संतोषजनक सुविधायें नहीं मिली तो जगदलपुर जेल में होगा अनशन

पत्रकार संतोष यादव के नेतृत्व में बंदी करेंगे अनशन

जगदलपुर. केन्द्रीय जेल जगदलपुर में मूलभुत सुविधाओं का अभाव है | अंग्रेजों के जमाने 1919 ई. के जेल में आज भी अंग्रेजों के जमाने की ही सुविधाएँ बंदियों एवं कैदियों को मिल रही है | औसत से ज्यादा भरते जेल में 18 सौ से अधिक बंदियों की संख्या पहुँच चुकी है जो संख्या औसत से विस्फोटक स्थिति में पहुँच चूका है | जिसमें अंडरट्रायल बंदियों की संख्या सबसे अधिक है | बस्तर के पत्रकार प्रभात सिंह के दिल्ली और रायपुर में दिए साक्षात्कारों के बाद सरकार हलचल में तो आई किन्तु सुविधाएँ आज भी नदारद हैं | अंग्रेजी हुकूमत से परे जेल की सुविधाएँ नहीं बढ़ने से बंदी अब आमने सामने की लड़ाई लड़ने मजबूर हैं | जेल में सुविधाओं का विस्तार नहीं किया गया तो केन्द्रीय जेल जगदलपुर के बंदी संतोष यादव के नेतृत्व में जल्द ही अनशन करने का मन बना रहे हैं | इस बात की जानकारी संतोष के परिजनों ने मीडिया को बताई हैं |

 

केन्द्रीय कारागार जगदलपुर फोटो साभार बीबीसी
केन्द्रीय कारागार जगदलपुर फोटो साभार बीबीसी

जेल की स्थिति के बारे में बस्तर के पत्रकार प्रभात सिंह बताते हैं कि बंदियों को पेशी ले जाने के दौरान और कोर्ट से पेशी के बाद लाने पर नंगा कर तलाशी लिया जाता है | जेल में जिन बंदियों कैदियों को पैसे पहुँचते हैं उन्हें अलग से सुविधाएँ दी जाती हैं | जेल में 18 सौ बंदियों के लिए आधा किलो टमाटर 1 लीटर तेल और आधा किलो मसाला में दोनों समय का भोजन पकता है | दूध जेल में बंदियों के लिए आता है किन्तु आधा ही जेल के लाल-गेट से अंदर पहुँच पाता है | जेल के बाहर संत्री और जेल के कर्मचारी दूध के पैकेट निकाल लेते हैं | लाल-गेट से अन्दर जाते ही नम्बरदार दूध के पैकेट निकाल लेते हैं | बावर्ची तक पहुँचते पहुँचते आधा बचा दूध ड्रम में डाला जाता है | जिसमें से मंथली दूध जिन बंदियों ने सेट कर रखे हैं उन्हें देने बाद जो दूध बचता है वह बंदियों और मरीजों को दी जाती है | इस सारे खेल में जेल के कैदी नम्बरदारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है | इनसे यह सब काम उन्हें अतिरिक्त सुविधाएँ उपलब्ध कराने के एवज में करवाया जाता है | क्योंकि इनमें से अधिकाँश लोगों से मिलने और सामान देने कोई परिचित नहीं आता |

जेल की रसोई घर में बनी रोटियों का आकार भी तीन प्रकार का होता है | बड़ी रोटी रसूकदार और पुराने नम्बरदार कैदियों के लिए तो छोटी रोटी पैसे में बेचीं जाती है | जिनकी थोड़ी पहुँच है और जो रोटी ही खाते हैं उन्हें रुखी चोकर वाली रोटी खाने को मिलती है | जेल में एक समय की रोटी की कीमत 200 रुपये प्रति 5 रोटी निर्धारित हैं | जेल में यह गोरखधंधा जेल के अधिकारी चंद पैसों की लालच में कर रहे है | अस्पताल में फार्मासिस्ट सोनी को पराठे तल कर  मिल जाते हैं |

