धर्म बदलने से आदिवासी नहीं बदलता, पर उसका हक जरूर छिन जा सकता है

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आज अदालत ने वही कहा जो हमारे पुरखे हमेशा से जानते थे आदिवासी वही है जो अपनी परंपरा, रीति-रिवाज और सामूहिक जीवन को निभाता है। हमारे पुरखे जब महुआ के फूल से दारू बनाते थे, जब साल के पत्तों से थाली गढ़ते थे, जब मांदर की थाप पर नाचते थे तब उन्होंने संविधान नहीं पढ़ा था। उन्होंने सिर्फ यह जाना था कि हम आदिवासी हैं, हमारी पहचान हमारी परंपरा है।

लेकिन देखो, कुछ लोग खुद को कभी हिंदू, कभी ईसाई कहकर गर्व महसूस करते है, और आदिवासी होने का दावा करते हैं। अरे, अगर तुम सच में आदिवासी हो तो फिर मांदर की थाप पुरखों की रीति रिवाज क्यों भूल गए? तुम किसे धोखा दे रहे हैं? जंगल की मिट्टी को? अपने पुरखों को? या खुद अपनी आत्मा को, अगर तुमने अपने रीति-रिवाज छोड़ दिए, तो अदालत भी कह रही है तुम्हें आदिवासी मानने का हक खत्म हो जाएगा। जब अदालत भी तुम्हें आदिवासी मानने से इंकार कर देगी, तब तुम्हारे बच्चों को कौन बचाएगा मंदिर का पुजारी या चर्च का पादरी?”

सच्चाई यह है, कि आदिवासियों को जंगल की मिट्टी से पहचान मिलती है, किसी धर्म की किताब से नहीं। तुम चाहे मंदिर में आरती करो या चर्च में प्रार्थना करो, अगर मांदर की थाप पुरखों की रीति रिवाज भूल गए तो आदिवासी कहलाने का अधिकार खो दोगे। याद रखो, संविधान ने हमें अनुसूचित जनजाति कहा है, किसी धर्म का उपनिवेश नहीं। हमारी ताकत जंगल है, हमारी पहचान परंपरा है, और हमारी आत्मा सामूहिकता है।

अगर हम अपनी रीति रिवाज,संस्कृति,परम्परा,भाषा छोड़ देंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी – “हम कौन थे?” और हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा।

इसलिए, चाहे आप खुद को हिंदू कहें या ईसाई, यह आपका अपना व्यतिगत धार्मिक मामला है। मगर अपनी आदिवासी आत्मा को मत छोड़िए। यही आत्मा हमें संविधान में अधिकार दिलाती है, यही आत्मा हमें एक-दूसरे से जोड़ती है, और यही आत्मा हमें आने वाले संघर्षों में जीत दिलाएगी।

हम सब मिलकर यह संकल्प लेना होगा चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, हम अपनी आदिवासी आत्मा को जीवित रखेंगे। यही हमारी असली ताकत है, यही हमारी संविधानिक सुरक्षा है, और यही हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है।

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अंकित पोटई कोयतोर

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