Site icon Bhumkal Samachar

भूमि की भूमिका – विनोद कुमार शुक्ल

पहली नवंबर, 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ। मैं दिल्ली में था। राज्य बनते ही मेरे पास प्रस्ताव आया कि छत्तीसगढ़ पर एक किताब लिख दूं। समय पर लिख भी दी। लेकिन प्रकाशन में समय लगा। कारण प्रकाशक ही जानते होंगे।

किताब लिख गई तो मैंने विनोद कुमार शुक्ल जी से अनुरोध किया कि वे इस किताब की भूमिका लिख दें। उन्होंने कहा कि वे ही क्यों? मैंने कहा, “छत्तीसगढ़ नया राज्य है, नई किताब है तो आपके अलावा कौन लिखेगा?”

उनके मन में थोड़ी झिझक थी। कहने लगे, “मैंने कभी किसी किताब की भूमिका नहीं लिखी।” मैंने कहा, “मैंने भी कोई किताब नहीं लिखी थी।” आख़िरकार वे मान गए। भूमिका लिख गई। मेरे कुछ वरिष्ठ लोगों को पसंद नहीं आई। पर मैं तो स्वाभाविक रूप से गदगद था। आज भी होता हूं।

छत्तीसगढ़ पर पहली किताब। मेरी पहली किताब। विनोद जी की पहली भूमिका के साथ।

आज जब विनोद कुमार जी नहीं रहे तो प्रासंगिक लगता है कि इसे एक बार फिर प्रकाशित कर दिया जाए।

राज्य बनने के बाद उनका जो अनुभव था उसे उन्होंने बहुत बेबाकी से लिखा है। जैसे “वैसे राजनीति के समुद्र में जनता को तैरना नहीं आया। जनता हमेशा डूबती है।” या फिर “जनता को हटाकर ही सत्ता का रास्ता चौड़ा होता है।”

वे राज्य बनने को शतरंज के खेल की तरह देख रहे थे और समझ रहे थे कि राज्य बनने और राजधानी बनने से राजनेताओं से जनता की दूरी कम नहीं हो रही है।

कितनी अद्भुत परिकल्पना है कि खनिज से भरे छत्तीसगढ़ में “धूल उड़ती है तो लोहे की धूल उड़ती है।” या यह कि “यहां तालाब में नहाना जंगरहित होना और धारदार होना होता है।”

“गढ़ छत्तीस” के लिए लिखी उनकी भूमिका, ज्यों की त्यों –

1 नवंबर 2000 को
जब 36 गढ़ राज्य बना
तब 63 वर्ष का 36 गढ़ी हुआ था।
36 के विपरीत के आंकड़े में होकर
63 का इस समय अपने ही सम्मुख
सयाना या जवाबदेह

विनोद वर्मा की शायद यह पहली किताब है, और मेरी यह किसी भी किताब के लिए पहली भूमिका। परंतु छत्तीसगढ़ को जानने की कोशिश में यह किताब एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि है।

छत्तीसगढ़ का छत्तीस का समूह पता नहीं किस तरह है, यह मिलेजुले होने का पैंतीस के बाद का छत्तीस है या छत्तीस के आंकड़े का सामान्य अर्थ में एक नहीं की जोड़ी।

छत्तीसगढ़ राज्य का नक्शा दिखने में समुद्री घोड़े की तरह है। राजनीति के समुद्र में। पहले राजनीति बूंद बराबर या नदी तालाब बराबर होती होगी। अब राजनीति समुद्र बराबर होती है। छत्तीसगढ़ राज्य का वैसे एक प्रायःद्वीप भी बनता है। और यह उसके बाहर और अंदर के राजनैतिक समुद्र के कारण है। इन सबके बीच जो छत्तीसगढ़ी समाज है वह अभी तक बचा हुआ है। जबकि राजनीति समाज को नष्ट करती है। और इसमें जो राजनीति का दृष्टिकोण है वह विनोद वर्मा का अपना है।

छत्तीसगढ़़ राज्य का बनना, शतरंज में एक ऐसे चाल की तरह हो गया था जिसमें एक हारता तो छत्तीसगढ़ राज्य बनता, दूसरा हारता तो भी छत्तीसगढ़ राज्य बनता और इसमें जीतने का दावा दोनों का बन रहा होता। वैसे राजनीति के समुद्र में जनता को तैरना नहीं आया। जनता हमेशा डूबती है।

रायपुर में ठीक मंत्रालय के सामने (पहले डीके अस्पताल को मंत्रालय बनाया गया था) की जो सड़क है वह स्टेशन जाने की सड़क है। इसी सड़क से अकाल जैसी स्थिति के कारण झुंड के झुंड पूरे परिवार के साथ गंवई लोग राज्य छोड़कर जाते दिखाई देते हैं, अगर मंत्रालय की खिड़की खुली हो। राजधानी बनते ही ताबड़-तोड़ इस सड़क को चौड़ा किया गया है। जनता को हटाकर ही सत्ता का रास्ता चौड़ा होता है। राज्य बनने के पहले राज्यपाल, मुख्यमंत्री भोपाल में थे। अब यहां हैं। यहीं उनके बंगले हैं। परंतु उनकी दूरी हमेशा की तरह दूर है।

विनोद वर्मा की इस किताब के पृष्ठ छत्तीसगढ़ के परत की तरह हैं। परत को हटाकर देखें तो छत्तीसगढ़ का अहसास हो। और मैं आदतन सूर्योदय को छत्तीसगढ़़िया सूर्योदय मानता हूं। चाहे वह दिल्ली का सूर्योदय हो। छत्तीसगढ़ी को सुनता तो जानता हूं कि चिड़ियों की चहचहाहट को समझ रहा हूं। तथा यहां खनिज बहुत हैं और लोहा तो कहीं भी है कि धूल उड़ती है, तो लोहे की धूल उड़ती है। चुंबक यदि नीचे ज़मीन पर गिर जाए तो लोहे के कण चुंबक में चिपक जाते हैं। यहां तालाब में नहाना जंगरहित होना और धारदार होना होता है।

विनोद वर्मा

Exit mobile version