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बस्तर : बस छह माह और

  • दिवाकर मुक्तिबोध

अब मात्र छह महीने रह गए हैं. मार्च 2026 तक छत्तीसगढ में नक्सलवाद और नक्सली अतीत में गुम हो जाएंगे! केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह पिछले डेढ वर्ष में जितनी बार भी रायपुर आए, हर बार उन्होंने दोहराया कि नक्सलियों के खात्मे की डेड लाइन तय कर दी गई है – मार्च 26. इस समय सीमा के भीतर छत्तीसगढ में सक्रिय तमाम नक्सली व उनके नेता या तो मारे जाएंगे अथवा आत्मसमर्पण करने विवश हो जाएंगे. गृह मंत्री का यह संकल्प पूरा होता दिख रहा है. केन्द्रीय सुरक्षा बल एवं राज्य की सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त टीम ने पिछले महीनों में अपने धुआंधार अभियान से माओवादियों की कमर तोड दी. बस्तर के अलग-अलग नक्सल प्रभावित इलाकों में अभियान दलों ने अपनी अचूक रणनीति से नक्सलियों के समूह को घेरा तथा बहुतों को मुठभेड में मार गिराया. जो सरकारी आंकड़े सार्वजनिक हुए, उसके अनुसार सिर्फ एक साल के भीतर साढ़े चार सौ से अधिक नक्सली मारे गए. इनमें माओवादियों के कुछ प्रमुख रणनीतिकार भी जो अनेक नृशंस घटनाओं के लिए जिम्मेदार थे, शामिल हैं. इसके अलावा इस संक्षिप्त अवधि में सुरक्षा अभियान दलों के दबाव की वजह से डेढ हजार से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया. आत्मसमर्पण का दौर जारी है. यकीनन सुरक्षा बलों के निरंतर दबाव व सशस्त्र अभियान से न केवल नक्सली घटनाएं कम नहीं हुईं वरन माओवादियों की आक्रामकता भी क्षीण पड़ गई. उनका समूचा तंत्र बिखर सा गया. अब सेंट्रल कमेटी के उनके बचे-खुचे नेता संगठन के अस्तित्व को बचाने के लिए सरकार से शांति वार्ता चाहते हैं और लगातार मिन्नतें कर रहे हैं.

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माओवादियों के खिलाफ़ केन्द्र व राज्य सरकार की संयुक्त टीम का अभियान अभूतपूर्व है. इसे फिलहाल अप्रतिम सफलता मान लें तो इसका एक अर्थ यह
भी निकाला जा सकता है कि केन्द्र व राज्य सरकार के संकल्प का यह परिणाम है. इस संदर्भ में यह भी कहा जा सकता है कि सरकारें यदि चाहतीं तो इस राष्ट्रीय समस्या का अंत काफी पहले हो चुका होता तथा हजारों बेगुनाह नागरिकों व सुरक्षा जवानों की मौतें न हुई होतीं. किंतु उन दिनों केन्द्र तथा राज्य सरकारों की नक्सल विरोधी नीति व नीयत में फर्क था इसीलिए बीते पचास वर्षों से माओवादी कुछ राज्यों में विशेषकर छत्तीसगढ में आतंक व हिंसा का पर्याय बने हुए थे. और कुछ हद तक अभी भी हैं. चूँकि वर्ष दिसंबर 2023 में राज्य में पुन: भाजपा की सरकार बनने के बाद डबल इंजिन सरकार की नीति व नीयत में फर्क समाप्त हो गया लिहाज़ा नक्सल समस्या को जड से उखाड़ने का संकल्प लिया गया और इसके लिए समयावधि निश्चित की गई जिसका नतीजा कुछ ही महीनों में दिखाई देने लगा. सुरक्षा बलों के जवान न केवल नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों को ध्वस्त कर रहे हैं वरन उन्हें खोल से बाहर निकलने विवश भी कर रहे हैं. इसका परिणाम बड़ी संख्या में नक्सली लड़ाकों एवं उनके प्रमुख कमांडरों की मौत के रूप में सामने है. यदि अभियान की गति ऐसी ही रही तो यह माना जा सकता है कि छत्तीसगढ़ से नक्सल समस्या खत्म होने के निकट है.

लेकिन सुरक्षा बलों की मुहिम व केन्द्र के रवैये से ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार नक्सली व नक्सलवाद का सफाया सिर्फ और सिर्फ बंदूक की गोलियों से करना चाहती है, किसी प्रकार की वार्ता में उसकी दिलचस्पी नहीं है. इस विश्वास के पीछे की बड़ी वजह है, नक्सलियों का मारा जाना, उनका बैकफुट पर आना, संसाधनों की आपूर्ति का बंद होना, आदिवासियों की सहानुभूति का टूटना, गांवों में आतंक व भय के वातावरण के स्थान पर सरकार के प्रति भरोसे का बढना तथा माओवादियों का शांति वार्ता के लिए बारम्बार सरकार से अनुरोध करना. ये स्थितियां ये बताती हैं कि माओवादी पूरी तरह टूट चुके हैं इसलिए खून-खराबा बंद करके वे सरकार से सम्मानजनक समझौता चाहते हैं.

