देश

सुबह का भूला शाम को घर आ जाये तो उसे भूला नही कहते, मगर 12 साल बाद मुंह लटकाकर लौटने वाले को गदहा जरूर कहते हैं

शेर अकेला चलता होगा,
देश नही।

उसे एलाइज की जरूरत होती है। ऐसे देश, ऐसे दोस्त, जिन पर आपका, और आपका उन पर अटूट भरोसा हो।

फिर आपके देश का अपना नैतिक आभामंडल हो।
स्पस्ट आदर्श, और मूल्य हों।
◆●
लेकिन अंग्रेजो के मुखबिरों को चरण पूजन के लिए देवता चाहिए। उन्हें बराबरी रास आती नही। कमजोर को मारकर घुटने पर बिठाएंगे।

ताकतवर के सामने बिन कहे, लोट जायेंगे।

अमेरिका का छल्ला बनना बड़ी इज्जत की बात समझते थे।इस चक्कर मे, जम के भद पिटवाय लिए। कभी इजराइल के साथ खड़े हुए, कभी नमस्ते ट्रम्प किया। मासूम भोले भारतीयों को मजमे में बुलाकर, ट्रम्प सरकार बनाने की गुजारिश भी कर ली।

अब 12 साल बाद, रोज रोज डांट खाकर, मुंह लटकाकर वहीं लौटे हैं, जहां से शुरू किया था।

और जो पिछली सरकारों की लाईन थी।।
●●
लेकिन इज्जत अभी भी दूर है।

रूस का भरोसा तोड़ चुके हैं, जबकि सुरक्षा के लिए 70% उसके ही मोहताज हैं। चीन के सामने जुबान नही खुलती, क्योकि दैनिक जीवन की 50% वस्तुओं के लिए उसी के मोहताज हैं।

पास पड़ोस में कोई आपको भाव दे नही रहा। सबको घुसपैठिया, दुश्मन, छोटा, औक़ातहीन कह चुके। सब चीन की गोद मे बैठ, अब ठेंगा दिखा रहे हैं
●●
विदेश नीति के बगीचे में, वही पौधे रोपे जा रहे है, जिनके वृक्ष कुछ बरस पहले जोश खरोश से काट दिए गए थे। दांत निपोरी की नीति 20-30 बरस पीछे ले जा चुकी है।

सुबह का भूला शाम को घर आ जाये तो उसे भूला तो नही कहते। मगर 12 साल बाद मुंह लटकाकर लौटने वाले को गदहा जरूर कहते हैं।
●●
बाकी, गोदी मीडिया की हेडलाइंस आने दीजिये।
यह भी मास्टरस्ट्रोक करार दिया जाएगा।

मनीष सिंह