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जान की परवाह किए बिना महामारी में भी मूलभूत जरूरत और छोटी-छोटी मांगों के लिए लोगों को सड़क पर निकलना पड़ा आमाबेड़ा 90 गांवों के हजारों ग्रामीणों को

कांकेर/ आमाबेड़ा ( भूमकाल समाचार ) आश्चर्य है कि आजादी के 74 साल बाद भी अमाबेड़ा क्षेत्र के लोगों को अपने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक एमबीबीएस डॉक्टर की मांग करनी पड़ रही है साथ ही छोटी-छोटी मूलभूत जरूरतें की मांगों को लेकर, तेंदूपत्ता के भुगतान, मजदूरी भुगतान, आदि मांगों को लेकर इस महामारी के दौर में जान जोखिम में डालकर हजारों की संख्या में रैली निकालना पड़ रहा है वह भी उस सरकार के 2 साल बीत जाने के बाद जिसने इन आदिवासियों से विकास का वादा करके चुनाव जीता था ।

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ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि उनके क्षेत्र के अधिकांश गांव ने जिले के बड़े अधिकारियों का चेहरा तक नहीं देखा है । आमाबेड़ा को विकासखंड का दर्जा देने सहित अन्य समस्याओं को लेकर क्षेत्र की 23 पंचायतों के 90 गांव के करीब ढाई हजार ग्रामीण महिला पुरूषों ने प्रदर्शन करते आमाबेड़ा में रैली निकाली। कोरोना के बावजूद आमाबेड़ा में बड़ी संख्या में ग्रामीण जुटे क्योंकि वहां के गांव शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क जैसी सुविधाओं को लेकर बेहद परेशान है। स्टेट बैंक सहित अन्य सरकारी बैंक ना होने की वजह से एक निजी बैंक में ग्रामीणों को खूब मूर्ख बनाया है और सरकारी योजनाओं के तहत खोले जाने वाले खाते में पैसे जमा किए जाने के बाद भी साल भर 6 माह बीत जाने के बाद भी अभी तक इनका खाता तक नहीं खुला है ।

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रैली के बाद मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन भी नायब तहसीलदार आमाबेड़ा को सौंपा गया। प्रदर्शन में प्रमुख रूप से सरपंच संघ अध्यक्ष रमेश मंडावी, अध्यक्ष सर्व समुदाय परगना सहदेव गोटा, जिला पंचायत सदस्य श्यामा पट्टावी, के अलावा जनपद उपाध्यक्ष अंतागढ़, अध्यक्ष सरपंच संघ उपतहसील आमाबेड़ा, अध्यक्ष गोंडवाना समाज आमाबेड़ा, सरपंच फूफगांव, सरपंच धनेली, सरपंच मातला, सरपंच टिमनार आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे।

जानिए, अन्य मांगों में ये हैं प्रमुख
ग्रामीणों का कहना है कि आमाबेड़ा में सहकारी बैंक के अलावा स्टेट बैंक की शाखा खोली जाए। आमाबेड़ा में जब तक बैंक नहीं खुलता तब तक तेंदूपत्ता संग्राहकों तथा सालबीज संग्राहकों को नगद भुगतान किया जाए। आमाबेड़ा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एमबीबीएस डाक्टर की पदस्थापना की जाए। क्षेत्र के अन्य उपस्वास्थ्य केंद्रों आमाबेड़ा, बड़े पिंजोड़ी, तुमसनार, टिमनार, उसेली, तुसकाल, बंडापाल, मेचानार, अर्रा, मुल्ले, निलझर में एमएमआरएचओ के अलावा अन्य स्टाफ पदस्थ किया जाए। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र किसकोड़ो के नाम से अंतागढ़ में पदस्थ कर्मचारियों को किसकोड़ो में ही सेवा देने कहा जाए। गुमझीर एवं बड़े तेवड़ा में नवीन उपस्वास्थ्य केंद्र खोले जाएं। शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय आमाबेड़ा में पूर्णकालिक प्राचार्य पदस्थ किया जाए। हाईस्कूल उसेली, अर्रा, नागरबेड़ा, बड़े पिंजोड़ी, मुल्ले में बालक छात्रावास की स्वीकृति देते भृत्य पदों की नियुक्ति की जाए। आमाबेड़ा क्षेत्र में पेयजल के पर्याप्त प्रबंध किए जाएं। रावघाट परियोजना के तहत खोली गई स्कूल में आमाबेड़ा क्षेत्र के बच्चों को प्राथमिकता दी जाए। आईटीआई में 80 प्रतिशत सीटें स्थानीय को दी जाए। तृतीय तथा चतुर्थ वर्ग की भर्ती में स्थानीय आवेदकों को ही प्राथमिकता दी जाए। जिले में पांचवी अनूसूची लागू की जाए। वन अधिकार अधिनियम 2006-2008 संशोधन नियम 2012 के तहत सामुदायिक दावा पट्टा दिया जाए। नागरबेड़ा, अर्रा, गुमझीर में नए धान खरीदी केंद्र शुरू किए जाएं।
अब इस खबर को पढ़ने वाले नागरिक ही बताएं कि क्या इतनी छोटी मांगे छत्तीसगढ़ राज्य बनने के 20 साल बाद भी पूरे नहीं हो जाने चाहिए थे इसमें अकेले कांग्रेस को ही दोष नहीं दिया जा सकता इस बीच 15 साल बीजेपी ने भी राज करके इस क्षेत्र के ग्रामीणों को लगातार मूर्ख बनाया है ।

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