Home SliderTop Newsछत्तीसगढ़

बांस पर निर्भर इन आदिवासी परिवारों की सुध कौन लेगा ?

331672 img 20190309 wa0108

तामेश्वर सिन्हा

कम्युनिटी जर्नलिस्ट

कांकेर (छत्तीसगढ़)। “मेरा जाति प्रमाण पत्र नहीं बनता है, मुझे स्कूल में जाति प्रमाण पत्र लाने के लिए कहा जाता है, अब घर में बांस से समान बनाने में अपना हाथ बंटाती हूं। मैं आगे पढ़ना चाहती हुं, बांस का समान बनाना मेरा पेशा जरूर है लेकिन में भी नौकरी करना चाहती हुं, “पारधी आदिवासियों के गाँव में सबसे ज्यादा 10वीं तक दुर्गा मंडावी बताती हैं।

दुर्गा मंडावी अपने गाँव में सबसे ज्यादा पढ़ी-लिखी हैं, लेकिन अब जाति प्रमाणपत्र ने बन पाने से नौकरी के लिए कहीं आवेदन भी नहीं कर सकती हैं।

छत्तीसगढ़ प्रदेश के बस्तर संभाग के उत्तर बस्तर कांकेर जिले से 10 किमी की दूरी पर बसे खमढोड़गी गाँव में पारधी आदिवासियों की जिंदगी पूरी तरह से बांस पर निर्भर है। राज्य सरकार ने पारधी जनजाति को घुमन्तु जनजाति घोषित कर रखा है, जिसके कारण पारधी आदिवासियों का जाति अथवा अनेक प्रमाण पत्र बनने में मुश्किलें आती हैं। पारधी आदिवासी अब घुमंतू नहीं है वह एक जगह बस रहे हैं।

पारधी जनजाति की महिला आयति नेताम बताती हैं, “एक बांस से एक टोकनी (टोकरी) बनती है, दिन भर में दो तीन टोकरी बना सकती हूं। इसके लिए 300 के खर्च में तीन टोकनी बनती है, लेकिन बाजार में मेहनत के अनुसार दाम भी नहीं मिल पाता है सरकार ने 150 नग बांस देने का वादा किया था, लेकिन 2016 के बाद से बांस नही दे रही है। आस-पास के गांव से 100 से 120 रुपए देकर एक बांस खरीदती हूँ। जंगल मे अब बांस नही मिलता है।”

छत्तीसगढ़ में पारधी जनजाति की आबादी, कांकेर में 395, कोंडागांव में 503, नारायणपुर में 122, बालौद में 209, बलौदाबाजार में 140 है।

ये आदिवासी समुदाय मुख्यतः बांस से बनी चीजों का निर्माण कर अपना जीवन यापन करते हैं। पारधी आदिवासी खेती किसानी सिर्फ एक सीजन में करते हैं। जिसमे धान की फसल मुख्य ली जाती है पूरी तरह जंगलो पर निर्भर पारधी आदिवासी जंगलो से वनोपज संग्रहण कर अपना जीवन यापन भी चलाते हैं।

RDESController

पारधी जनजाति पर बरहाल अस्तित्व का संकट मंडराने लगा है। जंगल मे बांस काटने पर वन विभाग का प्रतिबंध और उनको मिलने वाले बांस अब सरकार मुहैया कराने में असमर्थ है जिससे अब पारधी आदिवासी बांस के सामान बनाने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

ये मुरिया गोंड़ जाति की ही उपजाति है जिसे कहीं पारधी तो कहीं नहार नाम से जाना जाता है। ये परिवार जंगलों के बीच नदी-नालों या गांव के किनारे पारे-टोले में रहते हैं। दो-तीन साल में जगह बदलते रहते हैं। मुख्य रूप से जंगल में गिलहरी, गोहया, चूहा का शिकार कर भोजन करते हैं। बांस से सूपा, टोकनी आदि बनाकर बाजार में बेचते हैं।

आयति नेताम आगे बताती हैं, “मैं हर रविवार को कांकेर के बाजार में अपनी बनाई टोकनिया कोचिया को बेच देती हूं। बांस से बनाई चीजों से ही हमारा घर चलता है लेकिन अब महंगाई के जमाने में घर चलाना मुश्किल हो गया है। गांव के आस-पास के ग्रामीण कोचिओ से अच्छा मूल्य दे देते हैं अब बांस से बनी चीजों का इस्तेमाल भी कम हो गया है और हो भी रहा है तो उसे डिजाइन बना के ज्यादा दाम में बेचते हैं हमारी चीज अब डिजाइन होकर ज्यादा दाम में बेचा जाता है और हमें कम पैसे मिलते हैं।

पारधी आदिवासी सुखबति बताती हैं, “मैं सोमवार को जंगलों में बांस लेने जाती है मेरे साथ और भी टोले की महिलाएं जाती है। 20 किमी पैदल चल कर मर्रापी गांव के जंगल से बांस लाते हैं। पुरुष बांस लेने जंगल नहीं जाते है महिलाएं ही बांस लेने जाती है, वो घर मे ही रहते हैं। एक महिला ज्यादा से ज्यादा दो बांस जंगल से ला पाती हैं। जंगल से लाए बांस को घर में फाड़ते है फिर उसका समान बना कर बाजार में बेच देते हैं।

जीवकोपार्जन का सबसे बड़ा साधन बांस न मिलने के चलते अब अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। पारधी आदिवासी जंगलो के अंदर बसे है जहाँ मूलभूत सुविधाओं की कमी है। स्कूल अस्पताल पारधी आदिवासियों के बच्चो से पहुंच के बाहर है। लेकिन पारधी आदिवासी के बच्चे भी पढ़ना चाहते है। पारधी आदिवासी भी मुख्यधारा की समाज से जुड़ कर अपना पुश्तैनी काम जिंदा रखने की जदोजहद में लगें हुए है।

साभार : गांव कनेक्शन डॉट कॉम

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *