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कवासी लखमा है बस्तर और आदिवासियों की लड़ाई के असल हीरो , मंत्री होने के बाद भी नही भूले हक के मुद्दे

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रायपुर । अपने विरले अंदाज और सहजता के लिए पहचाने जाने वाले छत्तीसगढ़ के आबकारी और उद्योग मंत्री कवासी लखमा ने साबित किया कि वे बस्तर और आदिवासियों की लड़ाई के असल हीरों हैं , सरकार के प्रतिनिधि होने के बावजूद वे आदिवासियों की पीड़ा को अन्य उन जन प्रतिनिधिनियों की तरह नही नकारा जो सत्ता और पावर में आकर भूल जाते हैं ।

कवासी लखमा ने चुनाव जिन मुद्दों पर लड़ा था और जिन मुद्दों की लड़ाई के लिए उन्हें जन नेता माना जाता है वे मंत्री बनने के बाद भी उन मुद्दों की लड़ाई लड़ रहे हैं । यह साबित किया उन्होंने पिछले सप्ताह दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब हाल में एक सभा को सम्बोधित करते हुए अपने ओजस्वी व तथ्य परक बातों से । उन्होंने बताया कि बस्तर के आदिवासियों को नक्सलियों, सरकार और पुलिस सभी मार रहे और खदानों और बाँधों को उनकी बिना सहमति के निजी कम्पनियों के द्वारा निर्माण के कारण आज 3-4 लाख आदिवासी परिवार बेघर और बरबाद हो चुके हैं। 

कवासी ने स्वीकार किया कि बस्तर में गाँव के गाँव ख़ाली हो गए हैं। पिछले 1साल में छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की जनसंख्या 32% से 31% हो गयी है। इन लाखों आदिवासी परिवारों को तेलंगाना और आँध्रप्रदेश में पलायन करने के लिए विवश होना पड़ा है। इन प्रदेशों में मारिया, मुरिया, डोरला और अन्य अतिपिछड़े आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की सूची में सम्मिलित नहीं करने के कारण वे वहाँ भी आदिवासी होने के लाभ से वंचित हो गए हैं और ‘कोलीबूती’ (बेगार/मज़दूरी) करने के लिए विवश हो गए हैं।

कवासी इसके पहले भी मंत्री रहते हुए कथित फर्जी ग्रामसभा के माध्यम से अडानी की कम्पनी को बैलाडीला के निक्षेप 13 को बेचे जाने के षड्यंत्र के खिलाफ आंदोलन रत आदिवासियों के पक्ष में बोल चुके हैं । उन्होंने चुनाव से पहले भी हुंकार भरा था कि बस्तर की जनता की इच्छा के खिलाफ अडानी या किसी भी कार्पोरेट को घुसने नही दिया जाएगा । अडानी के खिलाफ आदिवासियों द्वारा किये गए सशक्त विरोध में कवासी लखमा के पुत्र और सुकमा के जिला पंचायत अध्यक्ष हरीश ने भी सक्रिय भूमिका निभाकर अपने ही सरकार को जता दिया था कि इस मुद्दे को गंभीरता से लेना ही होगा । अंततः सरकार ने इस मुद्दे की जांच कराई , हालांकि अभी रिपोर्ट सार्वजनिक नही किया गया है ।

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