देश का सर्वोच्च न्यायालय ने अब जनता का विश्वास खो दिया है
साक्ष्य और सबूत नहीं बल्कि जजों की इच्छा के अनुसार हो रहा है फैसला और इसके पीछे सट्टा का दबाव सिद्ध हो चुका

जस्टिस चंद्रचूड़ के खुलासे के बाद अब स्पष्ट हो चुका है कि अयोध्या मामले में साक्ष्य और दस्तावेज के बिना फैसला हुआ है पूर्व CJI जस्टिस चंद्रचूड़ के हाल के इंटरव्यू को सुनकर लगता है कि जजों के रिटायर होने के बाद, उनके इंटरव्यू पर बैन लगा देना चाहिए। कम से कम, उस जज के द्वारा सुनाए गए फैसले के बार में बोलने पर पाबंदी तो होनी ही चाहिए! यह देश और न्यायपालिका दोनों के हित में होगा!
अयोध्या मामले में फैसला सुनाने वाले पांच जजों में एक जज जस्टिस चंद्रचूड़ भी थे। पूर्व सीजेआई जस्टिस रंजन गोगोई उस बेंच को हेड कर रहे थे। न उन्होंने कुछ उस फैसले पर टिप्पणी की, न जस्टिस बोबडे ने, न जस्टिस अशोक भूषण ने और न ही जस्टिस अब्दुल नज़ीर ने। ऐसा नहीं है कि वे कम ज्ञानी हैं। दरअसल आम तौर पर कोई भी जज जिस मामले में फैसला सुनाया होता है, उस बारे में नहीं बोलता है। इसलिए इन लोगों ने अयोध्या फैसले पर कुछ नहीं बोला।
लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ को पता नहीं कैसी चूल मची है कि अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बोले बिना उनको रहा ही नहीं जाता। एक बार बोल गए कि अयोध्या मामले में उन्हें क्या फैसला लिखना था, कुछ सूझ नहीं रहा था तो भगवान के सामने बैठ गए! .. उसके बाद उनकी खूब आलोचना हुई। सफाई देते रह गए कि उनके बयान को ग़लत ढंग से पेश किया गया।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने अयोध्या फैसले को लेकर नया बयान देकर फिर विवाद खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने अपने सर्वसम्मत फैसले में कहा था कि अयोध्या में मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाए जाने का कोई प्रत्यक्ष पुरातात्विक प्रमाण नहीं है। लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ अब बोल रहे हैं कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाया गया था! न्यूज लाउंड्री के पत्रकार श्रीनिवासन जैन के साथ इंटरव्यू में जब जैन ने पूछा कि 1949 में बाबरी मस्जिद में रामलला की मूर्ति अवैध तरीके से रखी गई। यह बात हिंदू पक्ष के खिलाफ क्यों नहीं गई? तब चंद्रचूड़ ने कहा कि इसकी शुरुआत और पहले से होती है, क्योंकि पहले पहल उस जगह पर मस्जिद का निर्माण ‘असल में उस स्थान को अपवित्र करना था’!

श्रीनिवासन जैन ने जस्टिस चंद्रूचूड़ से फिर पूछा कि मस्जिद के नीचे स्थित ढांचे के गिरने के तो बहुत से कारण हो सकते हैं, इससे यह बात कैसे प्रमाणित होती है कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाई गई ? इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि जो भी लोग फैसले की आलोचना कर रहे हैं, असल में वो मस्जिद के वहां होने की सैद्धांतिक वजह को अनदेखा करना चाहते हैं और फिर तुलनात्मक रूप से इतिहास की कुछ चुनिंदा बातों को अपने समर्थन में पेश करते हैं।
एक ऐसे संवेदनशील मसले पर जिसने समाज को बुरी तरह बांट रखा था, उस विवाद को सुप्रीम कोर्ट ने सुलझा दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देश और समाज ने स्वीकार कर लिया। उस फैसले पर इस तरह का बयान देकर जस्टिस चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल खड़ा करने का दोबारा मौक़ा दे रहे हैं! संविधान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों की पैरवी करने वाले व्यक्ति से ऐसी उम्मीद नहीं थी। जस्टिस चंद्रचूड़ की यह छपास की बीमारी देश, समाज और न्यायपालिका, सबको नुकसान पहुंचा रहा है।
( यह समाचार Prabhakar Kr Mishra केवल से साभार लिया गया है )
