माओवाद एक उपयुक्त नकाब :रोहित प्रसाद

रोहित प्रसाद : स्वतंत्र लेखक

विश्वास किया जाता है कि भारत के ८० जिलों में माओवादियों का विशेष प्रभाव है और यह यथाकित लाल गलियारा नेपाल से आंध्र एवं पश्चिमी से महाराष्ट्र तक फैला हुआ है। माओवाद की चुनौती को किसी प्रकार से नज़रअंदाज़ न करते हुए , इस लेख में मैं उसके एक उप्युक्त नक़ाब के रूप में प्रयोग पर प्रकाश डालना चाहूँगा । मेरा नज़रिया अपनी किताब ‘ब्लुड रेड रिवेर्’ लिखने के दौरान किये गये दो साल के शोध पर आधारित है ।

कौन सी हस्तियाँ माओवाद को नक़ाब बनाकर लाभ उठाती हैं? इस समूह मे विभिन्नऔद्योगिक कोम्पनियाँ, अनेक अपराधियों की टोलियाँ, और खुद सरकार के बाशिंदे शामिल हैं.

इस सन्दर्भ में मेरा प्रथम अध्ययन एक सम्मानित औद्योगिकी परियोजना पर हुआ। इस कंपनी ने बहुत बड़े पैमाने में इस्पात कारखाना लगाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के साथ एक समझौते पे हस्ताक्षर किया था , जिसके परिणाम स्वरूप इस संस्था को दांतेवाड़ा में प्राथमिक कार्य प्रारंभ करने का अधिकार प्राप्त हुआ। दांतेवाड़ा जिला कथित रूप से माओवादियों के अधिकार में है। संस्था के अधिकारियो ने हमें बताया कि माओवादी उनके कार्य में अड़चने डाल रहे थे और वह लोग उनकी मशीनें तथा अन्य साधनों को नश्ट कर देते थे। परंतु जब मैंने कंपनी द्वारा नियुक्त ठेकेदार से बात की तो एक दूसरा ही दृश्य सामने आया।

ठेकेदार ने बताया कि उस संस्था ने उनको परियोजना प्रभावित लोगों के बीच अनुकूल वातावरण बनाने हेतु नियुक्त किया था और उन्होंने माओवादियों के विचारक स्तर से लेकर आम जनता तक सभी के साथ अत्यंत आत्मीय संबंध स्थापित कर लिए थे। औद्योगिकी संसथान ने आदिवासियों के हित में कुछ विशेष कार्य करने का आश्वासन दिया था जिसके कारण ठेकेदार को लगा की माओवादियों ने अपना समर्थन दे दिया था।

उस ठेकेदार का कहना था कि परियोजना की प्रगति में बाधा उत्पन्न करने में प्रतिद्वंदी संस्थानों ( जिनमे सरकारी संसथान भी सम्मिलित थे ) का विशेष हाथ था। स्थानीय राजनीतिज्ञों ने भी इन विपरीत परिस्तिथियो का पूर्ण लाभ उठाते हुए बहती गंगा में खूब हाथ धोया.

ठेकेदार ने बताया कि सड़क और पुल के निर्माण में समय लगता है और यदि माओवादी चाहते तो पुल और उनको बनाने वाले लोगों को कभी भी नष्ट कर सकते थे। शायद राजनीतिज्ञ वर्ग ने अपने स्वार्थ के कारण प्रतिद्वादी संस्थानों का समर्थन किया , विशेषतः इस कारण कि उन्होंने सरकारी परियोजनाओं के आस पास सस्ते दामों पर ज़मीन खरीद रखी थी। ठेकेदार का यह भी रोना था की इन हमलों के बावजूद जब वह नये सिरे से काम शुरू करने को तत्पर था, कथित प्रभावित संसथान के अधिकारी मुकर गये क्योंकि 2008 मे हुए विश्व के वित्तिय संकट के पश्चात उनकी निवेश करने की क्षमता बहुत घट गयी थी.

दूसरा मामला एक कॅतोलिक नन सिस्टर वालसा की हत्या से संबंधित है. ‘पनम’ नामक संयुक्त कंपनी झारखंड मे कोयला खनन कर रही थी और इसके हेतु उन्होंने प्रभावित गाओं वालों के साथ कुछ वादे किए थे. जब उन्होंने अपने वादे पूरे नहीं किए तब सिस्टर वाल्सा ने उनका सख़्त विरोध किया. कुछ लोगों को विशेष उपलब्धियाँ प्रदान कर कंपनी ने गावंवालों में फूट पैदा कर दी . वालसा के ही एक पूर्व साथी ने उसकी हत्या का षडयंत्रा रचा. हत्या करने के बाद हत्यारों ने माओवाद के नारे लगाते हुए अपराध स्थल को छोड़ा . हाइ कोर्ट की जाँच में असलियत उभर के निकली की अपराध किसी उग्रवादी का काम नहीं बल्कि गाओं के कुच्छ सिर फिरे नौ जवानों का ही कारनामा था.

सरकार भी माओवादियों की आड़ को लेकर जैसा तैसा करने के अपराध से मुक्त नहीं है. सन 2011 में च्चत्तीसगर्ह के कुछ सुदूर गाओं में 300 सशस्त्र लोगों ने हमला किया . सैकड़ों घर और खलिहान जलाए गये , दो गाओं वालों की हत्या की गयी, और तीन औरतों का बलात्कार किया गया. कई गाओं वालों को गैर क़ानूनी ढंग से गिरफ्तार किया गया. सरकार द्वारा यह बताया गया की यह हमला माओवादियों की करनी थी. एक आदिवासी पत्रकार की पड़ताल से हुमले मे सरकार की मुख्य भूमिका का पता चला. कथित तौर पर सरकार 2010 में माओवादियों के हाथ छिहत्तर सी.र.प.फ जवानों की हत्या का बदला चुका रही थी. कुछ बुद्धि जीवियों की दखल के कारण सुप्रीम कोर्ट ने जाँच शुरू की जो आज तक जारी है.

इन जगहों में यात्रा करने वाले को ऐसे कई किस्से सुनने को मिलते हैं. एक और सुनते जाइए. सरकार के समर्पण नीति के तहत खुद माओवाद की राह को छोड़ने वाले सिपाहियों को इनाम और पुलिस में नौकरी मिलती है. यह एक अच्छी तरह जानी हुई बात है की इस इनाम का फ़ायदा उठाने के लिए कई नकली माओवादी आत्म समर्पण करते हैं. इनाम उनमें और सरकार के मुलाज़िमों में बाँटा जाता है. हर माओवाद ग्रस्त ज़िले को सालाना र. ३० करोड़ मिलते हैं. इस राशि में से एक बड़ी रकम ऐसे जेब भरने के कामों में जाती है.

समाज के अनेकानेक गुंडे और बदमाश अपने आप को माओवादी कहकर अपनी मन मानी तो कर ही रहे हैं. माओवाद की नक़ाब के पीछे छुपने वालों की फेहरिस्त में कुछ उद्योगपतियों और सरकार के मुलाज़िमों का नाम जोड़ना भी ज़रूरी है.

इस पोस्ट में व्यक्त विचार लेखक के अपने विचार है। यदि आपको इस पोस्ट में कही गई किसी भी बात पर आपत्ति हो तो कृपया हमें bhumkalsamachar@gmail.com पर ई-मेल करें… धन्यवाद

One thought on “माओवाद एक उपयुक्त नकाब :रोहित प्रसाद

  • 22/10/2016 at 1:35 PM
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    सत्य पर आधारित तथ्यात्मक लेख है…Nitin Nitin Nitin

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