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आदिवासी की 300 करोड़ की ज़मीन एक गैरआदिवासी ने 3 हजार उधारी के बदले करवा लिया अपने नाम

चार बार प्रशासनिक स्तर पर मजिस्ट्रियल जांच
मामला हाईकोर्ट में और विवादित भूमि पर धड़ल्ले से हो रहा निर्माण


क्या आदिवासियों को ज़मीन से बेदखल कर उनका जंगल भी छीन लेगा भारत का लोकतंत्र ?

आदिवासी की विवादित ज़मीन और प्रशासन के हाथों संविधान के हत्या की कोशिश

यूकेश चंद्राकर

बीजापुर (भूमकाल समाचार)। बस्तर में आदिवासियों पर अत्याचार का सिलसिला काफी पुराना है । इनके हक़ की बात करना बेमानी से ज़्यादा कुछ भी नहीं है । आदिवासियों के साथ जितने क्रूरतापूर्ण व्यवहार विश्वभर में किये गए हैं उनकी तुलना में भारत ने संविधान के ज़रिए उन्हें विशेषाधिकार देने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण और अहम कदम उठाया । पर बस्तर में आदिवासियों के संविधान के तहत मिले अधिकार के प्रति सरकार के असंवैधानिक और असंवेदनशील होने के सबूत लगातार मिलते रहते हैं ।

मध्यप्रदेश से पृथक छत्तीसगढ़ बनने के तीन दशक पहले याने 1970 में बस्तर अखंडित जिला हुआ करता था , तब मिच्चा रमैय्या नाम के एक आदिवासी, मजदूरी करने अपने पैतृक गांव चेरामंगी से बीजापुर आये थे । मुज़फ्फर खान नाम का एक शख्स उन दिनों बीजापुर का जाना माना रसूखदार हुआ करता था । मुज़फ्फर खान के पास कई आदिवासी मज़दूरी के लिए आया करते थे । मिच्चा रमैय्या वैसे तो किसान थे साथ ही उन दिनों लकड़ी का काम किया करते थे और मुजफ्फर का स्वयं का आरा मिल था ।

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रोजगार के लिए रमैया ने मुजफ्फर खान के पास मजदूरी शुरू की थी । मज़दूरी के दौर में 1972 में खेती के लिए जब रमैया को पैसों की ज़रूरत पड़ी तो रमैया ने मुजफ्फर से तीन हजार रुपये उधार लिए थे । 6 महीने बाद मुजफ्फर खान ने रमैया से कहा कि पैसे नहीं लौटाने के एवज में ब्याज समेत आपकी बकाया राशि 5000 होती है और पैसों के बदले रमैया के भोलेपन का फायदा उठाते हुए मुजफ्फर खान ने रमैया की 11 एकड़ 47 डिसमिल, खसरा नम्बर 822 एवं 151 आदिवासी भूमि छल कपट से हड़प ली । गैर आदिवासी होते हुए भी मुजफ्फर खान ने एक आदिवासी की जमीन पांचवीं अनुसूची क्षेत्र होने के बावजूद अपने नाम बड़े आसानी से कर ली ।

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करोड़ों की जमीन के मालिक आदिवासी की झोपड़ी

सन 1981-82 में भूमि हथियाने से जुड़ी पहली जांच चली जिसमें मिच्चा रमैया और उनका परिवार एस डी एम कोर्ट में पेश नहीं हो सके जिस कारण जांच की प्रक्रिया दब गई । 1988-89 में मिच्चा रमैया का अपने गांव चेरामंगी में ही देहावसान हो गया । सन 1991-92 में दूसरी जांच हुई, इस जांच में भी मिच्चा रमैया का परिवार एस डी एम कोर्ट में पेश नहीं हो सका और जांच एक बार फिर दबा दी गयी । 2001-02 में तीसरी जांच चली और इस जांच में भी वही हुआ जो पूर्व के दोनों जांच प्रक्रियाओं में देखा गया । बार बार मिच्चा रमैया के परिवार का कोर्ट में उपस्थित न होने का कारण बताया जाता है कि उनके परिवार को कभी जांच से जुड़ी जानकारी नहीं दी गयी और ना ही उन्हें कोई नोटिस ही मिला था ।
2014-15 में मुजफ्फर खान के भाई जमील खान ने तब पृथक हो चुके जिला मुख्यालय के तहसील कार्यालय में पीड़ित परिवार को तहसीलदार के समक्ष पेश किया था । इस जांच में तहसीलदार डी डी महंत ने पाया कि आदिवासी मिच्चा रमैय्या की ज़मीन कूटरचना कर गैर आदिवासी मुजफ्फर खान के द्वारा हड़प ली गयी है । मामला अब पूरी तरह से साफ हो चुका था कि मुजफ्फर खान दोषी पाया जाता । मुजफ्फर खान ने मामले की गंभीरता देखते हुए मामले को अपने वकील के माध्यम से हाईकोर्ट में पेश करवाया । बताया जाता है कि यह एक सोची समझी चाल थी ताकि मिच्चा रमैया का गरीब परिवार हाईकोर्ट तक न पहुंच सके ।

