डिजिटल इंडिया में ठगे जा रहे अनपढ आदिवासी

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कांकेरः– ये खबर थोडा सुनने में अजीब जरूर लगेगा कि आजादी 70-71 सालों बाद भी बस्तर के गरीब अशिक्षित आदिवासियों आज भी लूट के शिकार हो रहे हैै।

इस तर्क पर ये कहा जायेगा कि वर्षो पहले बस्तर में इस तरह के हालात थे कि चार,चिरौजी,महुआ,टोरा,लाख,कोदो,कुटकी के बदले नमक देकर आदिवासियों को ठगकर तिजोरियां भरी जाती थी….अब तो कैशलेश का डिजिटेल युग है एक क्लिक में रकम सात संमदर पार चले जाता है । अब हर लेन-देन का डाटा बैकों और सरकार के पास है कोई इनकी तेज नजरों से बच नही सकता। अगर बस्तर में उत्तर-दक्षिण पूरब पश्चिम बस्तर की बात की जाये तो आज भी बस्तर के ऐसे कई इलाकें है जहां लेन-देन व जमा के लिये बैंकों का अभाव है। गरीब अशिक्षित आदिवासी सूखे बांस और सूखे लौकी को खोखला बनाकर अपनी गाढी कमाई को रखने में यकीन रखते है क्या करें ना उनके पास कोई तिजोरी है और ना कोई लाकर क्योंकि उन इलाकों में बैक ही नही है…. अगर कही है भी तो उस बैंक तक पहुंचने के लिए दिनभर पहाड,नदी,नाला जंगल पारकर पैदल नंगे पांव में मीलों का सफर करना पडेगा और समय से पहुंच भी गये और लिंक फेल जाये तो अपनी फूटी किस्मत को कोसते हुये फिर उसी साहूकार के पास जाकर एक अंगूठे के निशान पर आसानी से चंद रूपये ले सकता है चाहे उसके बदले राशन कार्ड आधार कार्ड बैंक पासबुक या बेशकीमती वनोपज को ही कौडी के मोल पर क्यों ना गिरवी रखना या बेचना क्यों ना पडेेे ।

अब इन हालतों में उन इलाकों में बदलते दौर के साथ लेन-देन का तरीका भी डिजिटल हो चुका है साथ ही लूट का तरीका भी डिजिटल हो चला है लेकिन नही बदला तो सिर्फ अंगूठा……क्योंकि आधार कार्ड में फिंगर प्रिंट जो लिंक है….जिससे कोई भी शिक्षित अशिक्षित बडी आसानी से अपने खाते से रकम निकाल या जमा कर सकता है जिसका डिजिटल नाम है ग्राहक सेवा केन्द्र। बस्तर के चारों दिशाओं में से अगर हम उत्तर बस्तर के कांकेर जिले की ही बात कर ले तो जिले में आज भी कुछ इलाकें नक्सल प्रभावित है जहां आज भी बैंक के नाम पर कुछ नही है सिर्फ ग्राहक सेवा केन्द्र के भरोसे अपनी जरूरतों के लिए लेन-देन करना उनकी विवशता है….लेकिन उन इलाकों में इस सेवा के बदले जो संचालक माइंड गेम से मेवा खा रहा है वो अनपढ अशिक्षित आदिवासियों के समझ से कोसों दुर है और थोडा शक हो भी जाये तो मशीन की टेक्निकल बातों को बूझना अंगूठा लगाने जितना आसान थोडी ना हैै।

अब लोग सवाल का खंडन कर सवाल उठायेगें कि डिजिटेल इंडिया में किसी को ठगना आसान नही है……तो एक फेंक फोन काॅल पर पढे लिखे लोग कैसे ठगी के शिकार हो रहे है तो अंगूठे के निशान और डिजिटेल लेन-देन में ये क्यों संभव नही है। हालकि अब वे अशिक्षित आदिवासी चार,चिरौजी,लाख,महुआ,टोरा में नही ठगें जाते……अब तो ठगे जाते है…..वृद्वा-निराश्रित पेंशन,मनरेगा प्रधानमंत्री आवास,तेदुपत्ता बोनस की रकम जो सीधे उनके बैंक खाते में जमा होते है। जब उस रकम को निकालने लिये वे भोले भाले अनपढ गरीब आदिवासी उन सेवा केन्द्रों में पहुंचते है तो आधार का नंबर लिख अंगूठे का डिजिटल निशान लेकर अंग्रेजी भाषा के अंको में रकम मशीन में दर्ज किया जाता है वो अनपढ क्या जाने……अब बडा सवाल ये है कि……जिस ग्राहक ने संचालक को चाही रकम निकालने की बात कही है क्या वो संचालक उतनी रकम मशीन में दर्ज कर निकाल रहा है यदि मांग से ज्यादा रकम ग्राहक के खाते से निकाल कही उसे कम रकम तो नही थमाया दिया जाता। क्योंकि होशियार संचालक जान-बूझकर लेन-देन का पर्ची वाला कागज खत्म होने की झूठी कहानी पहले से तैयार रखता है क्योकि ऐसा नही कहेगा तो मेवा कैसे मिलेगा ऐसे में मीलों पैदल चलकर आये ग्राहक को बिना पर्ची रकम निकालना उसकी मजबूरी है नही तो फिर उसी साहूकार के पास कही अंगूठा लगाना ना पड जाये।

इस पूरे मुनाफे के कारोबार में ग्राहक आज तक लेन-देन की तमाम जानकारी इसलिए समझ नही पाया क्योंकि एक तो डिजिटल मशीन और दुसरा अंग्रेजी भाषा की अज्ञानता ऐसे में जिसने जंगल नदी नाले पहाड के अलावा कभी हिन्दी पाठशाला का मुहं तक नही देखा उस अनपढ आदिवासी को कैसे इस डिजिटल इंडिया का खेल समझ आयेगा….और जब महीनों दिन बाद कोई जागरूक उसे ज्ञान दे भी दे तो क्या फायदा…..ग्राहक सेवा केन्द्र संचालक के टेक्निकल सवालों में उलझकर पुराने लेन-देन की बातों को ही भूल जायेगा…..क्योंकि दुबारा उसे वहां लेन-देन जो करना है। इस लूट के कारोबार में एक ही फर्क है पहले चार चिरौजी के बदले तिजोरिया भरी जाती है अब बिना किसी चार चिरौजी के सेवा के नाम पर मेवा खाया जा रहा है।

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प्रकाश ठाकुर की खबर

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