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आदिवासी अपने हक की लड़ाई लड़ना जानते हैं , अपनी लड़ाई के वे खुद हीरो हैं, किसी को श्रेय लेने की जरूरत नहीं

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दंतेवाड़ा । “मनीष कुंजाम हमेशा से बस्तर के आदिवासियों के खिलाफ थे। आदिवासियों में सबसे बड़ी जो कमी हैं वह हैं एक दूसरे का टांग खीचना ” यह कहना है आदिवासी पत्रकार और नेता लिंगाराम कोडोपी का , उन्होंने यह बात मनीष कुंजाम द्वारा एक अखबार में सोनी सोरी की के नेतृत्व में फर्जी नक्सली मामलों में बंद आदिवासियों की रिहाई के लिए गत दिनों हुए आंदोलन के विषय में उसके असफल होने का दावा किये जाने के बाद कही ।

सोशल मीडिया में जारी अपने वक्तव्य में लिंगाराम कोडोपी ने कहा है कि संविधान का सम्मान तो आदिवासी हमेशा से करते आये हैं। हर आंदोलन को राजनैतिक करने की कोशिश करेंगे तो आदिवासी कैसे बचेंगे, रहा सवाल सोनी सोरी के श्रेय की यह महिला पहले से ही सरकार द्वारा पीड़ित हैं इनको श्रेय की क्या जरूरत हैं । आदिवासियों की सुरक्षा के लिए हर राजनैतिक आदिवासी नेता का सोनी सोरी ने बस्तर संभाग के जिलों में स्वागत किया हैं। जब भी कोई आदिवासी आंदोलन हुआ, हर आंदोलन में राजनैतिक आदिवासी नेताओं को मौका मिला । लेकिन कोई सामने आने से पीछे हटा।

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लिंगा का आरोप है कि मनीष कुंजाम हमेशा से अपने आप को श्रेय देने की कोशिश करते हैं कि वे आदिवासियों के हितैषी हैं लेकिन लड़ने वाले तो असल में वह आदिवासी हैं जो वास्तव में मैदान में सघर्ष कर रहे हैं। सलवा जुडुम की लड़ाई गांव के आदिवासियों ने लड़ा केवल मनीष कुंजाम ने नहीं लड़ा, मनीष कुंजाम केवल सर्वोच्च न्यायालय में आवेदक के रूप में थे। आवेदक बनकर दुनिया मे हीरो बन गये। आज वही लड़ाई बस्तर संभाग के जिलों में 1000 आदिवासी नेतृत्व कर लड़े तो गलत क्या हैं? शांति पूर्ण तरीके से आदिवासी लड़े तो हर कोई हीरो हैं। लड़ने वाला विजेता हैं। आंदोलन में 12,15 हजार आदिवासी लड़े तो वे भी जल, जंगल, जमीन की लड़ाई में हीरो हैं। हर लड़ाई लड़ने वाला आदिवासी नक्सलवादी नहीं होता, बस्तर के जल, जंगल जमीन की लड़ाई सिर्फ मनीष कुंजाम ने नहीं बल्की हिमांशू कुमार, शालिनी गेरा, संतोष यादव, ईशा खंडेलवाल, निकिता, कमला काका, कमल शुक्ला, प्रभात सिंह, संजय पंत, सुकल प्रसाद नाग, रामदेव बघेल ऐसे कई नाम जो आज भी किसी न किसी रूप से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से लड़ रहे हैं। मनीष कुंजाम को खुद के श्रेय की चिंता हैं कि कहीं उनका श्रेय न छीना जाये। मनीष के विचार से लगता हैं कि ,मनीष कुंजाम को आदिवासी नेतृत्व कर्ताओ से जलन होने की बू आ रहीं हैं।

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