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नक्सलगढ़ पदमुर की दास्ताँ

सौ मकान और 400 की आबादी वाले गांव में दो शिक्षित और तीन मोबाइल

वेरुदी नदी ने रोक रखी है पदमुर के विकास की नाव

दाना और इलाज के लिए नदी पार रेड्डी पर आधारित है ग्रामीण

पदमुर से लौटकर गणेश मिश्रा

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बीजापुर। जिले के एक छोर से बहती वेरूदी नदी, जिसका स्थानीय बोली में शाब्दिक अर्थ सूर्योदय की दिशा से होकर बहने वाली नदी बताया जाता है और इसी नदी के पार बसा है गांव पदमूर, जहां कुछ दिन पहले चौदह सालों बाद स्कूल की घंटी बजी है।

वेरूदी नदी पदमूर को गंगालूर मार्ग पर बसे चेरपाल से अलग करती है। यह नदी ना सिर्फ दो गांवों को विभाजित करती है बल्कि लोकतंत्र और लालतंत्र की सरहद भी तय करती है। वेरूदी नदी के पार कोटेर और इसके आगे पदमूर गांव बसा है। गांव में लगभग ढाई सौ की आबादी है और इसे ग्राम पंचायत का दर्जा भी मिला है, बावजूद नदी पार व्याप्त पिछड़ेपन से ना सिर्फ विकास की हकीकत को जाहिर करती है बल्कि लालगढ़ की तस्वीर भी उभरकर आती है।

चौदह सालों बाद बुधवार को जब पदमूर में बच्चों के लिए स्कूल के दरवाजे खुले तो ग्रामीणों में विकास को लेकर उम्मीदें भी जगी। स्कूल रीओपनिंग को कवर करने पहुंची पत्रकारों की टीम ने गांव के हालातों का जायजा लिया और ग्रामीणों से चर्चा भी की। ग्राम पंचायत पदमूर में सात पारा है और आबादी चार सौ के करीब है। पुजारीपारा, नयापारा, पटेलपारा, सरपंचपारा, कातिया पारा, नदी पारा और रविन्द्र पारा के नाम से बसाहटें हैं मगर बुनियादी सुविधाओं से महरूम।

बस्तियों को मिलाकर गांव में कुल नौ हैण्डपंप पीने के पानी के लिए वर्षों पहले स्थापित किए गए थे, अब इनमें अधिकतर हैण्डपंप खराब हो चुके है, वही कुछ का पानी उपयोग लायक भी नहीं। कमोवेश यह स्थिति पदमूर के आस-पास बसे कुछ और गांवों में भी देखने को मिली। हैण्डपंप खराब होने से लाचार ग्रामीणों को पीने का साफ पानी लाने काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। बिगड़े हैण्डपंप से गांव में पानी की समस्या गर्मियों के दिनों में विकराल रूप लेती है।

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बीते दो दशक पहले जब से बिजली गई तब से गांव वापस भी नहीं लौटी । ग्राम प्रमुख गोंदे सामू, मुच्चा मरकाम के मुताबिक 1995 में पहली दफा गांव में बिजली आई थी, लेकिन पांच साल बाद बिजली जो गई आज पर्यंत नहीं लौटी। तब से गांव शाम ढलते ही घुप्प अंधेरे में डुबा जाता है। गांव को रोशन करने सोलर विद्युतीकरण की कवायद भी कभी नहीं हुई। मजबूरी में पदमूर  अब भी चिमनी युग में है।

पदमूर में विकास को मुंह चिढ़ाती तस्वीर अगर देखनी हो तो वरूदी नदी के एक किनारे पर खड़े होकर देखा जा सकता है। नदी के उस पार रेड्डी, चेरपाल गांव बसे हैं। नदी पार करते ही नजदीकी गांव रेड्डी पड़ता है, जहां स्वास्थ्य केंद्र से लेकर राशन दुकान चल रहे हैं। सरकारी सुविधाओं का अगर लाभ लेना हो तो पदमूर वासियों को मजबूरन वरूदि नदी को पार करना होगा। अभी अंचल में कम वर्षों के कारण नदी का जलस्तर घुटने से भी नीचे है।

अल्पवर्षा भले ही किसानों के लिए चिंता का सबब बना हुआ हो, लेकिन पदमूर वासियों के लिए उफनती नदी को पार करने जैसी मजबूरी नहीं है, हालांकि बीते साल बारिष के महीने में नदी उफान पर थी, इस दरम्यानी गांव समस्याओं से घिरा था। बारिश और उफनती नदी की अधिक मार मरीजों पर पड़ती है। अस्पताल पहुंचने में नदी की अड़चन बीमार के लिए मौत का सबब भी बन जाती है। गत वर्ष हेमला रेशमा नाम की आठ वर्षीय किशोरी की मौत मलेरिया से हो गई थी। परिजनों की मानें तो मलेरियाग्रस्त हेमला को वे अस्पताल नहीं पहुंचा पाए थे। नदी में पानी काफी चढ़ जाने से उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए मदद नहीं मिली, नतीजतन इलाज के अभाव में उसने घर पर दम तोड़ दिया।

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सूचना क्रांति के इस दौर में पदमूर कोसो दूर है। इलाके में मोबाइल कनेक्टिविटी नहीं पहुंच पाई है। वही जब देश-प्रदेश मोबाइल क्रांति के युग में नित नए आयाम खड़े कर रहा है, वही चार सौ की आबादी वाले पदमूर में गिनती के तीन मोबाइल है। ऐसे में मोबाइल फोन पर किसी को बात करता देखना पदमूरवासियों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं।

ग्राम पंचायत का दर्जा प्राप्त पदमूर में तूती माओवाद की बोलती है। माओवाद समस्या के चलते गांव में तमाम विकास कार्य वर्षों से रूके हैं। दबी जुबां से ग्रामीण भी इस बात को स्वीकारते हैं। बताया गया है कि नक्सलियों की इजाजत के बिना निर्णय लेने की आजादी नहीं है, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि गांव के विकास को माओवाद समस्या से किस हद तक प्रभावित कर रखा है, वही यह सवाल भी उठता है कि माओवाद का प्रभाव रहते पदमूर विकास की मुख्यधारा से कैसे जुड़ पाएगा। 

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गणेश मिश्रा

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