बस्तर: अब जब सांस ले रहा है, तो रास्ता कैसा हो?

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बस्तर को हमने बहुत लंबे समय तक एक ही नजर से देखा—संघर्ष, नक्सल, बंदूक और असुरक्षा की नजर से। इतनी लंबी अवधि तक यही तस्वीर हमारे सामने रखी गई कि बस्तर का दूसरा चेहरा, जो कहीं अधिक गहरा, पुराना और जीवंत है, लगभग ओझल हो गया। जबकि सच यह है कि बस्तर केवल संघर्ष का भूगोल नहीं है; वह सभ्यता, स्मृति, श्रम, जंगल, जल, कला और समुदाय का प्रदेश है। अब जब हालात पूरी तरह बदल गए है जब भय और असुरक्षा की रात व्यतीत हो गई , नया सबेरा आ गया तब सबसे बड़ा प्रश्न यही है—अब आगे क्या? और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है—अब बस्तर का रास्ता कैसा हो?

मेरे विचार से इसका उत्तर सीधा है—बस्तर को विकास चाहिए। लेकिन ऐसा विकास नहीं जो बाहर से लाकर उस पर रख दिया जाए, बल्कि ऐसा जो यहीं की मिट्टी से निकले, यहीं के लोगों की आकांक्षाओं से बने और यहीं के समाज की भागीदारी से आकार ले। बस्तर को कागजों, फाइलों और योजनाओं से नहीं समझा जा सकता। उसे समझना हो तो उसके गांवों, उसके लोकविश्वास, उसकी निर्णय-प्रणाली और उसके सामाजिक ढांचे को समझना होगा।

उदाहरण के लिए बड़ेडोंगर को देखिए। वहां जब राजा नहीं रहा, तो लोगों ने नींबू को ही “लिमऊ राजा” का प्रतीक मान लिया। एक चट्टान पर बैठकर, धूप-दीप के साथ, लोग सामूहिक रूप से निर्णय लेते हैं। यह परंपरा आज भी जीवित है। यह कोई साधारण लोककथा नहीं, बल्कि बस्तर की सामुदायिक बुद्धि का प्रमाण है। यह बताती है कि यहां निर्णय ऊपर से थोपे नहीं जाते, बल्कि साथ बैठकर बनाए जाते हैं। यही वह बुनियादी बात है जिसे हमें बस्तर के विकास में भी समझना होगा।

दिलचस्प बात यह है कि बस्तर शब्द में ही उसकी विकास-यात्रा के संकेत छिपे हुए हैं। एक मत यह है कि “बस्तर” शब्द “वस्त्र” से बना है। यदि ऐसा है, तो यह केवल भाषिक संयोग नहीं, बल्कि इस भूभाग की सांस्कृतिक और आर्थिक दिशा की ओर संकेत है। बस्तर का कोसा केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि उसकी पहचान, उसका शिल्प और उसकी बड़ी आर्थिक संभावना है। आज जब दुनिया प्राकृतिक, हस्तनिर्मित और टिकाऊ वस्त्रों की ओर लौट रही है, तब बस्तर का कोसा केवल परंपरा भर नहीं रह जाता; वह रोजगार, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण उद्योग और वैश्विक बाजार तक पहुंच का अवसर बन सकता है। यदि इसे सही डिज़ाइन, ब्रांडिंग, गुणवत्ता, विपणन और ई-कॉमर्स से जोड़ा जाए, तो कोसा बस्तर की अर्थव्यवस्था का बड़ा स्तंभ बन सकता है।

