आज प्रथम पुण्यतिथि:- प्रो खैरा का स्मृति शेष हो जाना


अचानकमार टाइगर रिजर्व के लमनी छपरवा में आदिवासियों के बीच तीन दशक तक शिक्षा की मशाल जगाये प्रो पीडी खेरा के जीवन ज्योति एक बरस पूर्व हो गया। वे नब्बे बरस के थे।


प्राण चड्डा

पांच दशक पहले वह दिल्ली विवि के शोधार्थियों के दल को लेकर अमरकण्टक की वादी में रहने वाले अत्यंत पिछड़ी जनजाति बैगा पर अध्ययन के लिए हर साल आते और वह उनके संग ऐसे रमे की सेवानिवृत्त होने के बाद वानप्रस्थी बन कर यहां के हो गए। वो बैगा आदिवासियों के सच्चे हमदर्द रहे, उनको वही मौके पर चिकित्सा उपलब्ध करते। हाट बाजार की अन्नदूत सेवा से जोड़ने सूत्रधार बनते। जंगल के संरक्षक बने रहे।
प्रो खेरा लमनी से रोज बस से छपरवा के स्कूल जाते और अलग अलग क्लास में अँग्रेजी पढ़ते। जिससे उनके छात्रों को नौकरी पाने की दौड़ में सहूलियत होती। मेरी उनसे बड़ी पुरानी पहचान रही। चांदनी रात में रेंजर भगत,प्रो खेरा और मैं लमनी बेरियर में साथ बैठ कर चर्चा करते। उनके कांधे पर लटके खादी के झोले में चना मुर्रा भरा रहता। जिसे वह शाम बच्चों और रात भूखे को बांटते।
वो खादी पहनते और पक्के गांधी वादी रहे।लमनी में छोटी सी कुटिया कुछ कपड़े और भोजन का सामान बस यही उनकी पूंजी बाद मरने के बाद मिली। कौन मानेगा की आज के स्वार्थ और नफरत भरी दुनिया में इस आदमी भी हो सकता है जिसके जीवन का पल-छिन जंगल में अभाव में जीते वनवासियों के नाम था।

उनकी निस्वार्थ सेवा पर भी उंगली उठती, एक बार अमरकंटक के किसी साधु ने मुझसे कहा- मुझे तो यह नक्सली लगता है। मुझे बड़ा दुख हुआ, पर मैने जबाव दिया,’आपसे धोबी के वचनों के कारण ही सीता माता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी होगी। वह बहुत शर्मिंदा हुये, मुझसे वचन लिया कभी इस किस्से को उनके नाम से नहीं जोड़ना।
आदमी की उम्र तय है,जो जन्म लेता है उसको जाना होता है। बाप की जगह बेटा, गुरु की जगह शिष्य ले लेता है, अफसर की जगह नया अफसर आ जाता है, लेकिन आदिवासी के पिता तुल्य प्रो पीडी खेरा जैसा कोई और बनेगा,यह नामुमकिन है।

प्राण चड्डा

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