
झीरम घाटी की घटना के 5 दिन बाद घोटुल डॉट ब्लॉग स्पॉट डॉट काम में किया गया ब्लॉक पोस्ट । घटना के 6 साल बाद फिर से कवासी लखमा को षड्यंत्र के तहत मोहरा बनाया जा रहा है । इस षड्यंत्र के पीछे राजनीतिक रूप से कवासी लखमा का एक ताकतवर छवि के रूप में उभरकर आना है । कवासी ने बस्तर लोकसभा चुनाव व दंतेवाड़ा के उपचुनाव में जिस ताकत से अपनी क्षमता दिखाई है , उससे भाजपा के होश तो उड़ ही गए हैं साथ ही कांग्रेस के भीतर भी कई नेताओं को उनसे डर सा लगने लगा है । ध्यान रहे कि छत्तीसगढ़ के 11 लोकसभा सीट में जिन 2 सीटों पर कांग्रेस को विजय मिली उसमें एक बस्तर की सीट भी है । अब चित्रकूट विधान सभा के उप चुनाव में भी लखमा ने बस्तर के सभी विधायकों के साथ अपनी ताकत झोंक रखी है ।
मंत्री कवासी लखमा ने झीरम घाटी विवाद में उनके मारे नही जाने को लेकर चल रहे विवाद पर मीडिया में कहा है “ “क्या करुं मैं .. कि.. माओवादियों ने मुझे ज़िंदा छोड़ दिया.. मैं बार बार जंगलवालों को बोला छोड़ दो.. तो मुझे बंदूक़ के बट से मारे ..गाली दिए..और मैं ही ज़िंदा बचा था क्या.. मेरे अलावा भी तो लोग ज़िंदा बचे.. यदि ज़िंदा बचना ही सवाल है तो सवाल केवल कवासी से क्यों..”
“कोई क्या लिखता बोलता मैं नहीं जानता..मैं बस्तरिहा हूँ.. बस्तर के साथ जब ग़लत हुआ तब बोला.. तब लड़ा.. आदिवासियों का घर जलाए तब लड़ा.. सलवा जूडूम में ग़लत किए तब लड़ा.. कल भी लड़ा और आज भी लड़ूँगा..बस्तरिहा हूँ और बस्तर के लिए लड़ते रहूँगा”
“ज़िंदगी जब तक है..जब तक भी है.. बस्तरिहा बस्तर के लिए लड़ते रहेगा..मैं ताड़ी काटता था.. मवेशी चराता था…मेरे को बोलते नहीं आता.. लेकिन आदिवासी हूँ.. बस्तरिया हूं.. जंगल पानी नदी खेत जानता हूँ.. इसको कोई नहीं छीन सकता”
नक्सलवाद , बस्तर , नक्सली घटनाएँ , फर्जी मुठभेड़ , सरकारी नीतियाँ , राजनीतिक गठजोड़ आदि शब्दों की जिन्हे जानकारी है उन्हे लखमा के जिंदा बचे रहने को लेकर ना तो कोई आश्चर्य है ना ही
उनके उपर इस घटना मे किसी षडयंत्र मे शामिल होने का संदेह —— सीपीआई के बाद केवल लखमा ही थे जिसने हमेशा इस लड़ाई मे अपने आपको हमेशा जनता के साथ खड़ा दिखाया | ज़ेड प्लस सुरक्षा के घेरे मे रहकर जब कर्मा आदिवासियों के घरों मे आग लगवा रहे थे , दौड़ा – दौड़ा कर भेड़ बकरियों की तरह हकाल रहे थे , बस्तर के शोषकों व बलात्कारियों के साथ खड़े थे तो सलवा जुड़ूम के गुण्डों से पिटकर भी इन्ही लखमा ने पीड़ित आदिवासियों की आवाज़ देश भर मे पंहुचाया था | ताड़ मेटला मे तीन सौ घरों को आग लगाए जाने के समय पूरा कांग्रेस जब भाजपा की गोदी में बैठकर विपक्ष की भूमिका से सर छिपा रहा था तो इसी ने मर्दानगी दिखाई थी , नक्सलियों की ओर से या पुलिस की ओर से जब भी निर्दोष आदिवासियों पर गोलो चली तो लखमा ही उनकी आवाज़ बनते है , यह बात पूरे बस्तर को पता है , नक्सलियों को भी | पूरा बस्तर और नक्सली भी जानते थे लखमा की छवि सरल और सच्चे आदिवासी नेता की है , उस पर हमला करना होता बेवकूफों तो वे इस दिन की प्रति क्षा नही करते | बिना किसी सुरक्षा के गाँव – गाँव घुमा करते थे लखमा । अगर नक्सली लखमा जैसों को मारने लगे तो गाँवो में घुसेंगे कैसे ? कार्पोरेट घरानों के दलाल बनकर केवल धन के लिए जनता के खिलाफ राजनीति करने वालों को अब तो सचेत हो जाना चाहिए । लखमा का स्वागत होना चाहिए कि नेता ऐसा हो की उससे बन्दुक भी शरमा जाये ।
बेचारा कवासी लखमा मार डाला गया होता तो वो भी शहीद होता, मगर बचना ही उसका अपराध हो गया है. जिस तरह से लोग उसके पीछे पड़े है, वो भी एक तरह की हिंसा है——————————————–हमसे भी यही पूछा जाता है कि तुम्हें नक्सली क्यों नहीं मारते ? ज़रूर तुम लोग नक्सलवादियों से मिले हुए होगे . यही समस्या अंदरूनी गाँव में काम करने वाले शिक्षकों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को भी झेलनी पड़ती है , उन्हें भी सुरक्षा बल यही कह कर परेशान करते हैं कि तुम अंदर के गाँव से साफ़ साफ़ बाहर कैसे आ गये ? ज़रूर तुम नक्सलियों से मिले हुए हो ?
