आज भी आदिवासियों से दो किलो नमक के बदले एक किलो चिंरौंजी छीन लेते हैं व्यापारी

मेहनत से निकले पसीने में होता है नमक ; क्या हम इस नमक का सम्मान कर पा रहे हैं ?

यह सवाल है प्रदेश के वरिष्ठ छायाकार गोकुल सोनी का आईये उनके व्यक्तिगत अनुभव और ज्ञान से जाने कि आज भी कैसे लुटे जा रहे आदिवासी , और सरकार मुट्ठी बांधे बैठी है । जन पक्षीय सरकार होने का दावा करने वाली नई सरकार के लिए एक सुझाव भी गोकुल के इस अनुभव में है , हमें उम्मीद है सरकार के तमाम सलाहकार इसे गंभीरता से लेकर कोई नीति जरूर बनाएंगे । विद्वान आईएएस बी.डी शर्मा और आईएएस शरद चन्द्र बेहार ने पहले भी इस सम्बंध में काफी अच्छी नीतियां बनाई थी , जिन्हें पूर्व की कांग्रेस सरकारों ने लागू भी किया था ।

रायपुर। कई साथियों को विश्वास भले न हो लेकिन यह सच है कि सुदूर वनांचल के आदिवासी चावल, नमक, शक्कर आदि खरीदने हाट-बाजार जाने के लिए अपने घर से एक दिन पहले निकलते हैं। नदी-नाले, पहाड़-पर्वत पार करते हुए फिर तीसरे दिन अपने घर लौटते हैं। कभी-कभी हिंसक वन्यप्राणियों के साथ मुठभेड़ हो जाती है उनकी।

नमक हमें अपने क्षेत्र में आसानी से मिल जाता है इसलिए हम इसकी कीमत नहीं जानते, लेकिन बस्तर के वनवासी बंधुओं के लिए यही नमक किसी हीरे-जवाहरात से कम मूल्यवान नहीं है। यह हमारे प्रदेश की विडंबना ही है कि नमक के लिए आदिवासियों को अपने गांव से मीलों दूर सफर कर हाट-बाजार जाना पड़ता है। लेकिन उससे भी बड़ी विडंबना यह है कि इसी नमक के कारण उनका वर्षों से शोषण भी किया जा रहा है। अभी भी बस्तर इलाके में अधिकांश हाट-बाजार ऐसे हैं जहां आदिवासियों से मात्र दो किलो नमक के बदले एक किलो चिंरौंजी छीन लेते हैं।

आदिवासी हाट-बाजारों में वस्तु विनिमय कोई हैरत की बात नहीं है लेकिन इमली, चिरौंजी आदि बहुमूल्य वनोपज नमक के बदले ले लेना जरूर हैरान करता है। आठ-दस रुपए किलो नमक के बदले 6-7 सौ रुपए किलो चिरौंजी का विनिमय, क्या आपको यह शोषण का पराकाष्ठा नहीं लगता? साथियों को बता दूं कि पाकिस्तान-अफगानिस्तान सहित खाड़ी देशों में चिरौंजी काजू-बादाम से भी कीमती माना जाता है। वहां मेहमानों को चिरौंजी खिलाना सबसे बड़ा अतिथि सत्कार माना जाता है।

बहरहाल आदिवासी और जंगल एक-दूसरे के पूरक हैं। जंगलों से उन्हें 80 फीसदी खाद्य सामग्री और औषधियां मिलती हैं। चिलचिलाती धूप, कड़ाके की ठंड या फिर घनघोर बारिश में आदिवासी जंगलों की खाक छान कर जो वनोपज जुटाते हैं, उनका वाजिब मूल्य नहीं मिलता। तेजी से सिमट रहे जंगलों के साथ नक्सल चुनौतियों ने भी उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

आदिवासी बिचौलियों और भ्रष्ट व्यापारियों के शिकंजे में आज भी उलझे हुए हैं। कुछ दिन पहले चारामा से भानुप्रतापपुर जाते हुए मुझे पुरी बाजार जाने का अवसर मिला। यहां व्यापारी आदिवासियों को ज्यादा कीमत बताकर अपने पास बुला रहे थे, लेकिन उनकी वनोपज में खामी बताकर औने-पौने दाम में खरीद रहे थे । इतना ही नहीं उनका और किस तरह शोषण होता है उसका एक नमूना यह भी कि चार किलो वजन के बाद जो अतिरिक्त सौ ग्राम या दो सौ ग्राम या फिर 900 ग्राम क्यों न हो उसका पैसा नहीं दिया जाता। आदिवासी कोई बहस न करे इसलिए उनकी वनोपज को तुरन्त पहले से खरीदे हुए ढेर पर डाल दिया जाता है।

छाया- शुभंकर शुक्ला

बाजार में चार-120, महुआ-38, इमली-55-60, काजू-50,अमचूर-50-60 और लाख-170 रुपये प्रति किलो खरीदा जा रहा था। यह तो सिर्फ बताने के लिए है हकीकत में खरीदने की कीमत बहुत कम होती है। सरकार कोई भी रहे ,आदिवासी कल भी ठगे जा रहे थे आज भी ठगे जा रहे हैं, लगता है आगे भी ठगे जाएंगे।

बात नमक से शुरू हुई थी। ग्रामीणों में पुराने समय से यह मान्यता रही है कि भले ही हर चीज की चोरी हो जाए लेकिन नमक की चोरी नहीं की जाती है। यही कारण है कि आज भी अधिकांश गांवों की किराना दुकानों में नमक को बाहर ही रखा जाता है। यही वह नमक है जो कभी अंग्रेजों के खिलाफ महात्मा गांधी और करोड़ों भारतीयों का हथियार बना था। यह नमक सिर्फ नमक नहीं हमारा ईमान है, जमीर है।

मजदूर कड़ी धूप में जब मेहनत करते हैं तो उसके शरीर से फूटने वाले पसीने में नमक ही होता है। उनकी शिराओं में खून के साथ नमक भी प्रवाहित होता है। क्या हम इस नमक का सम्मान कर पा रहे हैं?


छाया- गोकुल सोनी

गोकुल सोनी जी दैनिक नवभारत के वरिष्ठ छायाकार हैं , उनकी फोटोग्राफी में प्रदेश की संस्कृति और जन जीवन और जन समस्याओं को झांका जा सकता है ।

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