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जानलेवा फ्लोराइसिस बीमारी की चपेट में बचपन…

भावी पीढ़ी और पर्यावरण के भयंकर विनाश के आधार पर लिखी जा रही है अंधे विकास की गाथा

तमनार के कोल ब्लाक क्षेत्र(जहां महाजेनको की जनसुनावाई प्रस्तावित है)के गांवों में बच्चों के स्वास्थ्य पर सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव

नितिन सिन्हा की✒से

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रायगढ़:- देश और राज्य में जहां एक तरफ औद्योगिक विकास की द्रुतगामी गति जारी है। तो वहीं दूसरी तरफ प्रकृति और आम जनमानस पर इस विकास का बड़ा विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। छःग राज्य के अधिकांश खनन प्रभावित जिलों में औद्योगिक विकास अर्थात विनाश की समानांतर गति चल रही है। हाल ही में रायगढ़ जिले का तमनार कोल ब्लॉक क्षेत्र तब प्रकाश में आया जब इस क्षेत्र में 27 जून 2019 को महाजेंको कम्पनी की प्रस्तावित जनसुनवाई होनी थी। जिसका ग्रामीणों ने जबरदस्त विरोध भी किया था। इसके पीछे की वजह यह थी कि इस क्षेत्र के अधिकांश गावों में पहले से ही विभिन्न निजी कम्पनियों जिनमें जिंदल,नलवा,मोनेट,निको जयसवाल जैसी दर्जनों कम्पनियों के द्वारा लगातार कोल खनन किया जा रहा है।। बीते 10 सालों में तमनार कोल ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले करीब 56 गावों (जिनमें कुंजेमुरा,ढोलनारा,सरईटोला,मुड़ागाँव,पाता,गारे,रोडोपाली,चितवरी और डोलेसरा जैसे अन्य कई ग्रामों) की हजारों हेक्टेयर भूमि पहले से हीअंधाधुंध कोल खनन से बरबाद हो चुकी है। जिनमें फैले सघन वनों का पूरी तरह से नाश हो चुका है,यही नही इन गांवों की भू-जल का स्तर खुले खदानों की वजह से नियमित रूप से गिरता गया है। इधर बढ़ते माइनिंग से ग्रामीणों के स्वास्थ्य और संस्कृति पर भी बड़ा बुरा प्रभाव पड़ा है। दूसरी तरफ कोल खनन से प्रभावित गांवों के हजारों ग्रामीणों को न तो शासन के निर्धारित दरों पर भूमि का मुआवजा मिला न ही उनके विधि संवत पुनर्स्थापना की व्यवस्था की गई। बीते दस सालों के अंधे औद्योगिकरण का सर्वाधिक दुष्प्रभाव तमनार के कोल बेल्ट के अंतर्गत पड़ने वाले