छत्तीसगढ़

साय सरकार के दो वर्ष

  • दिवाकर मुक्तिबोध

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करते हुए विष्णुदेव साय के दो वर्ष पूर्ण हो गए. उन्होंने 13 दिसंबर 2023 को शासन का कार्यभार संभाला था. 2023 का विधान सभा चुनाव भारी बहुमत से जीतने के बाद जब भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने सामाजिक समीकरण के तहत छत्तीसगढ़ में सरकार का नेतृत्व एक आदिवासी विधायक को सौंपने का निर्णय लिया तो उसकी बड़ी सराहना हुई थी क्योंकि पहली बार राज्य को उस अनुसूचित जनजाति का मुख्य मंत्री मिल रहा था जिसकी राज्य में आबादी करीब 33 प्रतिशत है. विष्णुदेव साय सरगुजा संभाग के कुनकुरी से आते हैं. प्रदेश के प्रमुख वरिष्ठ आदिवासी नेता हैं तथा उनकी करीब चार दशक की राजनीति में भाजपा नेतृत्व ने उन्हें काफी-कुछ दिया है. वे विधायक, सांसद, केन्द्रीय मंत्री व प्रदेश पार्टी के अध्यक्ष रहे. अब पहली बार वे मुख्य मंत्री बने हैं. चूंकि उनका राजनीतिक अनुभव प्रगाढ़ है इसलिए यह सोच सहज है कि उनके नेतृत्व में प्रदेश व प्रदेश के लोगों का भला होगा. भलाई से तात्पर्य है सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही, उसके कामकाज में पारदर्शिता, वरिष्ठ से वरिष्ठ अधिकारियों, मंत्रियों तथा जनप्रतिनिधियों तक जरूरतमंद लोगों की सीधी-सरल पहुंच, भौतिक संसाधनों मसलन शहरों तथा छोटे से छोटे गांव खेडों तक सड़क आवागमन की सुविधा, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार की उपलब्धता तथा सभी तरह के प्रदूषण से प्रदेश की मुक्ति. ये किसी भी जन कल्याणकारी सरकार की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए तथा तमाम योजनाओं की समय-समय पर ईमानदार मानीटरिंग भी. इसी के आधार पर साल दर साल सरकार की चाल-ढाल का आकलन होता रहता है. जनता करती है. चूंकि साय सरकार के दो वर्ष जनता ने देख लिए हैं इसलिए राय बननी शुरू हो गई है. फिलहाल दूर दराज व आजूबाजू से जो बातें छनकर आ रही हैं , वे साय सरकार के लिए सकारात्मक नहीं है. पर दिल्ली अभी दूर है लिहाज़ा धूमिल होती जा रही छवि को सुधारने के लिए तीन वर्ष अभी शेष हैं.

विष्णुदेव साय सरल स्वभाव के हैं. लेकिन अपने ही किले में बंद है. अब तक के तीनों पूर्व मुख्य मंत्री स्व.अजीत जोगी, डॉक्टर रमनसिंह तथा भूपेश बघेल की राजनीति अथवा शासन चलाने के उनके तौर-तरीके चाहे जैसे भी रहे हों, वे आम लोगों के बीच जाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते थे. मीडिया के लिए भी वे सहज उपलब्ध थे किंतु साय ऐसे नहीं हैं. मीडिया हो चाहे आम नागरिक, सीएम हाउस में उनसे मिलने के लिए पापड बेलने पड़ते हैं. उनके अब तक के शासन व्यवहार को देखते हुए यह एहसास होता है कि उन्हें अपने पद की बहुत ज्यादा परवाह नहीं है. शायद ऐसा इसलिए भी क्योंकि वे कभी पद के पीछे नहीं भागे. अपनी सरलता, सज्जनता, पार्टी के प्रति अटूट निष्ठा, स्वभावगत ईमानदारी, हायर सेकेंडरी तक शिक्षित तथा विवाद रहित व जमीन से जुड़े आदिवासी नेता होने का भरपूर लाभ उन्हें मिलता गया जबकि उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व से कभी कुछ मांगा नही. राजनीति में उनकी महत्वाकांक्षा ने कभी उड़ान नहीं भरी. वे परम संतोषी हैं तथा यह भी जानते हैं कि वे पांच वर्ष के मुख्यमंत्री हैं. आदिवासी भी हैं इसलिए उन्हें हटाये जाने का प्रश्न ही नहीं है. यह धारणा एकदम सच है हालांकि
राजनीति में ऊंट कब किस करवट बैठ जाए, कहा नहीं जा सकता. बहरहाल
अगले तीन वर्ष सरकार कैसी भी चले, भले ही रिमोट कंट्रोल से चले, उनका मुख्य मंत्री बने रहना पार्टी व केन्द्रीय नेतृत्व के लिए मुफीद है जिसे छत्तीसगढ़ में अपने तरह-तरह के हित साधना है.

