तानाशाह से मत डरो -(01)

आज की कविता

वो महज
कुछ लोगों के बीच रहता है
वो महज
कुछ लोगों की बात सुनता है
वो महज
कुछ ही वक़्त अकेला रहता है
वो महज
अपनी ही बात करता है
वो महज
अपने बारे में सुनता है
वो महज
अपनी तारीफ़ सुन पाता है
वो महज
कुछ ही लोगों पर भरोसा करता है
वो नहीं
निकलता सड़क पर
वो नहीं
जाता कहीं बिना सुरक्षा के
वो नहीं
बात करता किसी अनजान से
वो नहीं
सुन सकता अपने ख़िलाफ़ कुछ
वो नहीं
बोल सकता है सच बिना डरे
वो नहीं
सह सकता है कोई भी असहमति
तुम
उससे डरते हो
जो
ख़ुद इतना डरा हुआ है
तुम
मत डरो उससे
तुम्हारा
डर ही उसकी ताक़त है
तुम
बोलोगे
और वो
डर के मर जाएगा…
तुम्हारी आवाज़
उसके पिंजरे में बंद
उसकी जान का तोता है

मयंक सक्सेना

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