गांवों में पड़ा। औद्योगिक शोषण की वजह से असमान्य जनजीवन और अंधेरे भविष्य को ध्यान में रखते हुए बड़ी संख्या में ग्रामीण क्षेत्र में औद्योगिकरण के विस्तार के तमाम सरकारी प्रयासों के घोर विरोधी हो गए। इधर देश-प्रदेश की सरकारें और जिला प्रसाशन भी एक के बाद एक प्रति वर्ष विभिन्न निजी कंपनियों की जनसुनवाई करवाने में लगा रहा। इधर तमनार तहसील के अलावा रायगढ़ जिले के दूसरे विशाल वनक्षेत्र वाले तहसीलों में जिनमें घरघोड़ा,धरमजयगढ़ और खरसिया में औद्योगिकरण का कुचक्र चलना शुरू हो गया। यहां भी देशभर की दर्जनों बड़ी निजी कंपनियों के अलावा secl को भी कोल ब्लॉक आबंटित किया गया । इन तहसीलों सैकड़ों गावों के हजारों हेक्टेयर भूमि की वन संपदा नष्ट हो गई। कभी हाथियों और दूसरे वन्यजीवों के लिए संरक्षित वन क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा आज खुले कोल खदान में तब्दील हो गया। जिले का पर्यावरण और जन-स्वास्थ्य बुरी तरह बिगड़ने लगा। यद्यपि इस वर्ष पर्यावरण को हुई भारी छति के दुष्प्रभाव का एहसास लोगों सीधे तौर पर हुआ है। जिले के अधिकान्स प्राकृतिक एवं बड़े- कृत्रिम जलस्त्रोत न केवल भीषण गर्मी से सुख गए हैं। बल्कि भूगर्भ जल स्तर भी न केवल बड़ी तेजी से गर्त पर आ गया है,बल्कि उसमें विभिन्न प्रकार के हानिकारक रसायनों का दुष्प्रभाव भी हुआ । जबकि जिले भर में 16 सौ हैंडपंप सूखे पाए गए। वहीं शहर और जिले की जीवन दायनी केलो नदी सहित महानदी में भी सिर्फ नाम मात्र का पानी ही बचा रहा है। जबकि पिछले साल भूगर्भ जल का स्तर 26.5 मीटर था वह इस साल एक मीटर तक और गिर गया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस साल जिले में जमीन का पानी औसत स्तर 24 से 42 मीटर की नीचे चला गया है। अभी जिले के 10 ब्लॉकों के करीब 525 गांव को खतरे के स्तर (डार्क जोन) में रखा गया है।
यद्यपि प्रति वर्ष बिगड़ते पर्यावरण के बीच इस साल 2019 में पूरे जिले के भू-जल स्तर में रिकार्ड गिरावट दर्ज की गई है। मई-जून में जिले के करीब 15 हजार हैंडपंपों में से 16 सौ हेडपम्पो ने पानी देना बंद कर दिया है। वही 25 फीसदी से अधिक हैंडपंपों से लाल या मटमैला पानी निकलने लगा है।

