अमेरिका के पास ना तो कोई ठोस प्लान, न ही मकसद का पता
अब ट्रंप ने कहा है ‘बिना शर्त समर्पण’. जबसे युद्ध शुरू हुआ है, तबसे यह उसका चौथा-पांचवां गोल पोस्ट है.

28 फ़रवरी को अमेरिका ने हवाई हमलों से ईरान के सुप्रीम लीडर और टॉप कमांडर को निशाना बनाया. उसे उम्मीद थी कि इससे बात बन जाएगी. ईरान बातचीत को तड़प उठेगा.
उसी दिन ट्रंप ने ईरान की जनता से कहा कि तुम्हारे पास मौक़ा है, नई सत्ता बना लो. उसे लगा था कि ईरान में विद्रोह हो जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. अलबत्ता उल्टा हुआ. ईरान ने कह दिया कि जंग उसने नहीं शुरू की है और वह आख़िरी दम तक लड़ेगा.
फिर अमेरिका ने कहा कि 2-3 दिन में वह फ़तह हासिल कर लेगा.
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका ने कहा कि उसने ईरान से हर तरह की बातचीत करके देख ली, लेकिन ईरान नहीं माना, इसलिए उसने हमले किए.
1 मार्च को अमेरिका ने कहा कि ईरान से उसे तात्कालिक ख़तरा था.
2 मार्च को अमेरिका ने कहा कि इस हमले का मक़सद ईरान के हथियारों के जखीरे, उसकी नेवी, उसकी सैन्य क्षमता को ख़त्म करना है. पेंटागन ने कहा कि मक़सद सिर्फ़ सत्ता बदलना नहीं था.
2 मार्च को ही मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका ने हमला इसलिए किया, क्योंकि इज़रायल ने ईरान पर हमला किया और अमेरिका को लग रहा था कि ईरान अमेरिकी अड्डों पर भी हमला करेगा. इसलिए, ईरान से अमेरिका को तात्कालिक ख़तरा था.
3 मार्च को ट्रंप ने कहा कि उसे पता था कि अगर अमेरिका हमला नहीं करेगा, तो ईरान उस पर हमले कर देगा. इसलिए, युद्ध शुरू किया.
उसी दिन मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका नहीं चाहता था कि ईरान अपना बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम जारी रहे, इसलिए हमला किया.
4 मार्च को पेंटागन ने कहा कि अमेरिका जीत की दहलीज़ पर खड़ा है. उसने कहा कि ईरान ट्रंप को मारना चाहता था, लेकिन ट्रंप ने दांव उल्टा कर दिया.
अब ट्रंप ने कहा कि ईरान को ‘बिना शर्त आत्मसमर्पण’ करना होगा.
सार्वजनिक बयानों में इतने झोल हैं कि कोई भी कह देगा कि अमेरिका के पास कोई ठोस प्लान नहीं है और न ही उसे अपने मक़सद का पता है. स्ट्रैटजी में सिंक नहीं है.
