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आखिर जुझारू पत्रकार रूपेश सिंह कब तक रहेंगे जेल के भीतर

जेल में सड़ रही योग्य और क्षमतावान युवा जिंदगियों को देश और समाज के विकास में लगाना जरूरी

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कल यानी 09 अक्टूबर को साथी रूपेश की तारीख पटना कोर्ट में थी, वहां उनकी वकील और दोस्त Ilika Priy ने उनसे मुलाकात की, इलिका के शब्दों में वह मुलाकात —

यादगार लम्हों की कुछ बातें…….

पिछले कुछ समय से चीजें जैसी विपरीत चल रही थी, हमारे साथी Rupesh Kumar Singh के बेउर जेल आने के बाद भी उनसे कोर्ट में डेट पर मुलाकात होने की उम्मीद मुझे बहुत कम थी, पर आज काफी दिनों बाद हमने हाथ मिलाया। रूपेश जी का चेहरा काफी थका और परेशान दिख रहा था, मुझे हेल्थ से भी कमजोर दिख रहे थे, काफी दिनों बाद उनसे बातचीत हुई, हमारी बातचीत का अक्सर हिस्सा आर्गुमेंट वाले ही होते हैं हमेशा से, मुझे खुद नही पता चलता मैं कब आर्गुमेंट की लाइन पर आ चुकी हूँ। और अब कोर्ट में रहते-रहते हर बातों पर आर्गुमेंट करने की आदत बढ़ गई है। 😊 यहाँ भी वही चला…।

वैसे इस कोर्ट में एक साल दस महीने के दौरान रूपेश जी से मेरी यह पांचवी मुलाकात थी। क्योंकि मेरे वकालत शुरू करने के एक महिने के अंदर ही रूपेश जी भागलपुर सेंट्रल जेल भेज दिए गए थे, मैं जनवरी 2024 में ही दो बार उनसे मिल पाई थी। फिर भागलपुर से ही दो बार जब लाए गए थे, तब मिली थी। पहली दो मुलाकात काफी यादगार थी।

वकालत शुरू करने के पहले दिन ही रूपेश जी से भेंट हुई, जब वे कोर्ट में आए थे मैंने उनसे सिर्फ हाथ मिलाया था और फॉर्मली दो चार बातें कर सर के साथ कोर्ट चली गई थी कि फिर आकर बातें करूंगी, मुझे वक्त का कोई अनुमान नहीं था, कि कौन बंदी कब तक रहते हैं। लगभग 3 बजे जब मैं लौटी, तो परिसर खाली था, मैं दौड़ती हुई नीचे उतरी और हाजत की ओर भागी, पर देखा कि बड़ा गेट खुला है जिससे अंतिम कैदी वाहन निकल रही है, वहाँ तक जाते-जाते वह चली गई थी, और मेरी सबसे प्यारे मित्र से अधूरी मुलाकात अगले डेट के लिए स्थगित हो गई थी।

अगले डेट पर कोर्ट रुम जाते वक्त मैंने रूपेश जी से पूछा-” कब तक रहेंगे? “
” 3 बजे तक चले जाएंगे “- उन्होंने बताया,उस दिन मैंने तय किया था कि ढाई बजे तक आ जाऊंगी।
मैं चौथे तल्ले पर सर के साथ थी, कि मुझे ढाई बजे का ख्याल आया, मैं फिर दौड़ती हुई नीचे उतरी, पर… आज भी वे लोग जा चुके थे। वकालत की शुरुआत थी सो मुझे कहाँ, कब रहना चाहिए यह तय करना मुश्किल था,खैर उस दिन फिर मैं और भी तेजी से हाजत की ओर भागी, वहाँ खड़ी गाड़ियों का मुआयना किया, पर मेरे प्यारे दोस्त कहीं नहीं दिखे, वह बेहद अफसोस का पल था।

उसी पल मैंने अधूरी मुलाकात को अगले डेट पर न छोड़ने का फैसला ले लिया, मैंने तय कर लिया था कि अबकी बार मैं सारा दिन वहीं बैठी रहूंगी, पर अगले डेट पर इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी, रूपेश जी भागलपुर जेल भेजे जा चुके थे।

आज वह अधूरी मुलाकात याद आ गयी, खैर हालचाल जानने के बाद मैंने हेल्थ और जेल में उनकी स्थिति के बारे में भी पूछा। उन्होंने बताया कि सब ठीक है, भागलपुर जेल में कोर्ट ओर्डर के बाद उनके पीठ का एक्स रे हुआ था, उसके बाद से दवा भी खा रहे हैं, डाक्टर ने कहा था कि 15 दिन में फिर से चेकअप करा दिया जाएगा, बेउर जेल आए हुए 15 दिन हो चले है, वैसे अभी तक कोई चेकअप नहीं हुआ है, पीठ में अभी भी दर्द है, डाक्टर को दिखाने कहने पर कम्पाउंडर दर्द की दवा दे जाता है। डाइट में हर दिन दोनों वक्त आलू और सोयाबीन की ही सब्जी दी जा रही है, इस सोच के बगैर कि बंदी के रूप में बंद लोगों को भी पोष्टिक आहार की जरूरत होती है और एक ही सब्जी एक बंदी भी दोनों वक्त, हर दिन नहीं खा सकता।
पर जेलों की तो यह वर्षों पुरानी परम्परा है,डाक्टर तक पहुँच के लिए भी बंदी को संघर्ष करने पड़ते हैं चाहे वह संघर्ष बार-बार थका देने वाली मिन्नते हो या कोर्ट में आवेदन।
मुझे यह जानकर आश्चर्य भी लगा और चिंता भी हुई है कि जहाँ अभी हाल ही में रूपेश जी का कॉलेस्ट्रॉल लेवल काफी हाई था और पीठ के नस के दबने की प्रोब्लम सामने आए है, वहाँ रेगुलर चेकअप तो दूर डाक्टर से दिखाने की बात करने पर कम्पाउंडर दर्द की दवा दे जाता है?
अभी तक दोबारा चेकअप भी नहीं हुआ है और न खाने में डाइट का ही कोई ख्याल रखा जा रहा है। क्या यह अजीब नहीं है कि रोज आलू और सोयाबीन की सब्जी दोनों वक्त दी जा रही है, कभी कभार ही हरी सब्जी? क्या इस तरह रूपेश जी का स्वास्थ्य जो हाल में काफी चिंताजनक था, ठीक करेगी बेउर जेल प्रशासन? हर बार इन सबके लिए कोर्ट के दरवाजे ही क्यों खटखटाने पड़ते हैं, क्यों जेलें इस कदर अपने लापरवाह है?