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तमनार के मुड़ागांव और सरईटोला में फ्लोराइड से दुष्प्रभावित बचपन,पर्यावरण सहित भावी पीढ़ी के लिए गहरे संकट की पहचान

रायगढ़ जिले के विभिन्न तहसीलों के करीब 150 गांवों में दूषित भूगर्भ जल का दुष्प्रभाव देखा गया है। इनमे तमनार के कोल ब्लाक क्षेत्र के दो गांव सरइटोला और मुड़ागांव में फ्लोराइड युक्त भूगर्भ जल के नियमित उपयोग का सबसे अधिक दुष्प्रभाव बीते कई सालों से पड़ता आ रहा है। आज भी इन दो गांवों के करीब 125 जन-सामान्य और 45 बच्चों में फ्लोराइड युक्त मटमैले पानी पीने का दुष्प्रभाव देखा जा सकता है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि फ्लोराईसिस की चपेट में आये इन दो गांवों के अलावा अभी हाल ही में जिस महाजेंको कम्पनी को आबंटित कोल खदानों के प्रस्तावित जनसुनवाई स्थगित की गई है। उसके चपेट में 12 अन्य गांव भी आएंगे। इस लिहाज से जनसुनवाई के विरोध में इन सभी 14 गांवों के हजारों ग्रामीण एक साथ उठ खड़े हुए। इस बीच जब हमनें फ्लोराईसिस से ग्रस्त इन दो गांवों की वस्तुस्थिति जानने का प्रयास किया तो पाया कि आज भी इन गांवों के करीब 45 से 50 बच्चों में बीमारी का दुष्प्रभाव देखा जा सकता है। वही कुछ अधेड़ ग्रामीण और महिलाओं में भी फ्लोराईसिस बीमारी के लक्षण मिले इस बीमारी के प्रमुख कारणो में से एक पीने के पानी अर्थात भूगर्भ जल स्रोत में फ्लोराइड नामक विषैले रसायन का मिश्रण होना है। जिससे पीड़ित रोगी के शारीरिक विकास में पूरी तरह से बाधा तो उतपन्न होती ही है। बल्कि उसके शरीर की कई जगह की अस्थियां और दांत टेढ़े-मेढ़े,अविकसित हो जाते है। कुछ लोगों में कूबड़ निकलने,आँख भेंगी होने,हाँथ पैर की उंगलियों के मूड जाने जैसा विकृत लक्षण भी दिखते हैं । ग्राम सरईटोला के सरपंच,सचिव और पटवारी ने फ्लोराईसिस पीड़ित परिजनों की न केवल पीड़ा हमें बताई बल्कि कुछ फ्लोराईसिस पीड़ित बच्चों से हमें प्रत्यक्ष मिलवाया भी। जिनमें इस बीमारी के दुष्प्रभाव को देखने के बाद तो हमारे होश ही उड़ गए। हमने विचार किया कि हमारी भावी पीढ़ी को इस हाल में देखकर भी कैसे देश-प्रदेश की सरकारें क्षेत्र में अतिरिक्त कोल खदान खोले जाने पर जोर दे सकती है.? लोकतांत्रिक सरकारों का ऐसा असंवेदनशील होना या बचपन छीन कर विकास किये जाने के प्रयास को कहाँ तक सही ठहराया जा सकता है.? वो भी तब जब कभी सघन वन क्षेत्र और प्रचुर वनसंपदा की पहचान वाले तमनार कोल ब्लाक क्षेत्र के इन गांवों में साल प्रदेश का सबसे उच्च तापमान लगभग 49.1डिग्री के सांथ दर्ज किया गया हो। साथ ही कुछ गांवों में भूगर्भ जल स्तर 700 फ़ीट तक नीचे जा चुका हो। हालांकि यहां बीते कुछ साल पहले पहले शासन ने वाटर ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना तो की है। परन्तु फिल्टर प्लांट के निर्माण में किया गया भ्रस्टाचार और लापरवाही से उसकी उपयोगिता अब भी शून्य कही जा सकती है। तीन वॉटर ट्रीटमेंट प्लांटों में से एक बीते कई महीनों से बन्द पड़ा है। बाकी दो प्लान्ट से फ्लोराइड मुक्त जल बिजली के रहने पर ही निर्भर है। वहीँ फ्लोराइसिस बीमारी से ग्रस्त ग्रामीणों के स्वास्थ्य लाभ के सरकारी प्रयास भी आधे-अधूरे कहे जा सकते है। ग्रामीण अपने खर्च पर 15 किमी दूर तमनार अस्पताल में जाकर यदा-कदा ही इलाज करा पाते हैं।

क्या कहते है विशेषज्ञ

“जिले के इन क्षेत्रों के गांवों में लगातार बेहिसाब कोल खनन से पहले ही पर्यावरण और जन-सामान्य का जीवन पूरी तरह से बिखर गया है। बड़ी संख्या में जिले के लोग कृत्रिम आपदा (प्रदूषण,सड़क और औद्योगिक हादसों) में मारे जा रहे है। साशन एवं स्थापित कम्पनियों की विस्थापन और पुनर्वास पालिसी ढकोसला बन कर रह गई है। स्थानीय ग्रामीण एवं किसानों का अंधाधुंध शोषण हुआ है। उन्हें उनकी जल,जंगल,जमीन के अलावा पारम्परिक रोजगार से वंचित करने के अलावा स्थानीय कम्पनियों में योग्यता अनुरूप नौकरियां भी नही दी गई है। भूमि की वास्तविक कीमत मुआवजे को लेकर भी उन्हें धोखा ही दिया गया है। इन सबके बावजूद एक और बाहरी एवं बड़े कम्पनी की अवैधानिक जनसुनवाई कैसे सम्भव है।– राजेश त्रिपाठी जनचेतना

