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EVM पर जारी सवाल, कुछ तथ्य और आंकड़े

तस्वीर – प्रतीकात्मक

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने शनिवार सुबह एक बार फिर ईवीएम की विश्वसनीयता पर संदेह जताते हुये बीबीसी की पांच साल पुरानी एक रिपोर्ट को साझा किया है। ताज़ा चुनावी नतीजों के बाद कांग्रेस नेता लगातार ईवीएम पर सवाल उठा रहे हैं लेकिन पार्टी के भीतर से कई नेताओं ने ईवीएम पर संदेह के कोई पुख्ता कारण न होने की बात भी कही है।

यह सच है कि कोई भी इलैक्ट्रोनिक डिवाइस फूलप्रूफ नहीं होती लेकिन यह भी तथ्य है कि ईवीएम के ज़रिये वोटिंग के लिये कई सारे सेफगार्ड भी मौजूद हैं। इसलिये लंबे समय से चल रही बहस के बाद अब यह सवाल गौण लगता है कि ईवीएम से छेड़छाड़ की जा सकती है या नहीं। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में कांग्रेस खुद को उपहास का पात्र न बनाये इसके लिये यह ज़रूरी है कि वह चुनाव के बाद बार-बार ईवीएम का सवाल उठाने के बजाय यह स्पष्ट करे उसे ईवीएम से चुनाव चाहिये या नहीं।

पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को 17 राज्यों में एक भी सीट नहीं मिल पाई लेकिन वोट शेयर 19 प्रतिशत रहा और पार्टी को लगभग 12 करोड़ लोगों ने वोट दिया था। अभी संपन्न हुये 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसे करीब 4.9 करोड़ लोगों ने वोट दिया है। यह वोट बीजेपी को मिले कुल वोट से करीब 9 लाख अधिक है।

ईवीएम के खिलाफ बोलने वालों का कहना है कि मशीन को चालाकी से कुछ जगहों पर ही टैम्पर किया जा रहा है ताकि उतने ही वोट की धांधली हो जितने वोट से एक विशेष दल जीत भी जाये और विपक्षी पार्टियों को मत मिलने का भ्रम बना रहे। यह पूछने पर कि विपक्षी पार्टियां भी तो इसी ईवीएम से चुनाव जीत रही हैं जवाब मिलता है कि प्रभावी तरीके से करने के लिये कुछ चुनाव हारने पड़ते हैं। 🙂2017 में विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत के बाद ऐसे ही तर्क दिये गये। उस वक्त आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने नतीजों पर सबसे अधिक संदेह जताया।

यह सच है कि ईवीएम की विश्वसनीयता पर बीजेपी भी सवाल उठा चुकी है। बीजेपी के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद दोबारा बैलेट से चुनाव कराने का सुझाव दिया था। आडवाणी ने 2010 में प्रकाशित (चुनाव विश्लेषक और बाद में बीजेपी में शामिल हुये जीवीएल नरसिम्हाराव द्वारा लिखित) किताब “डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट अवर ईवीएम वोटिंग मशीन्स” का फॉरवर्ड भी लिखा लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों के बाद विपक्ष की ओर से ईवीएम पर सवाल उठे।

हालांकि 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेपी की जीत के बाद कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हुये जिनमें कम से कम 14 जगह विपक्षी पार्टियों की जीत हुई जिनमें बीजेपी एक प्रमुख प्रतिद्वंदी थी। इनमें 2015 में बिहार चुनाव, 2015 और 2020 के विधानसभा चुनाव, 2016 और 2021 का पश्चिम बंगाल चुनाव, 2017 और 2022 के पंजाब चुनाव, 2018 में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव, 2019 का झारखण्ड चुनाव, 2022 में हिमाचल चुनाव और 2023 में कर्नाटक और तेलंगाना का चुनाव शामिल हैं।

अब तक चुनाव आयोग सभी राजनीतिक पार्टियों को 2 बार आमंत्रित कर चुका है कि वो ईवीएम को हैक करके दिखायें। हालांकि उस न्यौते से विपक्षी दल खुश नहीं दिखे। कम से कम 2017 में चुनाव आयोग ने जो चुनौती दी (जिसे मीडिया में हैकाथॉन नाम दिया गया) उसमें आम आदमी पार्टी का आरोप रहा कि उसे हैकिंग करने के लिये पर्याप्त प्रयास करने की छूट नहीं दी गई।

आधुनिक चुनाव सिर्फ नारों और घोषणापत्र के दम पर नहीं लड़े जाते। उसमें पार्टियां बूथ माइक्रो मैनेजमेंट, टेक्नोलॉजी का प्रयोग और अपने मतदाता की पहचान और उसे पोलिंग बूथ तक लाने की कला शामिल है। बीजेपी ने इसके लिये पन्ना प्रमुख बनाने से लेकर कई व्हाट्स एप ग्रुपों द्वारा चुनावी तालमेल और मेरा बूथ सबसे मज़बूत जैसी रणनीति बनाकर अपना वोट प्रतिशत बढ़ाया है और जिन विपक्षी पार्टियों ने ज़मीनी काम किया उन्हें भी अपना आधार बचाने में मदद मिली है।

कांग्रेस पार्टी या विपक्ष के अन्य नेता अगर ईवीएम पर सवाल करते रहे तो यह उसके वोटरों के मन में संदेह पैदा करेगा और पार्टी की सेहत और कार्यकर्ताओं के मनोबल के लिये बिल्कुल ठीक नहीं है। अगर कांग्रेस या विपक्ष पार्टियों को लगता है कि ईवीएम ठीक नहीं है तो चुनाव से पहले ही इसका निपटारा करना चाहिये। चुनावों में हार के बाद उठे सवाल लोकतंत्र की सेहत के लिये कतई ठीक नहीं हैं।

हिरदेश जोशी

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