बस्तर का लोकतंत्र: सलाखों के पीछे मासूम, खुले आसमान में गुनहगार

बस्तर की धरती पर लोकतंत्र का चेहरा अक्सर आदिवासी समाज के लिए एक क्रूर मज़ाक जैसा प्रतीत होता है। बाहर से आए बड़े माओवादी नेता—थिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी, मल्ला राजी रेड्डी, मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति, रूपेश, चैतु, मल्लेश—ने समर्पण कर दिया और आज़ाद करोड़ो के ईनाम खुद पर पाकर खुला घूम रहे हैं। जिन के हाथों में बंदूक थी जिन पर हजारों आदिवासियों की हत्या,अपहरण,लूटपाट और जवानों की मुठभेड़ में हत्या , हथियारों की लूट जैसे अनेक अपराधिक हिंसक योजनाओं और रणनीति बनाने का आरोप था, वे आज समर्पण कर समाज में स्वतंत्र जीवन जी रहे हैं। जिस सरकार से क्रांति करते थे उसी सरकार की पुनर्वास योजनाओं का लाभ ले रहे है। लेकिन जिन बस्तर के आदिवासियों के हाथ में केवल हल और तीर था, जो केवल जल,जंगल,जमीन बचाने में लगे थे वे निर्दोष आदिवासी वर्षों से फर्जी नक्सल मामलों में अदालतों और जेलों में फंसे पड़े हैं। आज भी 5000 से अधिक फर्जी नक्सल मामलों में बस्तर के आदिवासी जेलों में सड़ रहे हैं।
बस्तर का आदिवासी हर सत्ता का शिकार हुआ हुआ। माओवादी नेताओं ने बस्तर के आदिवासियों को अपनी तथाकथित क्रांति का ढाल बनाया। तो सरकार के लिए आदिवासी हमेशा “संदेह” बने रहे। वही पुलिस के लिए वे “मुखबिर” कहलाए। और कॉरपोरेट्स के लिए वे “जमीन के अवरोधक” साबित हुए। हर सत्ता ने बस्तर के आदिवासी को मिटाने का काम किया, चाहे वह माववाद की बंदूक की क्रांति हो या राजनीतिक पार्टियों के लोकतंत्र में वोट बैंक की राजनीति हो या फिर पूंजीवाद का विकास के नाम पर जमीन छीनने की साज़िश। सभी ने बस्तर के आदिवासियों को केवल अपने उपयोग का साधन मात्र समझा।
बस्तर के लोकतंत्र का एक कड़वा सच यह है कि बंदूक थमाने वाले माओवादी नेता आज सरकार के संरक्षण में आज़ाद हैं, और बंदूक से बचने वाले बस्तर के सीधे साधे आदिवासी जेल की सलाखों में कैद बस्तर के आदिवासी ने जंगल बचाया, जमीन बचाई, अपनी संस्कृति बचाई—लेकिन माववाद और सरकार दोनों ने बस्तर के आदिवासियों को मिटाने का ही प्रयास किया। शायद यही है बस्तर का लोकतंत्र? जहां जल,जंगल,जमीन को बचाने वाले बस्तर के आदिवासी सलाखों के पीछे हैं और रणनीतिकार, गुनहगार माओवादी नेता आराम से खुले आसमान के नीचे सांस ले रहे है।
क्या इस लोकतंत्र में न्याय सिर्फ उन लोगों के लिए है जिनके हाथ में बंदूक थी पार्टी के विचार थे? क्या बस्तर का आदिवासी हमेशा सत्ता और व्यवस्था के बीच कुचले जाते रहेंगे? क्या लोकतंत्र केवल सत्ता और हिंसा का खेल है, या इसमें आदिवासी समाज की भी कोई जगह है?

अंकित पोटाई कोयतुर