जहां तक सरकारी योजनाओं एवं विधान सभा चुनावों में जनता से किए गए वायदों का प्रश्न है, उन पर अमल हो रहा है लेकिन सरकार के पास कोई ऐसा सिस्टम नहीं है जिससे उनकी गति व कामकाज की गुणवत्ता का आकलन हो सके. सरकार को इसकी परवाह भी नहीं है. यों सभी विभागों में अराजकता है किन्तु सबसे खराब स्थिति स्वास्थ्य की हैं. शायद ही कोई ऐसा दिन होगा जब अखबारों व सोशल मीडिया में किसी न किसी घपले की खबर न आती हों. भूपेश बघेल सरकार के बड़े भ्रष्टाचार तो उजागर हो गए. गिरफ्तारियां भी हुई हैं लेकिन किसी भी सरकार के लिए भ्रष्ट व्यवस्था को रोक पाना नामुमकिन है. खासकर तब जब सरकार के अनेक छोटे- बड़े अफसर ही गले तक भ्रष्टाचार में लिप्त हों. अत : यह उम्मीद रखना बेमानी है कि विष्णुदेव साय इस मामले में कुछ सार्थक कर पा रही है. इस मामले में स्थितियां जस की तस हैं.

फिलहाल सरकार के पक्ष में एक बात अच्छी हुई है. प्रदेश के नये मुख्य सचिव के रूप में एक कर्तव्यदक्ष आइएएस मिला है जिन्हें पद संभाले अभी दो माह ही हुए हैं. इस संक्षिप्त अवधि में वे समझ गये होंगे कि उनके सचिव रहते तब और अब राज्य में नौकरशाही की क्या स्थिति है. चंद दिन पूर्व ही सचिवों व आला अफसरों की मीटिंग में उन्होंने कुछ कड़े फैसले किए. उन्हें सर्वाधिक हैरानी इस तथ्य पर हुई कि विभागों के लिए बजट आवंटन के बावजूद प्रशासनिक स्वीकृति के लिए महीनों निकल जाते हैं. उदाहरण के तौर पर लोक निर्माण विभाग को इस साल के बजट में सड़कों के लिए 9500 करोड की राशि आवंटित थी पर इसमें से अभी तक सिर्फ 1900 करोड खर्च किए गए जबकि शहरी व ग्रामीण सड़कों की हालत बेहद खराब है. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि विभागों के नौकरशाह किस तरह काम कर रहे हैं. ऐसी स्थिति में मुख्य सचिव विकासशील के समक्ष कड़ी चुनौती है कि वे सरकार की नयी- पुरानी योजनाओं को आम जनता तक किस तरह ले जा पाएंगे ताकि जरूरतमंदों को सरलता से इनका लाभ मिले.

साय सरकार ने इन दो वर्षों में कतिपय मामलों में खासा अपयश ढो चुकी है. पिछली कांग्रेस सरकार की कुछ बेहतर योजनाओं का नाम बदलकर नया मुलम्मा चढा दिया गया तथा उन पर अमल की रफ्तार धीमी कर दी गई. इसी तरह शिक्षकों की नयी भर्ती का मामला हो या स्वास्थ्य विभाग के संविदा कर्मचारियों को नियमित करने का या गरीबों के लिए पीएम आवास योजना हो, ऐसी अनेक योजनाओं में जमीनी हकीकत कुछ और है. आम जनता पर पहली मार तब पड़ी जब बिजली की दरें बढ़ा दी गईं तथा पिछली सरकार द्वारा दर में दी गई रियायत को घटाकर आधा कर दिया गया. दूसरा आक्रमण अभी हाल ही में किया गया जब पांच डिसमिल तथा उससे कम के भूखंड की रजिस्ट्री पर रोक लगा दी गई तथा शुल्क बढ़ा दिया गया. यद्यपि सरकार इस मामले में पुनर्विचार कर रही है किंतु छवि का जो नुकसान होना था, वह हो चुका.

इन सब के अलावा बस्तर में नक्सलवाद और नक्सलियों के खात्मे के अभियान के पीछे केन्द्र के निहित स्वार्थ की भी खूब चर्चा है. यह कहा जा रहा है कि बस्तर को नक्सल मुक्त करके आदिवासियों को आतंक व शोषण के पंजे से मुक्त तो किया जा रहा है किंतु विकास के नाम पर अडानी जैसे उद्योगपतियों को प्राकृतिक संसाधनों की लूट की खुली छूट दी जा रही है. कोल डिपॉजिट क्षेत्रों में खनन के लिए जंगलों का नाश करने के खिलाफ महीनों से लड़ाई लड़ी जा रही है. जन आंदोलन व धरना प्रदर्शन होते रहे हैं पर इससे सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. मार्च 2026 तक बस्तर को नक्सल मुक्त करने का केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का कौल है. अभियान की सफलता तो खैर निश्चित है पर इससे बाद यह देखना होगा कि अगले तीन वर्ष में मोदी-शाह-साय सरकार बस्तर का चेहरा किस तरह बदलती है. विकास का जो रोड मैप तैयार किया जा रहा है क्या वह आदिवासियों को मंजूर होगा? अपनी संस्कृति व परम्पराओं को जीने के मुद्दे पर आदिवासियों व धर्मांतरित आदिवासियों के बीच जो द्वंद्व चलता रहा है वह भविष्य के खतरे का संकेत है. राजनीतिक व सामाजिक दोनों दृष्टियों से यह साय सरकार की जिम्मेदारी है कि समुदायों के बीच पारस्परिक सद्भाव व सामंजस्यता कायम रखें.

गृह मंत्री अमित शाह बस्तर प्रेम जग जाहिर हो चुका है. वे 13 दिसंबर को बस्तर ओलंपिक के समापन समारोह के मुख्य अतिथि हैं. अगली दफा वे बस्तर के किसी गलीकूचे के कार्यक्रम में भी उपस्थित रहते हैं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.