बीते छह-आठ महीनों में माओवादियों की ओर से 15 अगस्त का छठवां पत्र जो 14 सितंबर को सार्वजनिक रूप से सामने आया जिसमे उन्होंने सरकार से सशस्त्र अभियान रोकने तथा अपनी ओर से कमेटी गठित करने एक माह का समय मांगा ताकि जेलों में बंद प्रमुख नक्सलियों की रज़ामंदी ली जा सके. जाहिर है सरकार ने इस कथित पत्र को संज्ञान में नहीं लिया और किसी तरह की बातचीत से साफ इंकार कर दिया. अब सरकार का स्पष्ट मानना कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( माओवादी ) की पोलिट ब्यूरो व सेंट्रल कमेटी के बचे-खुचे तमाम माओवादी नेता तथा नक्सली दलों के सदस्य या तो नि:शर्त आत्मसमर्पण करें या मरने के लिए तैयार रहे.

सरकार का यह अतिवादी नज़रिया है. यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रदेश में भाजपा की सत्तारूढ होने के तुरंत बाद उप मुख्य मंत्री विजय शर्मा जिनके पास गृह विभाग भी है, ने माओवादियों से अपील की थी कि वे हिंसा त्याग कर बातचीत के लिए आगे आएं. सरकार उनसे सीधी बातचीत के लिए या टेलीफोन पर अथवा वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए वार्ता के लिए तैयार है. इस अपील का माओवादी प्रवक्ता ने विज्ञप्ति जारी कर सकारात्मक जवाब दिया था. लेकिन बात आगे बढ़ाने के बजाए गृह मंत्री केवल सरकार की मंशा दोहराते रहे. और जब सुरक्षा बलों की कार्रवाई से बेहद कमजोर पड चुके माओवादी संगठन , पत्र पर पत्र जारी कर वार्ता की दुहाई देने लगे तब सरकार ने अपना रूख बदल दिया. स्पष्ट कर दिया कि नक्सली हथियार डालकर आत्मसमर्पण करें तथा सरकार की नक्सली पुनर्वास नीति का लाभ उठायें.

राज्य व केंद्र सरकार के बदले हुए रवैए से जाहिर है वार्ता की गुंजाइश खत्म हो गई है. पर क्या सरकार अगले छह महीनों में बस्तर को नक्सल मुक्त कर देगी ? संभव है ऐसा हो किंतु यह मुक्ति कितने दिनों या महीनों के लिए ? जमीन में इधर-उधर छितरे हुए बीज पड़े रहेंगे तो वे देर-सबेर उग ही आएंगे. यह भी सवाल है कि बस्तर के चप्पे-चप्पे पर तैनात पुलिस के जवान क्या अनंत काल तक शहर, गांव-देहात की पहरेदारी करते रहेंगे ? जंगल के आदिवासी गांवों में सुरक्षा बलों के जवान एवं अधिकारी कितनी निर्ममता से पेश आते रहे हैं, उसके अनेकानेक उदाहरण हैं. उन दर्जनों फर्जी मुठभेड़ों को नहीं भुलाया जा सकता जिसमें पुलिस व सशस्त्र बल के जवानों ने जानबूझकर गरीब व निरपराध ग्रामीण आदिवासियों को नक्सली बताकर गोली से उड़ा दिया, उनके घर लूट लिए या जला दिए तथा महिलाओं के साथ बलात्कार किया. नक्सली जन-अदालतें लगाकर
आदिवासियों को मारते – पीटते व हत्याएं करते रहे हैं तो सुरक्षा बलों ने भी कम उत्पात नहीं किए. कहना होगा दोनों समान रूप से आदिवासियों के गुनाहगार हैं.

यदि वास्तव में सरकार नक्सल समस्या का स्थायी समाधान चाहती है तो उसे माओवादी नेतृत्व को एक मौका देना चाहिए जो राजनीति की मुख्य धारा में शामिल होने का इरादा जाहिर कर रहा है. यद्यपि सरकार को इस पर विश्वास नहीं है किंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि अतीत में दोनों पक्ष वार्ता के टेबल पर आए हैं, बातचीत की है, भले ही वे असफल रही हों. इसलिए एक और कोशिश करने में क्या दिक्कत है ? जिंदा बचे प्रमुख माओवादी नेतृत्व कर्ताओं पर कुछ तो भरोसा किया जा सकता है. वैसी भी यह स्थापित सत्य है कि कोई भी लोकतांत्रिक व संवेदनशील सरकार अपनी ही जनता की हत्यारी नहीं हो सकती. इसलिए गोली का जवाब गोली से देने के बावजूद इतनी गुंजाइश तो रखनी ही चाहिए ताकि यह विचार धारा टूटे कि हिंसा किसी भी समस्या का हल नहीं है.

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( वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध जी के वॉल से )