ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे अमेरिका का ‘डर्टी सीक्रेट’: 600 न्यूक्लियर मिसाइलों की योजना,झूठ और आज मंडराता खतरा!

शीत युद्ध (Cold War) के दौर में दुनिया दो खेमों में बंटी हुई थी,अमेरिका और सोवियत यूनियन। परमाणु युद्ध का डर इतना गहरा था कि महाशक्तियाँ ऐसे कदम उठा रही थीं,जो आज के मानकों पर न केवल अमानवीय बल्कि पर्यावरणीय अपराध भी माने जाएंगे। इसी दौर का एक कम जाना-पहचाना लेकिन बेहद खतरनाक अध्याय है ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे 600 न्यूक्लियर मिसाइलें छिपाने की अमेरिकी योजना,जिसे Project Iceworm कहा गया।
Project Iceworm: एक सैन्य प्रयोग या रणनीतिक धोखा?
1959 में अमेरिका ने गुप्त रूप से एक योजना पर काम शुरू किया,जिसके तहत ग्रीनलैंड की मोटी बर्फ की चादर के नीचे हजारों किलोमीटर लंबी सुरंगों का नेटवर्क बनाया जाना था। इन सुरंगों में 600 से अधिक बैलिस्टिक न्यूक्लियर मिसाइलें तैनात करने की तैयारी थी। रणनीतिक रूप से ग्रीनलैंड बेहद अहम था:
- सोवियत यूनियन के सबसे नज़दीकी रास्ते पर
- रडार से लगभग अदृश्य
- किसी हमले की स्थिति में त्वरित जवाब की क्षमता
अमेरिका का मानना था कि बर्फ प्राकृतिक कवच बनेगी और मिसाइलें दुश्मन की नजर से हमेशा छिपी रहेंगी।
डेनमार्क को धोखे में रखा गया
ग्रीनलैंड उस समय डेनमार्क के अधीन था और डेनमार्क की नीति थी न्यूक्लियर हथियारों से मुक्त क्षेत्र। इसके बावजूद अमेरिका ने डेनमार्क सरकार को यह कहकर गुमराह किया कि वहां सिर्फ एक वैज्ञानिक रिसर्च बेस बनाया जा रहा है। असल में बना:
- Camp Century बर्फ के नीचे पूरा सैन्य बेस
- न्यूक्लियर रिएक्टर से चलने वाली बिजली व्यवस्था
- सैनिकों की बैरक,लैब्स और सुरंगें
यह न सिर्फ एक सैन्य छल था बल्कि एक संप्रभु देश की नीतियों का खुला उल्लंघन भी।
विज्ञान ने सैन्य घमंड तोड़ा
Project Iceworm की सबसे बड़ी विफलता थी प्रकृति को गलत समझना। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने मान लिया था कि ग्रीनलैंड की बर्फ स्थिर है लेकिन हकीकत में:
- बर्फ लगातार खिसकती रहती है
- दबाव से सुरंगें मुड़ने और टूटने लगीं
- मिसाइल सिस्टम अस्थिर हो गया
कुछ ही वर्षों में यह साफ हो गया कि यह योजना तकनीकी रूप से असंभव और अत्यंत खतरनाक है। 1966 तक Project Iceworm को चुपचाप बंद कर दिया गया।
छोड़ा गया जहर: आज का असली संकट
Camp Century को खाली करते वक्त अमेरिका ने रेडियोधर्मी कचरा,डीज़ल ईंधन,जहरीले रसायन बर्फ के नीचे ही छोड़ दिए। तब सोचा गया कि हमेशा की बर्फ इन्हें दफन रखेगी। लेकिन आज ग्लोबल वॉर्मिंग इस धारणा को तोड़ रही है। वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि:
- बर्फ पिघलने पर यह कचरा बाहर आ सकता है
- समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होगा
- स्थानीय इनुइट समुदायों के लिए गंभीर खतरा पैदा होगा
जियोपॉलिटिकल संदर्भ: क्यों फिर चर्चा में है ग्रीनलैंड?
आज जब आर्कटिक बर्फ पिघल रही है,नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं ओर अमेरिका,रूस और चीन आर्कटिक में प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। ग्रीनलैंड फिर से रणनीतिक केंद्र बन गया है। इसीलिए अमेरिका की पुरानी योजनाओं और छिपे सच पर दोबारा सवाल उठ रहे हैं।
निष्कर्ष: सुरक्षा के नाम पर छोड़ी गई असुरक्षा
Project Iceworm सिर्फ एक असफल सैन्य परियोजना नहीं था बल्कि यह दिखाता है कि महाशक्तियाँ कैसे सहयोगी देशों से सच छिपाती हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पर्यावरण को बलि चढ़ाया जाता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए अदृश्य खतरे छोड़ दिए जाते हैं। ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे दबी यह कहानी हमें याद दिलाती है परमाणु हथियार सिर्फ युद्ध के समय नहीं शांति में भी खतरा बने रहते है #facebookpostシ #facebookviral #factsonly #facebookreel #DonaldTrump #Geopolitics #PoliticalDebate #facts #AmericaFirst #follow #fb #nuclear #Nuclearweapon #science #sciencefiction #factsdaily #FactsMatter #FacebookPage #follower #followersreels #followme #followerseveryone #america #greenland #denmark #politics #facebookreelsviral