आपने अभी कोल ब्लॉक के दुष्प्रभाव वाले दो गांवों मुड़ा गांव और सरई टोला की समश्याएं देखी है। अंधे औद्योगिकरण और लगातार कोल खनन से प्रभावित सेकड़ो दूसरे गांवों में पड़ने वाले असल दुष्प्रभाव का अध्यन नही किया है।। हम धीरे-धीरे अपनी असामयिक अस्वभाविक मौत की तरफ बढ़ रहे है। हम लगभग मौत की कगार पर पहुंच भी चुके है।इस बात एहसास हम आपको और प्रभावित ग्रामीणों को हो चुका है। परन्तु हमारे नीति निर्धारक इस तरफ पीठ किये बैठे है। एक और कम्पनी के कोल खदान की स्थापना हमसे हमारी प्रकृति की हत्या और हमारी आत्महत्या के लिए पर्याप्त है।। आपने इस साल देखा हम धरती के सबसे गर्म स्थानों में से एक 49.1डिग्री तापमान वाले क्षेत्रों में अपना नाम दर्ज करा चुके है। क्षेत्र का भूगर्भ जल स्तर डार्क जोन लेबल तक जा पहुंचा है। जो क्षेत्र अभी डार्क जोन से बाहर है वहां भी पीने योग्य भूगर्भ जल साफ-सुथरा नही बचा है। कैंसर,दमा,पथरी,किडनी फेलुवर और फ्लोराईसिस जैसी जानलेवा बीमारी हमारे भीतर घुस चुकी है।।– रमेश अग्रवाल जनचेतना

हां हमने महाजेंको की प्रस्तावित जनसुनवाई का पुरजोर विरोध किया है। ऐसा विकाश जो हमे हमारी संस्कृति और प्रकृति से दूर करे और हमारे बच्चों के विकाश में बाधक हो वो हमें किसी भी कीमत में स्वीकार नही है। हम पहले ही अपने बच्चों को फ्लोराइसिस नामक घातक बीमारी उपहार दे चुके है। अब बस और नही..ग्रामीण सरइटोला तमनार

मेरे अलावा मेरे अन्य सहेलियों और सहपाठियों को यह बीमारी है। मुझे बचपन मे ही यह बीमारी लग गई थी। मेरी तरह उनके दांत नाखून विकृत हो चुके है। कुछ दोस्तों के हाँथ पैर भी टेढ़े मेढ़े है। मुझे भी थकान और हाँथ पैर में दर्द की शिकायत नियमित बनी हुई है।-रामेश्वरी राठिया छात्रा

बहरहाल रायगढ़ जिले के तमनार कोल ब्लॉक के अन्तर्गत फ्लोराइसिस पीड़ित बचपन की पीड़ा यदि आपको महसूस करनी हो,तो जब भी आप किसी रेस्टोरेंट या पार्टी में बिसलेरी का पानी या पेप्सी कोला कोल्डड्रिंक की चुस्की लेते हुए मजे ले रहे हो तो जनवादी कवि एवं गीतकार मेघनाथ जी की रचना गांव छोड़ब नही की इन पंक्तियों का भाव स्मरण अवश्य कर लीजियेगा…

जमुना सूखी, नर्मदा सूखी, सूखी सुवर्णरेखा….

गंगा बनी गन्दी नाली, कृष्णा काली रेखा ….

जमुना सूखी, नर्मदा सूखी, सूखी सुवर्णरेखा….

गंगा बनी गन्दी नाली, कृष्णा काली रेखा ….

तुम पिओगे पेप्सी कोला, बिसलेरी का पानी ….

हम कैसे अपनी प्यास बुझाएँ, पी कर कचरा पानी !!

हाँ भई … पी कर कचरा पानी

लेख के माध्यम से क्रांतिकारी साथी बड़ी बहन सुश्री सविता रथ,भाई हरिहर पटेल और उन सैकड़ों हजारों ग्रामीणों को सलाम जो हमारी धरती और भावी पीढ़ी को बचाने के लिए संघर्षरत है।।

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