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जनता ही पाखण्डी है और सरकार की दलाली में मस्त है

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सड़क पर, पटरी पर तड़प तड़प कर मर रहे हजारों मजदूरों की लाशों से आंखे चुरा कर यह चैनल हथिनी को दिलाएगा इंसाफ

मनीष कुमार

गर्भवती हथिनी की असामाजिक तत्वों द्वारा हत्या से अचानक आपको तकलीफ़ हो रही। क्यों भाई?

छत्तीसगढ़ में हर महीने हाथी मर रहे हैं, संख्या घट रही है

अडानी ने जंगलों के ख़तम करने का ठेका लिया है,
केंद्र से लेकर राज्य सरकार जंगल साफ़ करने
इस महान कार्य मे एक दूसरे की मदद कर रही है,

दरअसल जनता को दोगली नीति के साथ जीने की आदत हो गयी है। जब आपमें प्रतिरोध करने की क्षमता नहीं तो घड़ियाल जैसे आँसू का क्या फ़ायदा?

दरअसल आप इस झूठी व्यवस्था के पिछलग्गू हैं, प्रतिरोध से पहले दाएं-बाएं झांक लेते हैं कि इसका कोई सन्देश व्यवस्था के खिलाफ तो नहीं माना जाएगा न।

तब आप को पीड़ा नही होती जब सरगुज़ा या कोरबा में हाथियों की सड़ी गली लाश मिलती है,करेंट से मार दिया जाता है।

केरल में एक हथिनी की मौत ने इतना आहत कर दिया,
की आप को यह भी याद नहीं छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ महीनों में पटाखों से और ज़हरीली कीटनाशक को आटे में डालकर ,खिलाकर हाथियों को मारा गया है।

यहां हर रोज न जाने कितने जंगली जानवर जंगलों पर इंसानी कब्जे और अवैध कटाई के कारण अपने बिल, खोह में ही आत्महत्या कर ले रहे हैं।

सब जंगलों की कटाई पर मौन हैं, कभी सरकार से सवाल करने की हिम्मत नही होती । अभी शोषल मीडिया में दर्द छलका रहे हैं ।

क्योंकि आप आला दर्जे के दोमुँहे हैं जिसे अमुर्दा सोचने समझने वाले संवेदनशील इंसानों का सोचा समझा उत्पीड़न दिखता ही नहीं है जबकि ऐसी क्रूरता जिस पर बोलना निरापद हो, आपकी सुविधाएं बनी रहें, सरकार की किसी किस्म की वक्र दृष्टि की संभावना न हो- आप संवेदना और करुणा की मूर्ति हो जाते हैं।

आप दरअसल इंसान नहीं हुए औजार हो चुके हैं, यह पशुओं के प्रति करुणा नहीं है वरना खनन और बांधो से, प्रोजेक्ट्स को ऑनलाइन स्वचालित पर्यावरण क्लियरेंस से पशुओं को मिलने वाली जलसमाधि आपकी नजर से ओझल थोड़े होती- लेकिन ताकतवर व्यवस्था की क्रूरता तो आपको एकदम ओझल है, उन पटाखों की तरह जो फल में छिपाए गए हैं।

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मनीष कुमार

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