क्या बस्तर में नक्सलवाद खत्म हो रहा है, या विरोध की आवाज़?

जब भी बस्तर की बात होती है, टीवी स्क्रीन पर बंदूकें दिखाई जाती हैं, लेकिन जंगलों में रहने वाले आदिवासियों की आवाज़ शायद ही कभी सुनाई देती है।
सरकार कहती है कि यह नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई है। लेकिन सवाल यह है कि जिन इलाकों में सुरक्षा अभियान तेज़ हुए हैं, वहीं खनन परियोजनाओं और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की रफ्तार भी क्यों बढ़ती दिखाई देती है? क्या यह महज़ संयोग है, या इसके पीछे कोई बड़ी तस्वीर छिपी है?
बस्तर के अनेक गांवों से लगातार आरोप सामने आते रहे हैं कि ग्राम सभाओं की वास्तविक सहमति के बिना खनन परियोजनाओं को आगे बढ़ाया गया। आदिवासी समुदाय दावा करता है कि उसका संघर्ष किसी विचारधारा के लिए नहीं, बल्कि अपनी जमीन, जंगल, पानी और अस्तित्व की रक्षा के लिए है। यदि ऐसा है, तो उनकी बात राष्ट्रीय बहस का हिस्सा क्यों नहीं बनती?
लोकतंत्र की असली परीक्षा बंदूक से नहीं, असहमति को सुनने की क्षमता से होती है। अगर हर विरोध की आवाज़ को सुरक्षा का सवाल बना दिया जाएगा, तो संविधान में आदिवासियों को दिए गए अधिकारों का क्या अर्थ रह जाएगा?
बस्तर केवल खनिजों का भंडार नहीं है। वह लाखों आदिवासियों का घर है, उनकी संस्कृति है, उनकी पहचान है। विकास यदि लोगों की सहमति, संवैधानिक अधिकारों और न्याय की कीमत पर होगा, तो वह विकास नहीं, बल्कि अविश्वास की नींव बनेगा।
इसलिए आज सबसे ज़रूरी सवाल यह नहीं कि बस्तर में कितने नक्सली बचे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बस्तर के लोगों को अपने भविष्य का फैसला खुद करने का अधिकार वास्तव में मिल रहा है, या उनकी आवाज़ विकास और सुरक्षा के शोर में दबा दी गई है?
बस्तर को केवल युद्धभूमि की तरह नहीं, संविधान और लोकतंत्र की कसौटी की तरह देखने की ज़रूरत है।
