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“छह महीने का अंधेरा आज एक बच्ची की मुस्कान से हार गया।”

20 मई की रात—मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस की भीड़ में
एक छोटी बच्ची आरोही अपनी माँ की गोद में सोते-सोते गुम हो गई।
माँ ने बस एक पल आँखें मूँदी थीं…
और जब खोलीं—आरोही कहीं नहीं थी।

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इसके बाद शुरू हुआ छह महीने का दर्द—
हर थाने, हर प्लेटफॉर्म, हर झुग्गी में वही तस्वीर…
वही टूटी हुई पुकार—
“किसी ने मेरी आरोही को देखा है?”

हज़ार किलोमीटर दूर वाराणसी में एक अनाथालय में
“काशी” नाम की बच्ची रात में “आई…” चिल्लाकर उठ जाती थी।
किसी को नहीं पता था कि यही खोई हुई Aarohi है।

13 नवंबर को एक स्थानीय पत्रकार ने पोस्टर देखा।
एक फ़ोन हुआ।
और अगले ही पल वीडियो कॉल में वही बच्ची—
उसी रंग की गुलाबी फ्रॉक में—दिखाई दी।
माँ वहीं गिर पड़ी,
पिता रोते हुए कहते रहे—
“यही मेरी आरोही है…”

14 नवंबर—बाल दिवस—
आरोही को वापस मुंबई लाया गया।
मुंबई पुलिस गुब्बारे और नई नीली फ्रॉक लेकर खड़ी थी।
पर जो सबसे बड़ा चमत्कार हुआ—
उतरते ही आरोही दौड़कर पुलिसवालों की बाँहों में समा गई।

छह महीने का अँधेरा
एक गले मिलते ही टूट गया।

आरोही आज घर है।
किडनैपर अभी बाहर है—
पर वो कल की लड़ाई है।

आज—एक माँ फिर लोरी गा रही है,
एक पिता फिर मुस्कुराकर सो रहा है,
और कुछ पुलिसवाले…
ज़िंदगी भर नहीं भूलेंगे
कि एक बच्ची को उठाने का वजन—
असल में एक पूरी ज़िंदगी का वजन होता है।

कभी-कभी वर्दी सिर्फ अपराध नहीं पकड़ती…
कभी-कभी वो बच्चों को माँ की गोद तक लौटा देती है।

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अपूर्व भारद्वाज

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