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लूट सको तो लूट लो… कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में भी चल रहा था गजब का खेल

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रायपुर. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक खास प्रचारक के रुप में विख्यात कुशाभाऊ ठाकरे का पत्रकारिता में क्या योगदान है इसकी जानकारी देश के अच्छे खासे नामचीन लेखकों और पत्रकारों के पास नहीं है. ( इस खबर के रिपोटर के पास भी नहीं है क्योंकि आज तक पत्रकारिता के किसी भी मूर्धन्य ने इस रिपोटर से यह नहीं कहा कि जीवन में अगर कुछ बनना चाहो तो कुशाभाऊ ठाकरे जैसा पत्रकार बनना.) जब भी कभी श्रेष्ठ पत्रकार बनने या बनाने की बात होती रही तो गणेश शंकर विद्यार्थी के बाद माखनलाल चर्तुवेदी, राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी का नाम लिया जाता रहा. बहरहाल यहां छत्तीसगढ़ के  कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय का जिक्र इसलिए हो रहा है क्योंकि यह विश्वविद्यालय इन दिनों सुर्खियों में है. सुर्खियों की एक वजह यह है कि भूपेश सरकार ने यहां पढ़ने-लिखने और साहित्य से गहरा अनुराग रखने वाले एक कुल सचिव आनंद शंकर बहादुर की तैनाती कर दी है. अब नए कुल सचिव ने तैनात होते ही गंदगी पर चूना छिड़कने का काम बंद कर दिया है. कुल सचिव ने हाल के दिनों में विश्वविद्यालय के अधीन शोधपीठों के चार अध्यक्षों से कामकाज का हिसाब मांग लिया है जिसे लेकर हडकंप मचा हुआ है.

बताइए तो सही क्या किया आपने

कुल सचिव ने माधवराव सप्रे राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोधपीठ की अध्यक्ष आशा शुक्ला को पत्र जारी कर पूछा है कि आप 17 मार्च 2015 से 7 मार्च 2018 तक पदस्थ थीं. अब आप बताइए कि आपने कब-कब मासिक, छमाही या वार्षिक प्रतिवेदन तैयार किया है. पत्र में यह भी उल्लेखित है कि बतौर अध्यक्ष आशा शुक्ला को 32 लाख 37 हजार 97 रुपए का मानदेय दिया गया. उन्होंने राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोधपीठ की अध्यक्ष बने रहने के दौरान कुछ आयोजन भी किए थे जिन पर 3 लाख 90 हजार 826 रुपए का खर्च आया. इसी तरह दीनदयाल उपाध्याय मानव अध्ययन शोध पीठ के अध्यक्ष प्रवीण मैशरी एक जुलाई 2017 से 22 दिसम्बर 2018 तक बतौर अध्यक्ष पदस्थ थे. इस अवधि में उन्हें कुल 12 लाख 75 हजार रुपए का मानदेय दिया गया और उन्होंने जो आयोजन किए उस पर 3 लाख 24 हजार 826 रुपए का व्यय हुआ. श्री मैशरी से भी उनके द्वारा किए गए कामकाज का लेखा-जोखा मांगा गया है. भाजपा नेता चंद्रशेखर साहू के अत्यंत करीबी समझे जाने वाले प्रभात मिश्रा हिन्द स्वराज पीठ के अध्यक्ष थे. वे 26 मई 2018 से 22 दिसम्बर 2018 तक पदस्थ थे. इस दौरान उन्हें चार लाख 64 हजार 516 रुपए का मानदेय दिया गया. उनसे भी पूछा गया है कि बताइए प्रतिवेदन कहां है. कबीर विकास संचार अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष मनोज चतुर्वेदी 5 अक्टूबर 2018 से 22 दिसम्बर 2018 तक तैनात थे. उन्हें भी कुल एक लाख 93 हजार 549 रुपए का मानदेय दिया गया. खबर है कि चारों अध्यक्ष ने अब तक अपने कामकाज का लेखा-जोखा यानी प्रतिवेदन विश्वविद्यालय को अब तक नहीं सौंपा है. अभी यह साफ नहीं है कि विश्वविद्यालय प्रशासन अध्यक्षों पर कोई कानूनी कार्रवाई करेगा या नहीं, लेकिन भूपेश सरकार को एक्शन लेने वाली सरकार माना जाता है इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि सभी अध्यक्ष देर-सबेर नप जाएंगे.

पूर्व अध्यक्षों पर भी गिरेगी गाज

माधव राव सप्रे शोधपीठ पर श्रीमती आशा शुक्ला से पहले परितोष चक्रवर्ती नाम के एक शख्स तैनात थे. खबर है कि उनके कार्यकाल में भी किसी तरह का कोई कामकाज नहीं हुआ. सूत्र बताते हैं कि जल्द ही उन्हें भी प्रतिवेदन देने के लिए नोटिस भेजा जाएगा. इसी तरह कबीर विकास संचार अध्ययन केंद्र में दिल्ली के भाजपा कार्यालय में रहने वाले डाक्टर आर बाला शंकर नियुक्त किए गए थे. वे भी  कभी-कभार ही विश्वविद्यालय में आया करते थे. विश्वविद्यालय में कई तरह के प्रोफेसरों की नियुक्ति भी कर दी गई थी जो महीने में केवल एक बार तनख्वाह लेने के लिए आते थे. पूर्व सरकार ने एक हास्य कवि के पुत्र को भी इस विश्वविद्यालय में स्थायी प्रोफेसर बना दिया है जो इन दिनों अपनी सेवाएं कहीं और दे रहा है.

साभारः अपनामोर्चा.कॉम

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