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यातना से गुज़रता एक कवि और मरते नागरिक

यह एक कवि के साथ यातना की ख़बर नहीं, यह खबर बता रही है नागरिक और लोकतंत्र के रिश्ते ध्वस्त हो चुके हैं

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रवीश कुमार

सुबह से माहौल बनाना शुरू हो जाता है। टाइम लाइन से लेकर न्यूज़फ़ीड पर कि आज आपकी जिज्ञासु तरफ़ रहेगी। जितना ज़्यादा माहौल बनता है, उतना ज़्यादा भीड़ उस तरफ़ भागती है। कुछ लोग इस खेल को समझते हैं तो वे अपनी जिज्ञासा को अलग-अलग दिशाओं में ले जाते हैं। हर बार यह काम संगठित तरीक़े से हो यह ज़रूरी नहीं लेकिन कई बार आप ख़ुद भी उस भीड़ का हिस्सा बनने लगते हैं। हर दिन के अभ्यास ने आपको वैसा बना दिया है।आपकी प्राथमिकताों की दिशा मोड़ दी है। जब आप कोई खबर शेयर करते हैं तो चेक कीजिए। उसके लिए एक चेकलिस्ट बनाइये। पता चलेगा कि आप लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं के पतन की ख़बरों को लेकर कितने जागरूक हैं, आप दूसरे के साथ हो रही नाइंसाफ़ी से कितना विचलित होते हैं, आप राजनीति के अलावा और किन विषयों की तरफ़ उन्मुख होते हैं। हर पंद्रह दिन पर शेयर किए गए न्यूज़ की सूची बना कर देखिए। आप अपने बारे में काफ़ी कुछ जान सकेंगे। नागरिक के रूप में अपनी भूमिका का एक रेखाचित्र बना सकेंगे। बेशक गाने भी सुना कीजिए और साझा कीजिए। वो भी ज़रूरी है लेकिन जिस जगह पर साँस लेनी है उस जगह की हवा का पता रखिए।

यह एक कवि के साथ यातना की ख़बर नहीं है। यह खबर बता रही है नागरिक और लोकतंत्र के रिश्ते ध्वस्त हो चुके हैं। इसलिए आपको अपने साथ होने वाली नाइंसाफ़ी को गले लगा लेनी चाहिए ठीक उसी तरह जैसे आपने चुप्पी की हार पहनी है। ऐसा हो नहीं सकता कि सिस्टम सिर्फ़ आपके लिए जाग जाएगा। आख़िर इतने अपराध बोध को लेकर आप अपनी नागरिकता की लाश ढो पाएँगे ? बिल्कुल ढो पाएँगे। आप ढो ही तो रहे हैं।

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रवीश कुमार

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