बस्तर शब्द की एक और लोक-व्याख्या “बांस तरी” से भी जुड़ती है—अर्थात बाँसों के नीचे या बाँसों के बीच बसा भूभाग। यह व्याख्या भी केवल भाषा की जिज्ञासा नहीं, बल्कि बस्तर की भौगोलिक और आर्थिक सच्चाई की ओर संकेत करती है। बस्तर में बाँस हर जगह है, लेकिन बाँस आधारित उद्योग अभी भी अपनी पूरी संभावना तक नहीं पहुंचा। जबकि आज बाँस केवल टोकरी या परंपरागत उपयोग की चीज नहीं रह गया है। उससे फर्नीचर, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, सजावटी उत्पाद, अगरबत्ती स्टिक, पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग, निर्माण सामग्री और कई प्रकार के सूक्ष्म उद्योग खड़े किए जा सकते हैं। बस्तर में बाँस केवल वन-उत्पाद नहीं, बल्कि एक बड़ी हरित अर्थव्यवस्था की बुनियाद बन सकता है।

बस्तर की असली पूंजी जल, जमीन, जंगल और हाट-बाजार हैं। ये केवल संसाधन नहीं, बल्कि यहां के जीवन-तंत्र के चार स्तंभ हैं। हम अक्सर हाट-बाजार को सिर्फ एक बाजार मान लेते हैं, जबकि बस्तर में हाट का अर्थ कहीं अधिक व्यापक है। हाट यहां आर्थिक संस्था भी है, सामाजिक मंच भी और सांस्कृतिक स्पंदन भी। वहीं खरीद-बिक्री होती है, वहीं खबरें चलती हैं, वहीं रिश्ते बनते हैं, वहीं समाज अपने को देखता है। कई जगहों पर आज भी भरोसा नकद से बड़ा माध्यम है। इसलिए यदि बस्तर की स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है, तो हाट-बाजार को मजबूत करना ही होगा—बेहतर व्यवस्था, भंडारण, स्थानीय उत्पादों के लिए जगह, महिला समूहों के लिए मंच और बाजार से सीधा जुड़ाव देकर।

जल की दृष्टि से भी बस्तर बेहद महत्वपूर्ण संभावना वाला क्षेत्र है। यह इलाका गोदावरी और महानदी के बीच फैला है। दक्षिण बस्तर में कई स्थानों पर भूमि की प्रकृति ऐसी है कि पानी बहुत गहराई तक समाने के बजाय बहकर निकल जाता है। इसका अर्थ है कि यहां जल-संचयन की संभावना अत्यंत बड़ी है। पुरानी कहावत “सात आगर सात कोरी” यूं ही नहीं बनी। यह उस जल-संस्कृति की याद है जिसमें तालाब, आगर और सामुदायिक जल-संरचनाएं जीवन का हिस्सा थीं। बारसूर और बड़ेडोंगर आज भी इस परंपरा की गवाही देते हैं। यदि हम फिर से इस दिशा में गंभीरता से काम करें, तो तालाब, सिंचाई और मछली पालन तीनों मिलकर बस्तर की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा दे सकते हैं।

खेती की दृष्टि से भी बस्तर को नए नजरिए से देखने की जरूरत है। यहां समस्या खेती की कमी नहीं, बल्कि खेती की दिशा की है। कोदो, कुटकी, रागी और अन्य मोटे अनाज यहां की ताकत हैं। यही इस मिट्टी और जलवायु के सबसे स्वाभाविक साथी हैं। आज जब पूरा विश्व मिलेट्स की ओर लौट रहा है, तब बस्तर के पास एक तैयार अवसर मौजूद है। लेकिन इसे केवल उत्पादन तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। जब तक प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच नहीं बनेगी, तब तक किसान को उसका पूरा लाभ नहीं मिलेगा।

जंगल तो बस्तर की पहचान है ही। महुआ, तेंदूपत्ता, चिरौंजी, साल बीज, इमली, लाख—ये सब केवल वन-उत्पाद नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की आय का आधार हैं। लेकिन समस्या यह है कि कच्चा माल यहां से बाहर जाता है और असली मुनाफा कहीं और बनता है। यही वह जगह है जहां नीति को बदलने की जरूरत है। यदि वन-उत्पादों का प्रसंस्करण, पैकेजिंग और मूल्य संवर्धन बस्तर में ही हो, तो जंगल का लाभ सबसे पहले जंगल से जुड़े लोगों तक पहुंचेगा।

