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बस्तरः जहां विकास शब्द विस्थापन और विनाश का पैग़ाम लेकर आता है

बकौल छत्तीसगढ़ सरकार की जनसंपर्क विभाग की विज्ञप्ति के अनुसार बस्तर विकास 2025: बस्तर अब उपेक्षा नहीं, बल्कि विकास और निवेश का नया हब बन चुका है। ₹52,000 करोड़ निवेश, रेल-सड़क परियोजनाएं, उद्योग, स्वास्थ्य, पर्यटन और MSME से बस्तर बन रहा है छत्तीसगढ़ का आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन केंद्र।

हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार के जनसंपर्क विभाग कि इस विज्ञप्त के बाद सरकार के एक मंत्री ने दावा किया की अब निवेश की राशि बढ़ाकर एक लाख करोड़ से भी ज्यादा हो गया है ।

समय के साथ साथ, जंगलों और खनिज संपदा की इस धरती पर बड़ी कंपनियों की रूचि बढ़ने लगी और इस संभाग के दक्षिणी और उत्तरी इलाकों में लौहअयस्क और बॉक्साइट सहित खनिज का खनन शुरू हो गया.

कई कंपनियों ने अपने उद्योग चलाने के लिए सरकार की मदद से ज़मीन का अधिग्रहण शुरू किया तो यहाँ के आदिवासियों और प्रशासन के बीच संघर्ष की बुनियाद पड़ने लगी । इस संघर्ष में लोगों के साथ खड़े होने के नाम पर माओवादी भी आदिवासी बहुल इस इलाके में अपनी पैठ जमाते चले गए. माओवादियों और सुरक्षा बलों के संघर्ष के बीच पिसना भी बस्तर के लोगों के नियति बन गयी. फिर दौर आया विस्थापन और पलायन का. अप्रैल 2026 का डेट लाइन देकर किया जा रहे नक्सल ऑपरेशन में निश्चित रूप से सरकार को भारी सफलता मिली है । मगर यह भी सत्य है कि इस तरह की डेट लाइन पहले भी कई सरकारों ने कई बार दिया ।

वास्तव में कोई भी सरकार आदिवासियों के विद्रोह को आदिवासियों की मांग को समझने में सफल रहे या जानबूझकर नजर अंदाज करते रहे उसी का परिणाम यह हुआ की हताश आदिवासी माओवादियों के साथ जुड़ते चले गए । आदिवासी अपने हक की लड़ाई जल जंगल जमीन की लड़ाई के लिए नक्सलियों के आने से सैकड़ो साल पहले से करते आ रहे हैं । इसलिए केवल नक्सली वाद को खत्म करने के मुद्दे के बजाय सरकार को इस समस्या की मूल जड़ को खोजना पड़ेगा । नहीं तो आदिवासियों के मां के भीतर विद्रोह की अलख जलती रहेगी जो भले ही नाम बदल बदल कर सामने आते रहेगा सरकार को नेपाल के आंदोलन त्रिपुरा के आंदोलन और लद्दाख के आंदोलन से समझना चाहिए कि केवल बंदूक ही रास्ता नहीं है । वर्तमान में चल रहे नक्सल अभियान के पहले 32 से ज्यादा स्थानों पर बिल्कुल शांतिपूर्ण तरीके से आदिवासी अपने मिले संवैधानिक अधिकार को पाने के नाम पर संघर्ष करते रहे मगर सरकार ने इसे नक्सलियों का आंदोलन बढ़कर ऐसा दमन किया कि आंदोलनकारी को हताशा हुई है आंदोलन के सभी नेताओं को मारवाड़ी या मारवाड़ी के समर्थक बात कर जेल के भीतर ठोस दिया गया है निश्चित रूप से इन सब के भीतर आक्रोश पनप रहे हैं जो किसी ने किसी दिन बाहर आएगा