छत्तीसगढ़ से रिक्त हो रही दो राज्यसभा सीटों का समीकरण
इस वर्ष 2026 में राज्यसभा से कुल 73 सांसद रिटायर हो रहे हैं। 09 अप्रैल को छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के दो सांसद श्री के.टी.एस. तुलसी एवं श्रीमति फूलोदेवी नेताम जो कांग्रेस पार्टी से संबद्ध हैं, सेवानिवृत्त हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ से राज्यसभा की कुल 05 सीटें हैं जिसमें फिलहाल 04 पर कांग्रेस के सांसद हैं और 01 पर भाजपा के सांसद हैं। कांग्रेस के सांसद श्री के.टी.एस. तुलसी, श्रीमति फूलोदेवी नेताम जो इस वर्ष अप्रैल में रिटायर हो रहे एवं श्रीमति रंजीत रंजन तथा श्री राजीव शुक्ला हैं जो जून 2028 में रिटायर होंगे, जबकि भाजपा के सांसद रायगढ़ राजघराने से संबद्ध श्री देवेन्द्र प्रताप सिंह हैं जो अप्रैल 2030 तक अपने पद पर रहेंगे। प्रदेश की रिक्त हो रही दो सीटों पर कांग्रेस को एक सीट का नुकसान होने जा रहा है, स्वाभाविक है वह सीट सत्तारूढ़ भाजपा के खाते में जाएगी।
प्रदेश में कांग्रेस के शासनकाल 2018 से 2023 के कार्यकाल में उसके भारी बहुमत के आधार पर 04 सांसद थे तो इस बार भाजपा के शासनकाल 2023 से 2028 में यह संख्या घट जाएगी। भाजपा को इसका लाभ होगा। सत्ता में आने पर उसने राज्य से ही रायगढ़ राजघराने के गोंड आदिवासी समाज से आने वाले श्री देवेंद्र प्रताप सिंह को राज्यसभा भेजा है। कांग्रेस ने अपने शासनकाल में तब राज्य के मूल निवासी से केवल एक सांसद श्रीमति फूलोदेवी नेताम जो बस्तर संभाग से, गोंड आदिवासी समाज से आती हैं को ही उच्च सदन भेजा था, शेष तीनों सीटों पर दिल्ली से भेजे गए नामों को अवसर दिया गया था। तुलसी जी अल्पसंख्यक सिक्ख समाज से, रंजीत रंजन जी सिक्ख समाज की बेटी और यादव समाज की बहू हैं और राजीव शुक्ला जी सामान्य ब्राह्मण समाज से आते हैं। तत्कालीन कांग्रेस सरकार को कम से कम एक और सीट पर मूल छत्तीसगढ़िया को अवसर देना चाहिए था। मैंने तब तात्कालीन प्रदेश प्रभारी श्री पी.एल. पुनिया को 04 सीटों पर नाम सुझाए थे। सामान्य वर्ग से श्रीमति करुणा शुक्ला, ओबीसी वर्ग से तत्कालीन अभनपुर विधायक श्री धनेन्द्र साहू, अनुसूचित जनजाति वर्ग से श्री अरविंद नेताम तथा अनुसूचित जाति वर्ग से स्वयं श्री पी एल पुनिया जी। दुर्भाग्य से इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया अन्यथा राजनैतिक परिस्थितियां शायद दूसरी होतींं। कांग्रेस से वर्तमान के उन तीन सांसदों का बड़ा लाभ प्रदेश तथा पार्टी को नहीं मिला क्योंकि वे प्रदेश में बिल्कुल भी सक्रिय नहीं रहे। सांसद मनोनीत होने के बाद प्रदेश से उनका संपर्क लगभग टूट सा गया, पार्टी के आम कार्यकर्ताओं, जनता से उनका जुड़ाव बिल्कुल नहीं रहा न ही प्रदेश की राजनीति में वे सक्रिय रहे। इसका खामियाजा पार्टी को भाजपा से सत्ता संघर्ष में भी भुगतना पड़ा। भाजपा ने बाहरी सांसदों के मुद्दे पर कांग्रेस को अनवरत घेरे रखा, जिसका कोई प्रभावी काट पार्टी के पास नहीं था क्योंकि उन सांसदों का प्रदेश में कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं रहा।
