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किताब से निकलकर अर्थशास्त्र

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ये जो आदमी बैठा है रोड पर, वहीं बैठ कर खाना खा रहा है, यह यूपीए शासनकाल के दौरान नेशनल एडवाइजरी कमिटी के मेंबर थे। मनरेगा की ड्रॉफ्टिंग इन्होंने की थी। आरटीआई लागू करवाने में इनका हाथ था। बेल्जियम में पैदा हुए, लंदन स्कूल ऑफ इकॉनिमिक्स में पढ़ाया और अब भारत में हैं। इलाहाबाद यूनीवर्सिटी के जीबी पंत सोशल साइंस में विजिटिंग प्रोफेसर रहे। नोबल अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के साथ डेवलपमेंट इकॉनिमी पर किताब लिख चुके हैं। दुनिया भर में सैकड़ों पेपर पब्लिश हो चुके हैं। पिछले दिनों रांची में इनकी बाइक पुलिस वाले थाने उठा लाए। मनरेगा जिसके चलते 11% लोगो को गरीबी रेखा से ऊपर लाया जा चुका है, उसका कॉन्सेप्ट इन्हीं की देन है। फिलहाल वे रांची यूनीवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं। दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनिमिक्स में भी विजिटिंग प्रोफेसर हैं। सादगी तो देखिए… गरीबों और असहाय लोगों के लिए दिल्ली में सड़क पर बैठ गए हैं।

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ये हैं ज्यां द्रे। हमेशा से ज्यां द्रे ऐसे ही रहे हैं। यह कोई पहली घटना नहीं है। जिसकी दर्जनों किताबें भारतीय अर्थशास्त्र को मार्ग दिखा रही हों, वह उन गरीब गुरबां के लिए यूं लड़ रहा है। दरअसल सिद्धांतों के साथ कर्म का मणिकांचन संजोग बिरले ही दिखता है। पर इस देश की जनता को झूठे नेता, भ्रष्ट अधिकारी और राम रहीम टाइप के लोग अधिक पसंद हैं, यह चर्चाओं से समझ आता है। मेधा पाटकर का जल सत्याग्रह कोई विषय नही है। प्रोफेसर खेड़ा और प्रोफेसर आलोक सागर जैसों को चर्चा में होना चाहिए पर नही हैं। ज्यां द्रे आप प्रेरणा देते हैं कि हम भी अपने स्तर पर कुछ कर सकें। सलाम आपके जज्बे को… आपकी विद्वत्ता को और जमीनी संघर्ष को !

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पीयूष कुमार

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