व्यक्ति पूजा’ के साये में साजा कांग्रेस: चौबे परिवार का महारैली से किनारा क्यो..??

दिल्ली के रामलीला मैदान में 14 दिसंबर को आयोजित कांग्रेस की ‘वोट गद्दी छोड़’ महारैली, जहां एक ओर पार्टी के संघर्षशील नेता राहुल गांधी को राजनीति बल देने के उद्देश्य से देश भर के नेता जुटे, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की साजा विधानसभा क्षेत्र से एक विरोधाभासी तस्वीर सामने आई।
इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यक्रम से साजा कांग्रेस के प्रमुख पूर्व विधायक रविंद्र चौबे और उनका परिवार पूरी तरह से अपने आपको दूर रखने की चर्चा जन मानस में जमकर की जा रही है.।
यह अनुपस्थिति मात्र एक कार्यक्रम से दूरी नहीं है, बल्कि साजा की कांग्रेस राजनीति में व्यक्तिवाद के हावी होने और राष्ट्रीय नेतृत्व से किनारा करने के गहरे संकेत देते है।
👉🏻”आलाकमान और राहुल के कार्यक्रम को ‘अंगूठा'”
यह अनुपस्थिति आकस्मिक नहीं लगती। राजनैतिक जानकारो का मानना है कि अन्य राज्यों में कांग्रेस की लगातार हार और आगामी लोकसभा-विधानसभा चुनावों के अनिश्चित परिणामों को देखते हुए, चौबे परिवार राष्ट्रीय स्तर पर मुखर होकर ‘मोदी’ सरकार से सीधा पंगा लेने से बच रहा है। ‘ED-CBI का डर’ और ‘बोलती बंद’ कर दिए जाने की आशंका ने संभवतः उन्हें दिल्ली की ओर कदम बढ़ाने से रोक दिया।
👉🏻 रमन सिंह से नजदीकी: नए समीकरणों की आहट
रविंद्र चौबे की राजनीतिक दिशा उनके हालिया कदमों से स्पष्ट होता है। चौबे अपने पिता की पुण्यतिथि कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को अतिथि बनाना और समधी विधान मिश्रा का भाजपा में प्रवेश करवाना यह संकेत देता है कि चौबे वर्तमान समय में ‘जिधर दम है, उधर हम है’ की नीति पर शायद चल रहे हैं। राजनीति में पाला बदलने के संकेत चाहे अनौपचारिक ही क्यों न हों, पार्टी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल तों खड़े करते ही हैं।
“व्यक्ति पूजा बनाम संगठन”
सबसे गंभीर बात यह है कि इस महारैली से चौबे परिवार ही नहीं, बल्कि समूचा साजा ब्लॉक कांग्रेस भी गायब रहने की चर्चा जोरो पर है ।
यह हालत दर्शाते है कि साजा की राजनीति में पार्टी और आलाकमान की जगह ‘व्यक्ति पूजा’ ने ले ली है।
साजा कांग्रेस कार्यालय में राहुल गांधी को पोस्टरो मे जगह न देकर पहले ही चौबे यह स्पष्ट कर चुके हैं कि वह उन्हें जीत के लिए सही ‘फेस’ नहीं मानते ?
साजा में टिकट वितरण पर उनकी मजबूत पकड़ और आशीष छाबड़ा जैसे युवा नेताओं का ‘संरक्षक’ बनकर स्वयं को दब्बू साबित करना, साजा कांग्रेस में व्यक्तिवाद की पराकाष्ठा को दर्शाता है। संगठन से ऊपर व्यक्ति के हावी होने का यह सूचक पार्टी के भविष्य के लिए शुभ संकेत कदापि नहीं है।
“उम्र और बीमारी का बहाना, संगठन का ‘कमजोर’ होना”
भले ही पैर फूलने, लीवर, दिल और मधुमेह जैसी बीमारियों को दिल्ली न पहुंचने का कारण बताया गया हो ? लेकिन यह तथ्य भी उजागर होता है कि चौबे ने अपनी बीमारी की स्थिति में भी सेकंड लाइन का कोई सक्षम नेता नहीं पनपने दिया। परिणाम यह है की ‘बीमार चौबे’ के बोझ उठाने को मजबूर है क्योंकि उनके विकल्प में कोई दमदार नाम नहीं है।
साजा में चौबे परिवार का महारैली से ‘बाय बाय’ करना सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह उस कांग्रेस संस्कृति पर सवाल खड़ा करता है, जहां क्षेत्रीय नेता अपने व्यक्तिगत हितों और प्रभाव को राष्ट्रीय पार्टी लाइन से ऊपर रखते हैं। यह अनुपस्थिति साजा की कांग्रेस राजनीति में व्यक्तिवाद के घने साये का संकेत भी देती है, जो पार्टी के लिए दीर्घकालिक रूप से हानिकारक सिद्ध हो सकता है। प्रश्न यह उठता है की आखिर साजा में राष्ट्रीय कांग्रेस की छवि परिवार वाद के आगे बोनी क्यों नजर आ रही है..???
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(दिनेश शर्मा )