जेल का अस्पताल 1925 में बना, पर अब खंडहर हो चला है | कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है जिसमें अस्पताल में बैठे डॉक्टर और मरीजों की जान जाने की पूरी संभावना है | छत्तीसगढ़ सरकार इसे हलके में आज तक लेती आई है | डॉक्टर मरीज को देखने के बाद अपनी पर्ची में कुछ भी दवाइयाँ लिखे दवाइयाँ वही दी जायेंगी जो फार्मासिस्ट सोनी ने तय कर रखा है | फार्मासिस्ट सोनी डाक्टरों की अनुपस्थिति में मरीजों के लिए प्रिस्क्रिप्शन भी लिखता है | दवाईया मरीजों को न देनी पड़े उसके लिए उन्हें प्रताड़ित किया जाता है | मरीजों को कहा माँ बहन की गाली के साथ संबोधित करते हुए कहा जाता है कि “तू फिर आ गया जा योग कर ठीक हो जायेगा” | जाते जाते दो गोली देकर कहा जाता है दुबारा मत आना” | फार्मासिस्ट सोनी दवाइयों के कक्ष की बजाय डॉक्टर के कक्ष में ही बैठता है | मरीजों को दवाइयाँ जेल के नम्बरदार कैदी देते हैं | जिन्हें मरीजों को प्रताड़ित करने की ट्रेनिंग पहले ही दी जा चुकी होती है | मरीजों को मिलने वाली दवाइयाँ ज्यदातर छत्तीसगढ़ सरकार की मुफ्त सप्लाई वाली होती है | जेल के बंदी बताते हैं कई लोगों की मौत उचित ईलाज नहीं मिलने से हो गई | जेल सूत्र बताते हैं कि अस्पताल में दवाइयों के बंदरबांट में करीब 20 लाख की गड़बड़ी को लेकर आडिट आब्जेक्शन आया था | किन्तु मामले को रफा दफा करने की कोशिश की जा रही है |

छत्तीसगढ़ का यह जेल माड़िया जेल के नाम से प्रसिद्ध है | यहाँ के जब आदिवासी बीमार पड़ते हैं तो अंधविश्वास का सहारा लेते हैं | दवाइयों के अभाव में बंदी मरीज जेल में वड्डे (बैगा-गुनिया) से झाड़-फूँक द्वारा ईलाज करते हैं | क्योंकि इन्हें पूर्ण विश्वास होता है कि हमें दवाइयाँ लेने जाने से प्रताड़ित किया जायेगा | एक अंडरट्रायल बंदी मरीज के गाल का घाव पिछले ढ़ाई साल में नहीं भर पाया है | तो एक बुजुर्ग के पैर के मोच का ईलाज अस्पताल में हैं ही नहीं फिर भी इन्हें जेल में ठूंस कर रखा गया है | जेल में कुछ पागल भी हैं जिन्हें सरकार ईलाज नहीं करवा पा रही है | लेकिन शान से अपनने जेल में रखे हुए हैं | पुलिस का लंगड़ा सिस्टम लंगड़े व्यक्ति को माओवादी कमांडर बताकर जेल में डाल चुकी है |

 

सरकारी सिस्टम के लोग जिनमें कलेक्टर, एसपी, जेल महानिदेशक आदि शामिल हैं वे यदा-कदा फार्मेल्टी निभाने जरूर जेल सैर को चले आते हैं | जेल दौरा के नाम पर एक राउंड लगाकर लौट आते हैं | केंद्र और राज्य की अंडरट्रायल रिव्यु कमिटी जेल का दौरा करने तो पहुँची लेकिन बंदियों और कैदियों से बात किये बगैर चली गई | बंदियों से बात करने से रोकने के लिए किसी के आने से पहले उन्हें पहले से बैरकों में ठूँस दिया जाता है |

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