बस्तर के आदिवासियों के मृतक स्तंभ : परंपरा और दर्शन
साथियों, बस्तर के आदिवासी किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी स्मृति में पत्थर या लकड़ी के मृतक स्तंभ स्थापित करते हैं। ये स्तंभ केवल यादगार नहीं होते, बल्कि मृत आत्मा के सम्मान और सामाजिक मान्यता के प्रतीक होते हैं। उत्तर बस्तर में सीमेंट से चबूतरा बनाने का रिवाज है।

मृतक संस्कार पूर्ण होने के बाद इसे स्थापित किया जाता है । दक्षिण बस्तर में स्थानीय पत्थरों या साल- सागौन जैसी लकड़ी से यह स्तंभ बनाया जाता है। स्तंभों पर मानव आकृतियाँ, पशु, शिकार दृश्य, नृत्य, हथियार आदि उकेरे जाते हैं। कई बार स्तंभ पर मृतक के जीवन से जुड़ी विशेषताएँ दर्शाई जाती हैं। जैसे वह शिकारी था, नर्तक था या गांव का प्रमुख व्यक्ति।
तस्वीर में दिखाया गया है कि एक महिला कुर्सी पर बैठी है। इससे प्रतीत होता है कि यह महिला गांव की प्रतिष्ठित परिवार की है। आदिवासियों में ऐसी मान्यता है कि मृतक स्तंभ स्थापित होने से आत्मा को शांति मिलती है। यह स्तंभ मृत व्यक्ति को पूर्वजों की श्रेणी में स्थापित करता है। परंपरा बताती है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि पूर्वज रूप में उनका समाज में पुनः प्रवेश है।
कहते हैं बस्तर में लिखित इतिहास कम रहा है। ऐसे में मृतक स्तंभ लोक इतिहास का कार्य करते हैं। इन स्तंभों से यह जाना जा सकता है कि गांव में कौन-कौन से लोग रहे, उनका सामाजिक योगदान क्या था, उस काल की जीवन शैली कैसी थी।
बस्तर के कई गावों में आज भी यह परंपरा जीवित है, हालांकि आधुनिकता, वन कानून, आर्थिक कारणों के चलते कुछ बदलाव अवश्य आए हैं। फिर भी मृतक स्तंभ आज भी बस्तर की आत्मा और पहचान बने हुए हैं।
बस्तर के मृतक स्तंभ केवल पत्थर या लकड़ी सीमेंट से बना चबूतरा नहीं हैं, वे आदिवासी समाज की स्मृति, श्रद्धा और इतिहास के मौन दस्तावेज़ हैं, जिनमें जीवन और मृत्यु दोनों का दर्शन समाया हुआ है।