बस्तर केवल संसाधनों का भूगोल नहीं, कौशल की सभ्यता भी है। यहां कोसा है, बाँस शिल्प है, धातु कला है, लकड़ी और चमड़े का पारंपरिक काम है। यहां हाथ केवल श्रम नहीं करते, वे सृजन भी करते हैं। जरूरत इस बात की है कि इन कौशलों को “हुनर” कहकर छोड़ न दिया जाए, बल्कि इन्हें उद्योग, डिज़ाइन, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ा जाए। यही वह रास्ता है जहां बस्तर का भविष्य केवल कृषि या वन पर नहीं, बल्कि ग्रामीण रचनात्मक अर्थव्यवस्था पर भी टिक सकता है।

फिर सवाल उठता है कि इतनी संभावनाएं होने के बावजूद हम अभी भी पूरी रफ्तार से आगे क्यों नहीं बढ़ पाए? शायद इसलिए कि हमने कई बार संसाधनों को देखा, लेकिन लोगों की भागीदारी को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। हमने योजनाएं बनाईं, लेकिन हर बार यह सुनिश्चित नहीं किया कि लोग उनके निर्माता भी बनें। हमने ढांचे खड़े किए, लेकिन हमेशा यह नहीं देखा कि उनमें स्थानीय समाज का स्वामित्व कितना है। और बस्तर में यही अंतर सबसे निर्णायक है।

बस्तर में काम करना है, तो बस्तर के तरीके से करना होगा। यहां बैठना होगा, सुनना होगा, समझना होगा। यहां गांव को लाभार्थी नहीं, भागीदार मानना होगा। ग्राम सभा, पारंपरिक संस्थाएं, महिला समूह, युवा, वन समितियां और स्थानीय उत्पादक समूह—इन्हें विकास की प्रक्रिया का केंद्र बनाना होगा। बस्तर में प्रशासन की भूमिका सबसे प्रभावी तब होगी जब वह केवल लागू करने वाला तंत्र न रहकर विश्वास का सेतु बने।

अब बस्तर के लिए यह पर्याप्त नहीं है कि हम सिर्फ यह कहें कि “स्थिति सुधर रही है।” असली सवाल यह है कि क्या बस्तर अब आर्थिक रूप से मजबूत, सामाजिक रूप से आत्मविश्वासी और सांस्कृतिक रूप से सम्मानित दिशा में बढ़ रहा है? स्थायी शांति केवल सुरक्षा से नहीं आती। वह तब आती है जब समाज को महसूस हो कि व्यवस्था में उसका हिस्सा है, निर्णय में उसकी आवाज़ है और विकास में उसका सम्मान है। इसलिए बस्तर को अब सिर्फ शांत नहीं, बल्कि समर्थ बनाना होगा।

बस्तर इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। वह अंधेरे से पूरी तरह बाहर नहीं आया है, लेकिन अब वह केवल अंधेरे की कहानी भी नहीं रह गया। यही वह समय है जब हमें बहुत सावधानी से तय करना होगा कि बस्तर के लिए अगला कदम क्या हो। हमें सिर्फ यह नहीं देखना है कि वहां क्या बनाना है, बल्कि यह भी तय करना है कि कैसे बनाना है, किसके साथ बनाना है और किसकी शर्तों पर बनाना है।

अगर बस्तर की असली ताकत को एक वाक्य में कहा जाए, तो वह यह है कि यहां विकास की जमीन मौजूद है, बस उसे बस्तर की भाषा में पढ़ने की जरूरत है। और बस्तर की भाषा क्या है? जल की भाषा, जंगल की भाषा, हाट की भाषा, कोसा की भाषा, बाँस की भाषा और सबसे बढ़कर—समुदाय की भाषा।

“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” तभी सच होगा, जब उसमें ईमानदारी से एक और तत्व जुड़ जाए—“सबका प्रयास”। और बस्तर में “सबका प्रयास” तभी संभव है, जब विकास लोगों के बीच से निकले, लोगों पर से नहीं।

यही बस्तर की असली दिशा है।

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तारन प्रकाश सिन्हा

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