मिथ्या नामों से कई सारे संगठनों के व्हाट्स एप्प समूहों में लम्बे समय से जुड़े हुए हैं | नियमावली में उपबंधित है कि कोई भी सरकारी कर्मचारी, प्रत्‍यक्ष या परोक्ष रूप से किसी सरकारी दस्‍तावेज या उसके किसी भाग की सूचना किसी अन्‍य सरकारी कर्मचारी अथवा ऐसे किसी अन्‍य व्‍यक्ति को नहीं देगा जिसे वह दस्‍तावेज की सूचना देने के लिए प्राधिकृत नहीं है, जब तक कि वह किसी सामान्‍य अथवा सरकार के विशेष आदेश द्वारा अथवा उसकी निर्धारित ड्यूटी के अंतर्गत ऐसा करने के लिए प्राधिकृत न  हो । इसी प्रकार कार्यालय प्रक्रिया नियम पुस्‍तक के पैराग्राफ 110 और 113 में प्रेस से संपर्क करने की प्रक्रिया दी गई है । ऐसे मामले देखने में आए हैं जहां कुछ सरकारी कर्मचारी प्रेस से अप्राधिकृत रूप से अपने निजी नाम से अथवा किसी मिथ्‍या नाम से संपर्क बनाए हुए हैं । समय-समय पर सभी सरकारी कर्मचारियों को प्रेस में अप्राधिकृत रूप से सूचना देने से रोकने के लिए अनुदेश जारी किए गए हैं किंतु देखने में आया है कि आचरण नियमावली के उपबंधों का अक्षरक्ष: पालन नहीं किया जा रहा है । हाल ही में कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं जहां कुछ अधिकारियों ने प्रेस में अपने ही मंत्रालय के कार्य व्यवहार की आलोचना की है और ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिनमें मंत्री के विचार जनता के समक्ष प्रस्‍तुत विचारों से बिल्‍कुल भिन्‍न हैं जिसके परिणामस्‍वरूप सिविल अथवा सैन्‍य अधिकारियों को परिहार्य विवेकहीनता दिखायी पड़ी ।

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