कोंटा में रेत तस्करों की गुंडागर्दी: माओवाद के बाद नया खतरा
बस्तर की धरती ने पिछले चार दशकों तक माओवाद की काली परछाईं झेली है। सुकमा जिला और पुलिस प्रशासन ने तमाम प्रयासों से इस घाव को भरने की कोशिश की, और माओवाद के खात्मे की दिशा में जीत हासिल की। नक्सल प्रभावित इलाकों में बुनियादी सुविधाएं पहुंच रही हैं, विकास की हवा बह रही है। लेकिन, इस जीत के बीच एक नया और खतरनाक खतरा सिर उठा रहा है — रेत तस्करी का काला कारोबार, जिसने सुकमा के माहौल को फिर से असुरक्षा और डर में बदलना शुरू कर दिया है।

सुकमा के कोंटा क्षेत्र का नाम अब अवैध रेत परिवहन और सरकारी नियमों की खुली धज्जियों के लिए बदनाम होता जा रहा है। तेलंगाना और आंध्रप्रदेश से आए रेत माफिया खुलेआम गुंडागर्दी कर रहे हैं। उनके हौसले इतने बुलंद हैं कि पिछले साल उन्होंने अवैध कारोबार के खिलाफ लिखने वाले चार पत्रकारों को फर्जी गांजा मामले में फंसाकर जेल भिजवा दिया। प्रशासन की आंखों के सामने रेत तस्करी का धंधा चल रहा है, और रोकथाम में नाकामी ने माफियाओं को और ताकतवर बना दिया है।
मिली जानकारी के अनुसार रेत के करोड़ों के मुनाफे को सेलिब्रेट करने के लिए कोंटा के CWC प्रांगण में रेत माफिया ने ‘सक्सेस पार्टी’ आयोजित की। इस महफिल में स्थानीय नेताओं की मौजूदगी ने सच को और भी कड़वा बना दिया। शराब की नदियां बहाईं गईं, नशे में चूर होकर माफिया और उनके गुर्गों ने अपनी ताकत का खुला प्रदर्शन किया।
शाम 6:15 बजे, दो वाहनों में सवार माफिया और उनके साथी कोंटा के एक शिक्षक के घर पहुंचे — जिसकी रेत व्यापार से जुड़ाव था। नशे में धुत उन्होंने उसे जबरन बॉर्डर ले जाने की कोशिश की। नेशनल हाइवे पर 15-20 मिनट तक खींचतान होती रही। शिक्षक का मोबाइल छीन लिया गया। जैसे-जैसे आसपास के लोग जुटने लगे, भीड़ देखकर माफिया और उनके गुर्गे बॉर्डर की तरफ फरार हो गए।
माओवाद के बाद ‘माफियावाद’…यह घटना केवल एक शिक्षक या एक दिन की कहानी नहीं है। यह उस संगठित अपराध का संकेत है जो आने वाले दिनों में सुकमा को नए अराजक दौर में धकेल सकता है। माओवाद के बाद अब ‘माफियावाद’ का खतरा मंडरा रहा है, और इसमें प्रशासन की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कानून और व्यवस्था की विफलता ने इन माफियाओं को निडर बना दिया है।
पत्रकारों को गिरफ्तार करने वाली ताकत, माफियाओं को रोकने में क्यों नाकाम है? क्या विकास की ओर बढ़ता सुकमा फिर से हिंसा और डर के साए में घिर जाएगा? क्या माओवाद के बाद अब रेत माफिया सुकमा का नया ‘सिरदर्द’ बनने जा रहे हैं?
माओवाद की लड़ाई जीतने के बाद सुकमा को इस नए खतरे से बचाने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। वरना, बस्तर के माथे से एक काला दाग मिटेगा नहीं, बल्कि एक नया दाग जुड़ जाएगा।
ध्यान रहे की छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना प्रशासन से मिलीभगत कर अरबों की रेत तस्करी करने वालो इन्हीं माफिया ने बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार बप्पी राय, निशु त्रिवेदी और दो अन्य पत्रकारों को षड्यंत्र कर जेल भिजवाया था । अब खुलेआम चल रहे हैं इस रेस तस्करी को लेकर बप्पी राय ने कहा है कि डंप रेत का परिवहन प्रशासन के सहमति से हैदराबाद मे हो गया है, तमाम विरोध के बाद भी प्रशासन ने आँख मुंद कर यह होने दिया। मामले मे प्रभारी मंत्री केदार कश्यप से भी शिकायत कि गई थी, केदार कश्यप जी के पीए ने मंत्री जी के निर्देश पर बकायादा मुझे बुलाकर मामले के बारे मे अपने डायरी पर लिखें थे । अब सवाल यह है कि कोंटा और सुकमा मे शासकीय और गैर शासकीय कार्य के लिए रेत कहा से आएगा। क्युकी शबरी नदी से अब नया रेत उतखनन प्रतिबंधित हो चूका है… कारण इस नदी से विलुप्त प्रजाति के झींगा मछली को बचाने के लिए यह प्रतिबन्ध लगाया गया है। तो माइनिंग विभाग और प्रशासन क्या अब हैदराबाद से रेत खरीदकर लाएगी।

सलीम शेख, सुकमा
