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चार पेड़ के अस्तित्व पर मंडरा रहा है खतरा

पहले बिकता था नमक के मोल ,अब भी आदिवासी कोचियों के भरोसे

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छाया – शुभंकर शुक्ला

नीतीश मलिक की रिपोर्ट

पखांजुर । परलकोट के बनांचल के ग्रामीण इन दिनों चार बीज चुनने में व्यस्त हैं। वनोपज में महुआ के बाद बनांचल के ग्रामीण चार बीज बीनने के कार्य मे व्यस्त है। हालांकि परलकोट क्षेत्र धान और मक्का के अच्छी पैदावार के लिये जाना जाता है । साथ ही साथ परलकोट क्षेत्र वनों से घिरे होने से इन क्षेत्र के लोगो को वनों से भी अच्छी आमदनी हो जाते है। जिसमे से चारबीज भी एक वनोपज है।चारबीज से चिरौंजी निकलता है। चिरौंजी एक काफी महंगा एवं नकदी वनोपज है । पका हुआ चार काफी मीठा होने की वजह से स्थानीय हाट बाजार में बिकने के लिए आते ही बाजार से गायब हो जाते हैं ।

चार पेड़ के अस्तित्व पर मंडरा रहा है खतरा
हालांकि पहले के वर्षों में ग्रामीण चार के पकने के बाद तोड़कर लाते थे एवं अपने घरों में चार से बीज (चिरौंजी) निकालते थे। पर कुछ वर्षों से गुठली सहित साबुत चिरौंजी की खरीदी होने से लोग कच्चे चार को तोड़कर ले आते हैं। चार का पेड़ छोटा और नाजुक होता है , आसानी से इसकी शाखाएं टूट जाती है । हर साल लालच में कई ग्रामीणों द्वारा हजारों चार पेड़ ही काट दिया जाता है , जिससे चार पेड़ के अस्तिव पर ही संकट खड़ा हो गया है । फिलहाल वन विभाग इस खतरे से अनजान दिखाई दे रहा है , उनके द्वारा चार पेड़ की रक्षा के लिये अभी तक कोई कार्यवाही नही की गयी है ।

हालांकि अनेक ग्रामीण अपने खेतों में उगे चार के पेड़ोंं से पकने के बाद ही तोड़ते हैं। जिसके लिए ग्रामीण सुबह-शाम अपने पेड़ो की निगरानी करते रहते हैं। पर जंगल के पेड़ों से चार तोड़ने की होड़ मच जाती है। जिससे अब ग्रामीणों को पके चार का स्वाद नहीं मिल पा रहा है। जबकि पहले साप्ताहिक हाट-बाजारों में यह प्रचुरता से मिल रहा था।

पहले नमक के बदले में चिरौंजी की होती थी खरीद

ध्यान रहे कि इसी चिरौंजी के धंधे ने बस्तर से बाहर से आये सैकड़ों व्यापारियों को उस समय करोड़पति बना दिया था , जब बस्तर के आदिवासी विनिमय व्यवस्था पर ही आश्रित थे । उनकी सबसे बड़ी जरूरत नमक हुआ करता था । तब बहुत मेहनत से तैयार चिरौंजी को नमक के बराबर तौल कर व्यापारी कई गुना कमाई कर आदिवासियों का हक लूटते थे ।

अभी भी कोचियों पर निर्भर हैं ग्रामीण

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अभी भी इस वनोपज की बिक्री के लिए कोई सरकारी व्यवस्था नही होने की वजह से ग्रामीण चार बीज बेचने के लिए कहाट-बाजारों व कोचियों पर आश्रित है । किसी किसी क्षेत्र में अभी भी व्यापारी एवं बिचौलिए गांव में जाकर घर-घर घूमकर खरीदी करते हैं। हालांकि इससे ग्रामीणों को अच्छी सुविधा मिल रही है। पर संग्रहणकर्ताओं को उचित कीमत नहीं मिल पाता है। बिचौलिए इनसे औने-पौने दाम पर खरीदते हैं एवं ऊंची कीमत पर बिक्री करते हैं।
अभी चार बीज को औसतन 130 रुपए किलो की दर से व्यापारी खरीद रहे हैं। कही कही पर वहीं इसका दर निश्चित करने के लिए एक गुठली लेकर एक पानी में डालते हैं, जिसमें से ठोस गुठली नीचे एवं हल्की गुठली ऊपर आ जाती है। जहां नीचे की गुठली को गिनकर प्रतिशत निकालकर कीमत तय करते हैं और यही बिचौलियों के लिए सस्ती कीमत पर खरीदने का एक सशक्त माध्यम बन जाता है । अगर तेंदूपत्ता व सालबीज की तरह शासन द्वारा चिरौंजी की भी खरीदी की जाती, तो संग्राहकों को सही कीमत मिलती। साथ ही इससे शासन को भी लाभ मिल सकता है ।

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नीतीश मलिक

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