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रायपुर के तालाब : विकास नहीं, विनाश की कहानी

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साथियों, कभी रायपुर को तालाबों का शहर कहा जाता था। लगभग दो सौ तालाब शहर की पहचान और जीवनरेखा थे। आज हालात यह हैं कि वे उँगलियों पर गिने जाने लायक भी नहीं बचे। जो बचे हैं, वे भी धीरे-धीरे दम तोड़ रहे हैं। तस्वीर रायपुर के पुरानीबस्ती स्थित बंधवा तालाब की है यहां लगातार तीन तालाब है। पहलदवा, बंधवा और खो-खो तालाब। खो-खो तालाब की स्थति थोड़ी ठीक है। बंधवा तालाब में तो पानी जैसी कोई चीज है ही नहीं। पूरा तालाब जलकुंभी और घांस से पट गया है।

रायपुर के अधिकांश तालाब कब्जों की भेंट चढ़ चुके हैं। किसी पर मकान खड़े कर दिए गए, कहीं दुकानें और कहीं बहुमंजिला व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स उग आए। जलस्रोतों को पाटकर तथाकथित विकास का ढांचा खड़ा किया गया, लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि इसकी कीमत आने वाली पीढ़ियां चुकायेगी ।

जो तालाब किसी तरह बचे भी हैं, उनकी हालत और भी दयनीय है। गंदगी, सीवेज और जलकुंभी से अटे पड़े हैं। पानी सड़ चुका है, बदबू उठती है और बीमारी फैलने का खतरा बना रहता है। नगर निगम की उदासीनता इतनी गंभीर है कि मानो ये तालाब शहर का हिस्सा ही न हों। न सफाई, न संरक्षण, न भविष्य की कोई योजना।

समझना होगा कि तालाब केवल पानी से भरे गड्ढे नहीं होते। वे शहर की सांस होते हैं। इन्हीं तालाबों से आसपास के लोग निस्तारी करते थे, भूजल रिचार्ज होता था, मौसम संतुलित रहता था और सामाजिक जीवन पनपता था। आज तालाबों का खत्म होना केवल जलसंकट नहीं, बल्कि हमारी संवेदनहीनता का प्रमाण है।

यदि अब भी नहीं चेते, तो आने वाला समय हमें माफ नहीं करेगा। रायपुर को फिर से तालाबों का शहर बनाना होगा—कागजों में नहीं, जमीन पर। वरना इतिहास हमें एक ऐसे समाज के रूप में याद रखेगा जिसने अपनी ही जलधरोहर को मिटा दिया।

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