पत्रकारों की खुजली का नतीजा
- वॉटरगेट कांड, 1970 के दशक की शुरुआत में अमेरिका का एक बड़ा राजनीतिक संकट था, जिसमें अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन बुरी तरह फंस गए.
इसका परिणाम हुआ कि अमरीका के राजनीतिक इतिहास में पहली बार अमरीकी राष्ट्रपति को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
द वॉशिंगटन पोस्ट के पत्रकार बॉब वुडवर्ड और कार्ल बर्नस्टीन की जांच रिपोर्टिंग ने एक बड़े षड्यंत्र का खुलासा किया, जिसमें व्हाइट हाउस द्वारा अपराध को छिपाने के प्रयास, सत्ता के दुरुपयोग और न्याय में बाधा डालना शामिल था.

- वर्ष 1969-70 में अमरीकी पत्रकार सेमोर हर्ष की एक रिपोर्ट से पता चला कि किस तरह से अमरीकी फ़ौजों ने सैकड़ो वियतनामी नागरिकों की हत्या की.
इसका परिणाम यह हुआ कि वियतनाम युद्ध को लेकर अमरीकी फ़ौजों को लेकर अमरीकी लोगों की धारणा बदल गई और लोग वियतनाम युद्ध का विरोध करने लगे.
- भारतीय पत्रकार अरुण शौरी (जो बाद में वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री भी बने) ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एआर अंतुले के ख़िलाफ़ रिपोर्ट प्रकाशित की.
उन्होंने दस्तावेजों के आधार पर बताया कि किस तरह कुछ उद्योगपतियों को सीमेंट का कोटा दिलवाने के लिए अंतुले उद्योगपतियों और कारोबारियों से चंदा ले रहे थे.
इन रिपोर्टों के बाद पहली बार किसी मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोप में पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.
- अमरीकी अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट और कुछ व्हिसिल ब्लोवर रिपोर्ट के प्रकाशन से पता चला कि कैसे सिगरेट बनाने वाली कंपनियां स्वास्थ्य के ख़तरों को छिपाती रही हैं.
1990 के दशक में प्रकाशित इस रिपोर्ट के बाद अरबों रुपयों के मुक़दमे ताक़तवर सिगरेट कंपनियों के ख़िलाफ़ हुए और दुनिया भर में धूम्रपान को लेकर नए क़ानून बनाए गए.
- वर्ष 2013 में ‘गार्डियन’ और ‘वॉशिंगटन पोस्ट‘ में एडवर्ड स्नोडन द्वारा लीक किए गए दस्तावेजों के आधार पर पत्रकार ग्लेन ग्रीनवॉल्ड, लौरा पोइत्रास और अन्य पत्रकारों की रिपोर्ट से पता चला कि किस तरह अमरीकी नेशनल सेक्युरिटी एजेंसी पूरी दुनिया में लोगों की जासूसी करवा रही है.
इसके बाद दुनिया भर में निजता को लेकर एक नई बहस शुरु हुई.
- पनामा पेपर्स के नाम से मशहूर हुई ये रिपोर्ट खोजी पत्रकारों की एक अंतरराष्ट्रीय संगठन (आईसीआईजे) ने जारी की थी. इससे पता चला कि किस तरह से दुनिया भर में लोगों ने टैक्स चोरी करके पैसा पनामा नाम के देश में रखा है.
इस रिपोर्ट का असर यह हुआ कि आईसलैंड के प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को जेल जाना पड़ा. कई देशों ने टैक्स चोरी के ख़िलाफ़ क़ानून बनाए.
ये और बात है कि भारत में मोदी सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की. यहां तक कि छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे के नाम पर भी पनामा में खाता होने का पता चला लेकिन उनका कुछ नहीं बिगड़ा.
- वर्ष 2002 में बोस्टन ग्लोबल ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया कि किस तरह बोस्टन के कैथोलिक चर्च में पादरियों ने बच्चों का यौन शोषण किया.
इसका असर यह हुआ कि दुनिया भर में चर्चों की थू-थू हुई और कई सुधार किए गए.
- सत्य साईंबाबा ने अपने आश्रम में अपने सेवकों के साथ यौन दुराचार किया यह ख़बर भी अख़बारों में छपी.