तीन हजार की उधारी के बदले मिच्चा रमैया की करोड़ों की जमीन गैर आदिवासी ने राजस्व अधिकारियों से मिलीभगत कर अपने नाम करवा लिया । जबकि बस्तर पांचवी अनुसूची क्षेत्र के तहत आता है, फिर 170 ( ख ) के तहत आदिवासी की जमीन कोई गैर आदिवासी खरीद ही नहीं सकता । अपनी जमीन को उसके कब्जे से हटाने के लिए शिकायत करते करते मिच्चा मर गया। इस बीच कई सरकार बदली और उसने हर सरकार में नेता रहे पक्ष विपक्ष दोनों के नेताओं से मिलकर अपनी समस्याएं रखें किसी भी आदिवासी नेता ने शोषण का शिकार हुए अपने आदिवासी भाई का साथ नहीं दिया । मिच्चा के परिवार के लोगों ने बताया कि वह पिछली सरकार में मंत्री रहे महेश गागड़ा से भी मिलकर शिकायत कर चुके हैं वहीं वर्तमान विधायक व बस्तर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष विक्रम मंडावी से भी वे गुहार लगा चुके हैं मगर अब तक उनकी किसी ने नहीं सुनी । मिच्चा का यह किस्सा एक अकेली घटना नहीं है, बस्तर में के सातों जिलों में आदिवासियों की हजारों एकड़ जमीन गैर आदिवासियों ने इसी तरह ही राजस्व अधिकारियों के साथ मिलकर गैर कानूनी तरीके से कब्जा कर रखा है । इस तरह के मामलों में प्रशासनिक अधिकारियों की संवेदनहीनता साफ जताती है की सरकार शोषित आदिवासियों के साथ नहीं है, जबकि आदिवासी जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के पीछे अक्सर ऐसे मामलों में अवैध कब्जेदार गैरआदिवासी का उनकी पार्टी से जुड़ा होना या ऊंची पहुंच वाला होना होता है- सम्पादकतीन हजार की उधारी के बदले मिच्चा रमैया की करोड़ों की जमीन गैर आदिवासी ने राजस्व अधिकारियों से मिलीभगत कर अपने नाम करवा लिया । जबकि बस्तर पांचवी अनुसूची क्षेत्र के तहत आता है, फिर 170 ( ख ) के तहत आदिवासी की जमीन कोई गैर आदिवासी खरीद ही नहीं सकता । अपनी जमीन को उसके कब्जे से हटाने के लिए शिकायत करते करते मिच्चा मर गया। इस बीच कई सरकार बदली और उसने हर सरकार में नेता रहे पक्ष विपक्ष दोनों के नेताओं से मिलकर अपनी समस्याएं रखें किसी भी आदिवासी नेता ने शोषण का शिकार हुए अपने आदिवासी भाई का साथ नहीं दिया । मिच्चा के परिवार के लोगों ने बताया कि वह पिछली सरकार में मंत्री रहे महेश गागड़ा से भी मिलकर शिकायत कर चुके हैं वहीं वर्तमान विधायक व बस्तर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष विक्रम मंडावी से भी वे गुहार लगा चुके हैं मगर अब तक उनकी किसी ने नहीं सुनी । मिच्चा का यह किस्सा एक अकेली घटना नहीं है, बस्तर में के सातों जिलों में आदिवासियों की हजारों एकड़ जमीन गैर आदिवासियों ने इसी तरह ही राजस्व अधिकारियों के साथ मिलकर गैर कानूनी तरीके से कब्जा कर रखा है । इस तरह के मामलों में प्रशासनिक अधिकारियों की संवेदनहीनता साफ जताती है की सरकार शोषित आदिवासियों के साथ नहीं है, जबकि आदिवासी जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के पीछे अक्सर ऐसे मामलों में अवैध कब्जेदार गैरआदिवासी का उनकी पार्टी से जुड़ा होना या ऊंची पहुंच वाला होना होता है- सम्पादक

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सन 2000 से ही मुजफ्फर खान ने इस विवादित भूमि का विक्रय शुरू कर दिया था । मामला विचाराधीन प्रक्रिया के तहत मजिस्ट्रियल निगरानी में होने के बावजूद जिला मुख्यालय बीजापुर में इस विवादित भूमि का क्रय विक्रय बीजापुर के प्रशासनिक अधिकारियों को संदेह के घेरे में खड़ा करता है । बताया गया है कि मुजफ्फर खान ने अब तक तकरीबन 4 से 5 एकड विवादित ज़मीन बेच दी है और शिकायतों के बावजूद प्रशासनिक अधिकारी चुपचाप आदिवासी परिवार के साथ अन्याय देखते रहे हैं ।

हाईकोर्ट में मामला चल रहा, पर खुले आम चल रहे निर्माण कार्य पर बीजापुर एसडीएम का वक्तव्य

समाचार लिखे जाने के एक दिन पूर्व आवेदक पक्ष की तरफ से बीजापुर एस डी एम भुआरे को लिखित शिकायत देने की कोशिश की गई थी । एस डी एम ने मामले को हाईकोर्ट में होने का हवाला देते हुए आवेदक पक्ष से कहा कि मामला हाईकोर्ट में है इसलिए स्थगन आदेश भी हाईकोर्ट से ही लाना होगा । मामले की गंभीरता समझते हुए पत्रकार यूकेश चंद्राकर ने एस डी एम बीजापुर से मोबाइलफोन पर संपर्क किया । एस डी एम ने पत्रकार के सवालों के जवाब देते हुए जानकारी दी है कि इस संबंध में तहसीलदार बीजापुर को निर्देश दिए हैं कि उक्त विवादित भूमि पर चल रहे निर्माण कार्यों पर रोक लगाने का आदेश जारी किया जाए ।

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यूकेश चंद्राकर

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