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ताम्र, ताम्रकार और तांबट पक्षी

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तांबे की खोज अबसे कोई 11 हज़ार साल पहले हुई मानी जाती है। प्राचीन भारत में सिंधु घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता ने जब दस्तक दी तब तक हमारे पूर्वज पाषाण के साथ ही ताम्र का इस्तेमाल करने में भी दक्ष हो चुके थे।

लगभग उसी दौरान आज के राजस्थान के उदयपुर से कोई तीन मील दूर आयड़, आहड़ या बेड़च नदी के तट पर एक स्वतंत्र संस्कृति विकसित हो चुकी थी।

1953 में अक्षयकीर्ति व्यास, रतन चन्द्र अग्रवाल और हँसमुख धीरजलाल सांकलिया जी के प्रयासों से जब इस स्थल को ढूंढ़ा गया तो कहा गया कि इसका प्राचीन नाम ‘ताम्रवती’ था।

‘ताम्रवती’ कितना सुंदर नाम है। भारत की ज्यादातर मेहनतकश कृषक माताएँ जब आनंदित होकर धूप में खेतों में श्रम करती हैं, तब उनका मुखमंडल स्वाभाविक ही तंबई आभा से दमकने लगता है। ये ताम्रवतियाँ ही ‘भारत माता’ का साक्षात् स्वरूप हैं।

विभिन्न लौहेतर और स्वर्णेतर धातुओं का शोधन कर उन्हें आकार देनेवाले जन ‘ताम्रकार’ कहलाए होंगे, जो कालांतर में उपनाम और जाति के रूप में रूढ़ हो गया होगा।

लेकिन पता नहीं कैसे इस सुंदर पक्षी का नाम ‘तांबट’ पड़ा होगा। यह खासकर दक्षिण-पूर्व एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में ही पाया जानेवाला पक्षी है। तांबट की तर्ज पर ही इन्हें अंग्रेजी में ‘कॉपरस्मिथ’ और नेपाली में ‘तमौटेचरा’ कहा जाने लगा।

अक्सर इन्हें अपनी कोटर से झाँकते हुए देखा जाता है। हमारे प्रकृति-प्रेमी और पक्षी-निहारक मित्र अनिरुद्ध छावजी को भी इन्होंने अपनी कोटर से मुख निकालकर दर्शन दिए। तस्वीर उन्हीं के सौजन्य से है।

अनिरुद्ध और उनके कुछ सुहृदयी मित्र ‘रान मांगली फाउंडेशन’ (Ran Mangli Foundation) की मदद से वन्य प्राणियों के प्रति प्रेम, करुणा और सह-अस्तित्व की भावना का विकास करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।

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अव्यक्त

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