कुछ भक्तों के बयानों के बाद बीबीसी ने 2004 में एक डॉक्युमेंट्री की प्रसारित की थी. इसका शीर्षक था, ‘द सीक्रेट स्वामी’
- भारत के विभिन्न रिपोर्टरों ने ख़बरें प्रकाशित की थीं कि किस तरह 2002 में गुजरात सरकार ने दंगों को संरक्षण दिया और समय पर कार्रवाई नहीं की.
यह विस्तार से बताया गया कि किस तरह से सरकार ने पुलिस को कार्रवाई करने से रोका और दंगों के दौरान लोगों को बचाने के लिए प्रशासन आगे नहीं आया.
- जब भारत में भाजपा की सरकार थी तब मीडिया रिपोर्ट ने ही रक्षा सौदों में दलाली का मामला उजागर किया.
यहां तक कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण कैमरे में पैसा लेते हुए क़ैद हो गए.
- हवाला का खुलासा मीडिया ने किया तो भाजपा, कांग्रेस सहित कई दलों के नेता इसके चपेट में आए. इस्तीफ़े हुए. नई पार्टी बनी.
चंदे की राजनीति पर वह पहली प्रामाणिक रिपोर्ट थी.
- आचार्य रजनीश ने अमरीका के ओरेगान में अपना एक साम्राज्य खड़ा कर लिया था. वह बहुत विवादों में रहने वाले संन्यासी थे.
यौन दुराचारों से लेकर टैक्स चोरी और अवैध प्रवासियों तक ढेर सारे मामले थे. पर इसका ख़ुलासा होना शुरु हुआ 1984-85 में जब ओरेगान मैगज़ीन और द ओरेगोनियन ने वहां रहने वाले लोगों के हवाले से रिपोर्ट प्रकाशित करनी शुरु की.
ये चंद उदाहरण हैं. बस चंद ही. जिनसे पता चलता है कि पत्रकारों को खुजली होती है तो क्या क्या होता है.
पिछले दिनों छत्तीसगढ़ पधारे धीरेंद्र शास्त्री ने एक पत्रकार वार्ता में पूछा कि किसी पत्रकार को खुजली है तो सवाल पूछ ले.
आश्चर्य है कि किसी पत्रकार को खुजली नहीं हुई. किसी को बुरा नहीं लगा. बुरा लगा तो वे चुप रह गए.
लेकिन चुभा तो होगा.
धीरेंद्र शास्त्री से पहले भी ‘बड़े बड़े’ ‘संत महात्मा’ देखे हैं और उनकी धोती खुलती भी देखी है.
इसके पहले आशाराम बापू, गुरमीत राम रहीम, स्वामी नित्यानंद, स्वामी प्रेमानंद, इच्छाधारी संत स्वामी ब्रह्मानंद, स्वामी मुक्तानंद, स्वामी रामा, बिशप फ़्रैंको मुलक्कल, फ़ादर वेदक्कमुचेरी, कई ऑर्थोडॉक्स पादरी, फ़ारुख़ चिश्ती, नफ़ीस चिश्ती, अय्याज़ शेख़ और इमाम अख़्तर जैसे कई कथित धर्मगुरु हुए हैं जिनका पर्दाफ़ाश मीडिया की वजह से हुआ.
या तो पहले मीडिया ने ख़बर बनाई या फिर किसी शिष्य ने कच्चा चिट्ठा खोला और फिर मीडिया ने उसे बड़ा बनाया.
तो पत्रकारों की खुजली का धीरेंद्र शास्त्री को अभी अंदाज़ा नहीं है.
ये ठीक है कि अभी धीरेंद्र शास्त्री भाजपा की गोद में खेल रहे हैं. तो एक तरह से प्रोटेक्शन मिला हुआ है. क्योंकि मीडिया के मालिक बिके हुए हैं.
पर उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि आशाराम बापू के साथ नरेंद्र मोदी भी डांस कर रहे थे. लेकिन जब कलई खुली तो वे भी किनारे हो गए.
जिस दिन किसी पत्रकार को खुजली हो गई न शास्त्री जी, आप पानी भी नहीं मांग पाएंगे
अभी तो बस आपके मुंह में थर्मामीटर के साथ फ़ोटो आ रही है, महंगे विदेशी चश्मे और जैकेट के साथ फ़ोटो आ रही है.
जिस दिन किसी पत्रकार को खुजली होगी उस दिन कयामत ही आएगी.
पत्रकारों की खुजली मत पूछिए.
तीस साल पत्रकार रहा हूं. आगाह कर रहा हूं.

विनोद वर्मा
