Home SliderTop Newsछत्तीसगढ़बस्तर

आखिर कब तक निर्दोषों की आह से गूंजती रहेगी बस्तर की जेलें ?

एक तरफ हजारों छोड़ने की तैयारी , दूसरी ओर 50 हजार से ज्यादा गिरफ्तारी वारंट की तामीली शेष

अभी तो अरबों के ईनाम और पदोन्नति के लिए होनी है हजारों गिफ्तारी

“छत्तीसगढ़ सरकार ने चुनाव पूर्व वादा किया था कि जेल में बंद हजारों निर्दोष आदिवासियों को रिहा किया जाएगा । बस्तर में शांति के रास्ते तलाशे जाएंगे , बस्तर की तमाम जनता आशान्वित है कि शायद अब बस्तर में गोली और धमाकों की जगह ढोल की थाप फिर से गूंजेगी , रे – – – रेला- – – -रेला रे के बोल बिना थर-थराए गुन-गुनाये जाएंगे । पर अभी तक ऐसा होते नही दिख रहा । एक तरफ सरकार ने 4 हजार निर्दोष आदिवासियों को जेल से निकालने के लिए सरकार ने कमेटी बनाई हुई है , दूसरी ओर बस्तर की पुलिस और पैरा मिलिट्री खाली हो रहे जेल को ठूसने में लगे हुए हैं । पिछले पांच माह में ईनामी बताकर , डीकेएमएस , चेतना नाट्य मंडली आदि  माओवादी जन संगठनों व जनताना सरकार के पदाधिकारी बता दो सौ से ज्यादा उन ग्रामीणों की गिफ्तारी की है जो माओवादी प्रभाव वाले ग्रामो के ग्रामीण है । वहीं सैकड़ों का समर्पण कराया गया है । यह बहुत ही चिंता जनक बात है कि पुलिस अब भी पुरानी सरकार की सोच के तहत चल रही है । अधिकारी यह नही समझ पा रहे कि उन गांवों में निहत्थे और बिना सुरक्षा के वे भी रहते तो क्या वे माओवादियों की बैठक में शामिल होने,उन्हें खाना देने या उनका समान ढोने से इनकार कर सकते थे क्या ? इसी तरह के आरोप की वजह से अभी 50 हजार से ज्यादा गिफ्तारी वारण्ट तामील होने शेष हैं । मतलब आप चार हजार निर्दोष छोड़कर उनकी जगह फिर से भरने वाले हैं । इसके लिए सरकार के पास कोई स्पष्ट नीति नही है । बाकी फरार आरोपियों के लिए पर्चा और फोटो जारी करने वाली पुलिस बस्तर के मामले में यह गोपनीय रखती है ।आप क्यों नही सारे ईनामी वारंटी के नाम उन ग्राम पंचायतों को या ग्राम पटेल को सौंप देते , यह ईनाम गोपनीय रखने और अकेले हड़पना क्यों चाहती है बस्तर पुलिस और पैरामिलिट्री ? “
सम्पादक – कमल शुक्ला

 देखिए बस्तर में प्रायः रोज घट रहे ऐसे ही निर्मम घटनाओं में से एक घटना में संवेदनाहीन पुलिस और पैरा मिलेट्री फोर्स के अधिकारियों की निर्मम करतूत की मार्मिक रिपोर्ट भूमकाल समाचार के लिए पखांजुर के युवा पत्रकार राजेश हालदार की नजर से ।  घटना कांकेर जिले के ग्राम ताड़वेली की है इस गांव का अपराध बस इतना है कि 1984 में पुलिस और नक्सलियों के बीच हुए मुठभेड़ में पहला नक्सली लीडर गणपति यहीं मारा गया था ,तब से आज तक यह गांव दोनो ओर की बंदूकों और बूटों के निशाने में है ।

