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सारकेगुड़ा में हुए नरसंहार की दसवीं बरसी पर जुटे हजारों आदिवासी

न्यायिक जांच रिपोर्ट में दोषी करार दिए जाने के बावजूद कार्यवाही न करने पर जताया आक्रोश

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बीजापुर । छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के सरकेगुड़ा में 2012 में हुए भीषण नरसंहार जिसमें छोटे छोटे बच्चों सहित सत्रह लोगों को पैरा मिल्ट्री व छत्तीसगढ़ पुलिस के जवानों ने निर्मलता से मार डाला था, इस मामले की 28 जून को 10वीं बरसी थी । जिस मौके पर 20,000 से ज्यादा आदिवासियों ने इकट्ठा होकर विरोध प्रदर्शन किया और कार्यवाही की मांग की । मृतकों की याद में बनाए गए शहीद स्तंभ के चारों ओर इकट्ठा हुए आदिवासियों ने इस मौके पर अपने साथियों को याद करते हुए जन गीत में आक्रोश के साथ तत्कालीन सरकार के निर्मम कार्यवाही का विरोध किया व वर्तमान सरकार के द्वारा इस मामले पर न्यायिक जांच रिपोर्ट मैं मुठभेड़ को पूरी तरह से फर्जी करार दिए जाने के बावजूद अभी तक दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही नहीं करने को लेकर आक्रोश जाताया

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बीजापुर ज़िले के सारकेगुडा में जून 2012 में सुरक्षाबलों के कथित नक्सल एनकाउंटर में 17 लोगों की मौत हुई थी जिनमें नाबालिग़ भी शामिल थे. इस मामले की जांच के लिए बनी जस्टिस वी.के. अग्रवाल कमिटी ने राज्य सरकार को बीते महीने रिपोर्ट सौंप दी.

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इस रिपोर्ट में कहा गया कि है कि मारे गए सभी लोग स्थानीय आदिवासी थे और उनकी ओर से कोई गोली नहीं चलाई गई थी और न ही उनके नक्सली होने के सुबूत हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लोगों को बहुत क़रीब से ‘दहशत में’ गोली मारी गई जबकि सुरक्षाबल के जवान आपस की क्रॉस फ़ायरिंग में घायल हुए.

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परंपरागत त्यौहार मना रहे थे गांव के लोग

बीजापुर के सारकेगुड़ा में कई पीढ़ियों से मनाए जा रहे परंपरागत त्यौहार के लिए गांव वाले इकट्ठा हुए थे। रमन सरकार ने उन पर बर्बरतापूर्वक हमला करवा कर क्रूर नरसंहार करवाया था। इस नरसंहार के बाद बस्तर के आदिवासियों ने तत्कालीन भाजपा सरकार के खिलाफ आंदोलन किया था। एड़समेटा बीजापुर में किया गया एक साल के भीतर दूसरा नरसंहार था। यहां भी 8 आदिवासियों की बीजपंडुम मनाते समय हत्या कर दी गयी थी । इस मामले में भी जस्टिस वीके अग्रवाल की एकल जांच कमेटी ने 2019 में ही रिपोर्ट प्रस्तुत कर इसे भी फर्जी करा दे दिया है मगर अभी तक इस मामले में भी सरकार ने कोई कार्यवाही ना कर जता दिया है कि वह सुरक्षा बलों के अत्याचार के साथ खड़ी है ।

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पिछले 2 वर्षों से  बस्तर के विभिन्न हिस्से में लगातार शांतिपूर्ण आंदोलन कर अपने साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के सामने कार्यवाही की मांग के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे आदिवासियों ने पूरे देश को जता दिया है कि उनका विश्वास सशस्त्र क्रांति से ज्यादा अभी भी भारत के संविधान और लोकतंत्र पर बना हुआ है। अगर आदिवासियों के इन आंदोलनों को लेकर सरकार यह सोचती है कि इसके पीछे माओवादी हैं तो यह इस बात का पक्का संकेत है कि माओवादियों ने अपनी रणनीति बदली है और वे बातचीत के रास्ते आना चाहते हैं अब पहल सरकार को करनी चाहिए । नहीं तो पिछले 15 वर्षों के दौरान हुए सैकड़ों फर्जी मुठभेड़ व गिरफ़्तारियों और इन पर जांच रिपोर्ट द्वारा मुहर लगने के बाद भी कोई कार्यवाही ना करने को लेकर आदिवासियों का मनोबल टूट सकता है जिसे सशस्त्र संघर्ष और मजबूत होगा जो आने वाले दिनों में सरकार के लिए और चुनौती बनेगा ।

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