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छत्तीसगढ़ का हर्बल खाई-खजाना मुंगेसा विलुप्ति की कगार पर

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गोकुल सोनी

 आप में से कितने लोग मूंगेसा के बारे में जानते हैं या इसे खाये हैं? जो लोग नहीं जानते उन्हें बताना चाहूंगा कि मूंगेसा छत्तीसगढ़ी हर्बल खाई-खजाना है।

     जिस तरह शहर में नौकरीपेशा मां-बाप शाम को जब ड्यूटी से लौटते हैं तब वे अपने बच्चों के लिए रास्ते से खाने-पीने का कुछ सामान खरीद कर घर ले जाते हैं। इसी तरह  गांव में जब माताएं खेतों में काम करने जाती हैं और शाम को जब वे घर लौटती हैं तब वे अपने बच्चों के लिए मूंगेसा तोड़कर लाती हैं। मूंगेसा दरअसल मूंग का दूसरा रूप है लेकिन इसकी खेती नहीं होती। यह खेतों के मेड़ों और बाड़ी-बखरी में स्वाभाविक रूप से उग जाता है। इसके पौधे नहीं बल्कि लताएं होती हैं। अभी बारिश में ये मेड़ों पर उग आए हैं। अक्टूबर-नवंबर तक फल जाते हैं।

       मुंगेसा की एक फली में बीस से तीस दाने तक होते हैं। हरेपन में यह हल्का कसैला-मीठा होता है। पकने के बाद यह काला हो जाता है। सूखने के बाद इसके दाने फिर से चटककर बिखर जाते हैं जो बारिश में फिर उग जाते हैं। मुझे याद है, आज से चालीस-पचास साल पहले धमतरी के कुछ मिलावटखोर व्यापारी इसे गंगरेल और माड़मसिल्ली क्षेत्र के वनवासियों से बहुत सस्ते में पके हुए मुंगेसा खरीदकर ले जाते थे ताकि काली मूंग में मिलावट कर सके। 

        बहरहाल खेत में काम करने वाली माताएं दोपहर में जब भोजन अवकाश के बाद कुछ देर खाली रहती हैं तब वे अपने बच्चों के लिए मूंगेसा तोड़ लेती हैं और वेणी के रूप में गूंथ लेती हैं । शाम को घर आकर अपने बच्चों को देती हैं। निंदानाशक और कीटनाशकों के कारण मुंगेसा की लताएं अब बहुत कम देखने को मिलती हैं। अब जबकि हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल नरवा, गरवा, घुरवा और बाड़ी  पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं तो आशा की जानी चाहिए कि अब बाडिय़ों में मुंगेसा की लताओं को झूमते हुए फिर से देख पाएंगे।
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गोकुल सोनी छत्तीसगढ़ के प्रसिध्द छायाकार पत्रकार है

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