शोर का लोकतंत्र और आस्था की राजनीति

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आज का भारत बहसों से नहीं, शोर से चल रहा है। यह शोर टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया तक फैला है। हर मुद्दा तात्कालिक है, हर गुस्सा प्रायोजित, और हर बहस अधूरी। धर्म, जाति और पहचान ये अब सामाजिक विमर्श नहीं रहे, ये राजनीतिक औज़ार बन चुके हैं। जिस दिन कोई मुद्दा जनसरोकार के सवालों की ओर बढ़ने लगता है, उसी दिन नया शोर पैदा कर दिया जाता है। समाज, धर्म और जाति जो कभी पहचान और सह-अस्तित्व के आधार थे अब टकराव की रेखाओं में बदलते दिख रहे हैं। भीड़ के शोर में व्यक्ति की आवाज़ गुम होती जा रही है। हर मुद्दा दो ध्रुवों में बँट जाता है समर्थन या विरोध, बीच की विवेकपूर्ण आवाज़ के लिए कोई जगह नहीं बचती। यह हालात लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं, क्योंकि लोकतंत्र बहस से मजबूत होता है, उन्माद से नहीं।

पिछले एक सप्ताह से देश में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े मुद्दों पर गरमाई बहस यह दिखाती है कि आज आस्था भी राजनीतिक हथियार बनती जा रही है। कोई समर्थन में खड़ा है, कोई विरोध में। लेकिन बहुत कम लोग सवाल पूछने की जगह बचा पा रहे हैं। धर्म जब संवाद के बजाय दमन का माध्यम बन जाए, तो समस्या धर्म में नहीं उसके राजनीतिक इस्तेमाल में होती है। यह विवाद असल में इस बात का प्रतीक है कि हम असहमति को अपमान समझने लगे हैं। जैसा कि सभी जानते हैं प्रयागराज में मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच टकराव देखने को मिला। इस दौरान शंकराचार्य के स्नान कार्यक्रम और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन और उनके समर्थकों के बीच मतभेद सामने आए। मौनी अमावस्या के दिन मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जाने से रोक दिया। प्रशासन का कहना था कि सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन को देखते हुए विशेष व्यवस्था लागू की गई थी। वहीं शंकराचार्य समर्थकों ने इसे परंपराओं का अपमान बताया। स्थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई जब शंकराचार्य समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की खबरें सामने आईं। इसके बाद शंकराचार्य ने मेला और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ धरना शुरू कर दिया। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ प्रयागराज बल्कि देशभर में ध्यान खींचा और सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सार्वजनिक विवादों में आए हों। इससे पहले भी उनके कई बयान और हस्तक्षेप चर्चा और विवाद का कारण बन चुके हैं।

वैसे भी भारत में विवाद कोई नई चीज़ नहीं है। यहाँ विवाद जन्म लेते हैं, पलते हैं, मीडिया में जवान होते हैं और फिर किसी अगले विवाद की आहट में खो जाते हैं। लेकिन कुछ विवाद ऐसे होते हैं जो सिर्फ किसी व्यक्ति या बयान तक सीमित नहीं रहते वे समाज के भीतर चल रहे गहरे अंतर्विरोधों को उजागर कर देते हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर देशभर में जो बहस चल रही है, वह भी ऐसा ही एक मामला है। कोई उनके शंकराचार्य होने पर सवाल खड़े करता है, कोई उनके अहंकारी तेवर का हवाला देकर गलत ठहराता है। ऐसा लगता है यह विवाद किसी एक बयान का नहीं, बल्कि उस भूमिका का है जो एक धार्मिक पदाधिकारी आज के भारत में निभा रहा है या निभाना चाहता है।

भारतीय परंपरा में शंकराचार्य केवल एक धार्मिक गुरु नहीं होता। वह विचार की परंपरा का वाहक होता है संयम, विवेक और तटस्थता का प्रतीक। ऐसे में जब कोई शंकराचार्य बार-बार समकालीन राजनीति, सरकार, नीतियों या सामाजिक समूहों पर तीखे वक्तव्य देता है, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है क्या यह आध्यात्मिक मार्गदर्शन है या वैचारिक हस्तक्षेप ? स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के हालिया वक्तव्यों ने यही प्रश्न फिर से केंद्र में ला दिया है। कभी गाय, कभी संविधान, कभी राष्ट्रवाद, कभी सरकार, विषयों की सूची लंबी है। समस्या यह नहीं कि वे बोल रहे हैं; समस्या यह है कि वे किस स्वर, किस भाषा और किस उद्देश्य से बोल रहे हैं। सदियों से व्यंग्य और कटाक्ष भारतीय बौद्धिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं। कबीर ने भी किया, तुलसी ने भी संकेत दिए। लेकिन वहाँ व्यंग्य आत्ममंथन के लिए था, न कि तालियाँ बटोरने के लिए। आज जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का कोई बयान आता है, तो वह टीवी बहसों की हेडलाइन बनता है, सोशल मीडिया के ट्रेंड में बदल जाता है और फिर राजनीतिक खेमों में बाँट दिया जाता है। एक पक्ष उन्हें “सच्चा धर्मरक्षक” बताता है, दूसरा “राजनीतिक एजेंडा चलाने वाला साधु”। यह विभाजन बताता है कि उनका वक्तव्य अब आध्यात्मिक संवाद नहीं रह गया, वह राजनीतिक हथियार बन चुका है।

यहाँ एक असहज प्रश्न खड़ा होता है, क्या एक साधु की भाषा उतनी ही कठोर हो सकती है जितनी एक राजनीतिक नेता की? जब धर्माचार्य सरकार पर सीधा हमला करते हैं, तो एक वर्ग इसे “साहस” कहता है। लेकिन जब वही धर्माचार्य किसी विशेष सामाजिक या वैचारिक समूह के प्रति कठोर रुख अपनाते हैं, तो वही वर्ग “धर्म की रक्षा” का तर्क देता है। यह दोहरा मापदंड ही विवाद की असली जड़ है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के कुछ वक्तव्यों में यह स्पष्ट दिखता है कि वे खुद को नैतिक सत्ता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। एक ऐसी सत्ता जो चुनी नहीं गई, लेकिन जो चुनी हुई सत्ता को चुनौती देती है।

आज स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की चर्चा केवल इसलिए भी नहीं है कि वे एक शंकराचार्य हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे उस बदलती भूमिका का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें धर्माचार्य आध्यात्मिक मार्गदर्शन से आगे बढ़कर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में सक्रिय दिखाई देते हैं। यह भूमिका भारतीय लोकतंत्र और समाज, दोनों के लिए नए सवाल खड़े करती है। क्या धर्माचार्यों की यह सक्रियता समय की मांग है, या इससे धार्मिक पदों की तटस्थता प्रभावित होती है यह बहस अभी जारी है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद आज के भारत में धर्म, राजनीति और सार्वजनिक विमर्श के संगम पर खड़े एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी हर टिप्पणी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक अर्थ भी ग्रहण कर लेती है।

इस पूरे विवाद में मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। हर बयान को ब्रेकिंग न्यूज़, हर कटाक्ष को राष्ट्रीय बहस और हर प्रतिक्रिया को टकराव बना दिया गया। टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर पूछते हैं— “क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती देश की आवाज़ हैं?” “क्या वे राजनीति में हस्तक्षेप कर रहे हैं?” लेकिन शायद ही कोई यह पूछता है कि क्या हम धर्माचार्यों को इस भूमिका में धकेल रहे हैं, क्योंकि हमें शोर चाहिए, समाधान नहीं?

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सत्यप्रकाश पांडेय

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