अप्रैल में रिक्त हो रही दो सीटों जिसमें दोनों पार्टियों को एक एक सीट मिलेगी इस पर लॉबिंग तेज हो गई है। इच्छुक चेहरे सब कुछ झोंककर अपनी बर्थ कन्फर्म करने में जुट गए हैं। मुझे भाजपा में एक सीट पर नाम तय करने में जहां बहुत दिक्कत में नहीं दिखती वहीं कांग्रेस में उस एक सीट को लेकर काफी ऊहापोह है, एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति है। प्रदेश कांग्रेस इस उलझन को सुलझाने में माथा पच्ची कर रही है कि किसे राज्यसभा भेजा जाए। आदिवासी समाज से आने वाली फूलो देवी नेताम के रिटायर होने पर जहां आदिवासी वर्ग इस पर अपना स्वाभाविक दावा मानता है, वहीं अनुसूचित वर्ग भी इस बार अपने लिए यह सीट चाहता है तो प्रदेश का सबसे बड़ा वर्ग ओबीसी भी इसके जरिए अपना प्रतिनिधि दिल्ली भेजना चाहता है, दूसरी तरफ मौजूदा राजनैतिक परिवेश में पार्टी की ओर से सामान्य वर्ग का दावा इस सीट पर बेहद कमजोर है। प्रदेश कांग्रेस की एक बड़ी उलझन यह भी है कि कहीं अंतिम समय में आलाकमान से कोई नाम न आ जाए क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी अब उस स्थिति में नहीं है कि अपने बड़े नेताओं को कहीं से भी राज्यसभा भेज सके।
मेरी राजनीतिक समझ कहती है कि भाजपा अपनी एक पक्की सीट पर अपने राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष श्री नितिन नबीन को राज्य से उच्च सदन भेज सकती है। वे छत्तीसगढ़ के प्रभारी भी रहे हैं और राज्य की राजनीति से भलीभांति परिचित हैं। अगर राज्य से ही किसी चेहरे को भेजने की बात हुई तो यह सीट प्रदेश के सामान्य वर्ग या अनुसूचित वर्ग को ही जाएगी, तय है। कांग्रेस को चूंकि एक ही सीट मिलनी है इसलिए वहां ज्यादा भ्रम की स्थिति है। जहां एसटी वर्ग से प्रदेशाध्यक्ष दीपक बैज, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम, पूर्व मंत्री अमरजीत भगत रेस में हैं, वहीं अनुसूचित जाति वर्ग से पूर्व मंत्री शिव डहरिया तो ओबीसी वर्ग से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पूर्व मंत्री ताम्रध्वज साहू, नेता प्रतिपक्ष डॉ चरणदास महंत रेस में हैं। सामान्य वर्ग से पूर्व मंत्री टी एस सिंहदेव, जय सिंह अग्रवाल भी कतार में हैं। इतनी लंबी फेहरिस्त में कांग्रेस पार्टी के लिए किसी एक नाम पर सहमति बनना बड़ी टेढ़ी खीर है। मेरे विचार से इस भ्रमजाल से बाहर निकलने का एक सबसे बढ़िया हल यह है कि प्रदेश कांग्रेस यहां से अपने रिटायर हो रहे राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खड़गे को नामांकित करे। अनुसूचित जाति वर्ग में देश भर के सबसे बड़े चेहरे खड़गे जी के नाम पर किसी को कोई दिक्कत या आपत्ति नहीं होगी और प्रदेश कांग्रेस की सारी उलझनें केवल इस एक नाम से दूर हो जाएगी। दीर्घ अनुभवी खड़गे जी के राज्यसभा में प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने का लाभ भी प्रदेश तथा पार्टी को मिलना तय है, वहीं उनके नामांकन से विपक्षी भाजपा को भी मुखर विरोध का अवसर नहीं मिलेगा। कांग्रेस के भीतर वर्तमान राजनैतिक उहापोह में हर मर्ज का एकमात्र समाधान खड़गे जी का नाम है। प्रदेश कांग्रेस को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। परमजीत बॉबी सलूजा,