पखांजुर से राजेश हालदार की रिपोर्ट

पखांजुर – छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार ने विधानसभा चुनाव के दौरान अपने घोषणा पत्र में लिखा था कि जितने भी निर्दोष आदिवासी जेलों में बंद है उन्हें सरकार बनने के बाद जल्द से जल्द रिहा करने की दिशा में सकारात्मक पहल की जाएगी परंतु आज सरकार बनने के बाद भी आदिवासियों की मुश्किलें कम होती नजर नहीं आ रही है ।

       
           कांकेर जिले के छोटे बेठिया थानांतर्गत ग्राम ताड़बेली में 18 मई की सुबह 5 बजे बीएसएफ के जवानों द्वारा गाँव की घेराबंदी कर तेंदूपत्ता तोड़ाई कार्य में जा रहे ग्रामीणों को जबरन रोककर पूछताछ की गयी । जिसके बाद गाँव के एक दंपत्ति जिसमें आठ माह की गर्भवती महिला श्रीमती नीला उइके एवं उनके पति लालसु उइके को  बीएसएफ के जवान अपने साथ ईलाज का हवाला देते हुए अपने साथ ले गए । जिसके ठीक दो दिन बाद उन्हें कांकेर में नक्सली बताकर जेल भेज दिया गया । दंपत्ति के साथ उनका तीन साल का मासूम भी अब जेल में कैद है और सात साल की एक बच्ची गाँव में अब बिन माँ-बाप के अनाथ हालात में रहने को मजबूर है जिसकी देखभाल करने वाला अब कोई नहीं

लालसु उइके

            ग्रामीणों का कहना है कि महिला चार साल पहले शादी करके ईस गाँव में आयी तब से अब तक वो एक साधारण खुशहाल जीवन गुज़ार रही थी और उसका किसी भी प्रकार से नक्सली गतिविधियों में शामिल होना कभी नहीं देखा गया  वावजूद इसके कुछ महीने पूर्व ही बांदे थाना प्रभारी द्वारा इस महिला को पूछताछ हेतु थाना भी बुलाया गया और पूछताछ के बाद  उसे नक्सलियों से दूर रहकर एक खुशहाल जीवन जीने की समझाईश देकर छोड़ दिया गया ।

             वही पुलिस प्रशासन का कहना है कि उक्त महिला के खिलाफ महाराष्ट्र में नक्सली वारदातों में शामिल होने की रिपोर्ट दर्ज हैं परन्तु उसके पति के खिलाफ अब तक नक्सली मामलों से जुड़े होने की कोई जानकारी नहीं हैं , अभी जाँच की जा रही हैं । 

अब ऐसे में सवाल ये उठता है कि बिना जाँच किये ही महिला के पति को नक्सली साबित कर जेल भेज देना , और महिला को जो कि आठ महीने की गर्भवती है उसे नक्सली गतिविधियों में शामिल बताकर ईलाज के बहाने साथ ले जाकर जेल भेज देना कही न कही बीएसएफ जवानों के कार्यवाही पर सवालियां निशान खड़े करते है ।

           सबसे बड़ी बात यह है कि बीएसएफ जवानों के इस भूल का खामियाज़ा उस ज़िन्दगी को भी भुगतना पड़ेगा जो अब तक इस दुनिया में नहीं आया , आप सोच सकते है कि उस तीन साल के मासूम के मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ेगा जिसे बिना किसी दोष के जेल के चार दीवारों के बीच अपनी मासूमियत को खोने में मजबूर होना पड़ेगा और क्या बीतेगा उस नन्ही सी जान पर जिसकी पहली किलकारी अपराधों के चार दीवारों के बीच गूंजेंगी ?

        जवानों के चूक की कीमत परिवारजनों को अपने आँसुओ से चुकानी पड़ रही है । ग्रामीण लगातार दहशत में है और गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ है । ग्रामीण और परिवारजन उनके रिहाई के लिए दर-ब-दर गुहार लगा रहे है अब देखना लाज़मी होगा कि उन्हें रिहाई मिल पाती है या फिर जेल के चार दीवारों में ही उनके बेगुनाही की आवाज़ दब कर रह जाती है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *