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मत पूछ मन में अगर सवाल है ये पत्रकारिता का कोरोना काल है

मत पूछ मन में अगर सवाल है
ये पत्रकारिता का कोरोना काल है

एक की तारीफ़, दूसरे की बुराई
जमकर गालियाँ, टांग खिंचाई
आड़ में सब चल रहा है
गोरखधंधा, काली कमाई

बिगड़ी है सूरत, बिगड़ी चाल है
मत पूछ मन में अगर सवाल है
ये पत्रकारिता का कोरोना काल है

झूठ के घर में सिमटी सच्चाई
बेईमानों के बीच दबी अच्छाई
मुखौटा में छिपे बिरादरों ने
रिश्तेदारी खूब निभाई

करते ठेकेदारी, बन बैठे दलाल हैं
मत पूछ मन में अगर सवाल है
ये पत्रकारिता का कोरोना काल है

देश-देश में सब जगह यही हाल है
कहिए जनाब आपका क्या ख्याल है
मेरे आस-पास बहुत से हैं ऐसे लोग
जिनका बस यही सवाल है
जो तेरा हाल है, वही मेरा हाल है

मत पूछ मन में अगर सवाल है
ये पत्रकारिता का कोरोना काल है

वैभव बेमेतरिहा

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