शायद मेरे सवाल ही गलत है,आहार, डाक्टर, रहने का उचित प्रबंधन…यह सब सिर्फ एक जेल की समस्या है ही नहीं, यही वजह है कि हर जेल में हमारे प्यारे साथी जैसे सजग लोगों को इन समस्याओं से जुझना पड़ता है।

करप्शन एक ऐसी परम्परा बनकर वर्षों से तमाम जेलों में चल रही है, जहाँ बंदी एक जेल में नहीं बल्कि बाजार में होते हैं, एक वस्तु की तरह जिसके हर अधिकार, जरूरत की कीमत वह बाजार तय करता है और जेल का जो हिस्सा इस खरीद बिक्री से अछूता रहता है, वहाँ की हालत वैसी ही रहती है जैसे उपर वर्णित है। न इसमें कोई जेल अपवाद है न वहाँ की व्यवस्था।

शर्म की बात है पर सच है हमारे लोकतांत्रिक देश में आज के समय में जहाँ हर चीजें हाई टेक्नोलॉजी से जूड़ रही है, देश की जेलें दासप्रथा से शायद ही दो कदम आगे बढ़ पाई है।
बंदियों की जानवर की तरह पिटाई, डाइट में कमी लाकर उन्हीं सामान को महंगे दामों में बंदियों को बेचना, जेल का खाना दासों की तरह मिलना, आहार का बेकार और अपौष्टिक होना,( जबकि जेल मेन्युअल के डाइट में पौष्टिक आहार को रखा गया है) जेलों की सच्चाई है।

आज जेलों में रहने की स्थिति भी दासो से कुछ ही कम है। रूपेश जी ने बताया जहाँ वे है वहाँ कमरे के लगभग 9/8 हिस्से में के में तीन लोगों को रखा गया है। जो कि एक सेल है। अब मेरी समझ में नहीं आता कि पूरा समय एक कमरे के 9/8 के हिस्से में तीन लोग कैसे रहते होंगे? पर नहीं मुझे आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे भी कम जगह में बंदियों को रखा जाता है, भेड़ बकरियों की तरह….। और यह वर्षों की परम्परा है जो आज हमारे रूपेश जी जैसे जागरूक इंसान, जुझारू पत्रकार के लिए नहीं बदल सकती।
न ही सच्चे और जमीनी पत्रकारिता करने वाले, लेखन करने वाले या जनता के हित में काम करने वाले के प्रति शोषणकारी चरित्र बदल सकता है न ही झूठे आरोप के बाद जेल में रहने वाले बंदियों के लिए जेल की अमानवीय व्यवस्था…।
रूपेश जी ने बातचीत में अपनी स्थिति बताने के बाद कहा कोई बात नहीं, सब ठीक है, हम समझ सकते हैं कि ऐसी स्थिति में सब ठीक कैसे हो सकता है।

ऐसे युवा जिसकी योग्यता देश की सही मायने में तस्वीर बदलने में योगदान दे सकती है, जेलों के छोटे से हिस्से में बैठी सांसे गिनती है। जीवन के अनमोल पल जो लौट कर कभी नहीं आते, जेल के चाभी के साथ खुलता है और जेल की चाबी के साथ बंद होता है, एक ह्यदय जो देश और समाज के लिए धड़कता है, जिसकी रचना जमीनी समस्याओं से इस कदर गुजरती है कि समस्या के समाधान की कई तस्वीर उभर जाती है, सब जेल की चाबियों में बंद पड़ा है।
पर अफसोस नहीं करना चाहिए, और बदलाव की उम्मीद भी नहीं ,क्योंकि यह सिर्फ और सिर्फ एक की कहानी नहीं है, ऐसे हजारों, लाखों युवा है, जो अपनी योग्यता से देश और समाज को कुछ दे सकते थे, जेलों में सड़ रहे हैं। कभी झूठे केस के साथ, कभी भ्रष्ट व्यवस्था का शिकार बनकर, कभी सही राह न मिल पाने के कारण तो कभी सही और सच्ची राह पर चलने के कारण।

अभी तक हम डेवलपमेंट के उस मुकाम से कोसो दूर है, जो जेलों में सड़ रही युवा जिंदगियों को देश व समाज के निर्माण में लगा सके।

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इप्सा शताक्षी