देश

इतिहास की आकांक्षा-कथा

राजनीतिक सामाजिक जीवन के इतिहास में बहुत कुछ अन्यथा हुआ है लेकिन अपशब्दों और अभिव्यक्तियों ने भी समय समय पर गैरमुनासिब स्पेस ढूंढ़ा है। कई बार गैर मुनासिब अभिव्यक्तियों ने इतिहास भी रच दिया है। मसलन गांधी को आज के पोशाक प्रेमी प्रधानमंत्री के उलट वेशभूषा के कारण चर्चिल ने ‘नंगा फकीर‘ कहा था। तब भी इंग्लैंड के हुक्मरान गुलाम भारत के मोहनदास करमचंद गांधी की सियासी शख्सियत से घबरा गए थे। इंग्लैंड की कड़कड़ाती ठंड में गोलमेज परिषद में गए। गांधी बस आधी टांगों वाली धोती और सूती शॉल ओढ़कर लंदन की सड़कों पर पैदल चले थे। गांधी का वह चित्र अमर है। कथित नंगापन नहीं लेकिन देहात्मा की नग्नता इतिहास का हिस्सा है। यह गांधी ने सिद्ध कर दिखाया। सुभाष बोस पर तो तोजो का कुत्ता और न जाने कौन कौन से फिकरे कसे गए। लेकिन भारत की तरुणाई का वह अग्नि सूर्य कालजयी नारे दे गया। ‘तुम मुझे खून दो। मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा।‘ यह भी ‘गुलामी के घी से आज़ादी की घास बेहतर है।‘ नेहरू को तो एडविना माउंटबेटन से जोड़कर नारंगी विचारधारा ने कई रोमांटिक नाम दिए। मौजूदा राजनीति में पप्पू, फेंकू, पनौती, बार बाला, पचास करोड़ की गर्लफ्रैंड, प्रेस्टिट्यूट, मुंहबली, वोट चोर जैसे अनगनित शब्द पेंगे भरते ही जा रहे हैं। लेकिन इन शब्दों को लेकर कोई अदालत में नहीं गया। गया भी तो कुछ मिला नहीं। सिवाय इक्का दुक्का प्रहसननुमा आदेशों के।

Aakansha Toppo

छत्तीसगढ़ की राजनीतिक फिज़ा में फिलवक्त घोंचू नाम का शब्द सिगड़ी पर रखे अदहन की तरह चुर रहा है। उबलता उबलता पूछता है। मैं तो छत्तीसगढ़ी का शब्द हूं। अभी तक तो सुनता था ‘छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया। अब मुझे कोढ़िया क्यों समझा जा रहा है?‘ जिस छत्तीसगढ़ी का हास्य बल्कि देहाती हास्य उसके ही सपूत हबीब तनवीर ने दुनिया में इस कदर मशहूर कर दिया है कि उसकी टक्कर मुहावरों में ब्रिटिश हास्य के समक्ष होती है। पश्चिम की काॅमेडी की टक्कर में छत्तीसगढ़ का नाचा है। गम्मत है। यहां धरती से उपजे शब्दों की बहार है। छौंक, बघार है। खखार भी है। लेकिन कोई बुरा नहीं मानता। छत्तीसगढ़ियों में अपने पर हंसने की हिम्मत, उदारता और दार्शनिकता भी है। वह क्यों कर धूमिल पड़ने दी जाएगी? उसे बाले रखना ही छत्तीसगढ़ी होना है।

पुराने युग की याद आ रही है। देश में महाभारत का युद्ध क्यों हुआ था। इसलिए कि उस वक्त के निजाम याने कौरव दरबार में दो भाई नायक थे। दुर्योधन और दुःशासन। वे अपने ही चचेरे भाइयों की पत्नी द्रौपदी का भरे दरबार में चीरहरण कर रहे थे। तब द्रौपदी ने क्या कहा था? यही तो कि तुम लोग एक स्त्री के साथ अन्याय कर रहे हो सत्ता की हविश में। सत्ता किसी की स्थायी नहीं होती। मेरे पति किसी शर्त से बंधे नामर्दों की तरह चुप हैं। लेकिन मैं भारत की नारी हूं। जहां स्त्री को देवी की तरह पूजा जाता है। मैं ऐलानिया कहती हूं। यह अंधी हकूमतशाही है और तुम दोनों भाई जो मेरी आबरू लूटना चाहते हो। तुम लोग तो अंधे की औलाद हो। अंधे औलाद कहा था द्रौपदी ने। लेकिन याद रहे। दुर्योधन और दुःशासन चाहे जितने खराब रहे हों। द्रौपदी की गाली के खिलाफ हस्तिनापुर के थानेदार को एफआईआर नहीं की थी। वे एक स्त्री से डरकर थानेदार की मदद नहीं लेना चाहते रहे थे। जिसकी नियुक्ति उन्होंने खुद की होगी। यही है भारतीय न्याय परंपरा। एक युवती ने जनसेवा के उन्माद में आकर ऐसा घोंचू कह दिया। जो आपको चुभ रहा है। उसे दुर्योधन और दुःशासन की तरह अपनी छाती पर सहकर जज्ब क्यों नहीं करते? थानेदार की मदद से जनउन्माद को डराना क्यों चाहते हैं? थानेदार को इतिहास का नायक कभी नहीं बनाया जाता। अजीब दौर है। सत्ता में रहकर भी ईडी, सीबीआई, इन्कम टैक्स, पुलिस और चुनाव आयोग के कंधे पर रखकर सियासी बंदूक चलाई जा रही है! सुप्रीम कोर्ट भी कहां है? धृतराष्ट्र ही तो सुप्रीम कोर्ट थे। द्रौपदी ने उनसे दो वर मांगे थे कि मेरे पति सत्यवादी युधिष्ठिर की मुक्ति करें और सभी पांडवों और उनके शस्त्रों की मुक्ति करे। जो उसे मिला। काश कि सुप्रीम कोर्ट से भी जनता को इसी तरह न्याय मिलता रहे। तो बहुत सा बखेड़ा अपने आप दम तोड़ता रहे। मेरे बौद्धिक गुरु असाधारण बुद्धिजीवी राममनोहर लोहिया ने द्रौपदी पर अमर आख्यान किया है।

मैं उन आदिवासी मां बाप की याद में प्रणाम करता हूं जिन्होंने राजरानी गांधारी और कुंती के बदले द्रौपदी नामकरण किया। इतिहास ने अहसान मानकर उसे द्रौपदी मुर्मू कहते भारतीय संविधान का रक्षक नियुक्त किया है। यही संविधान कथा की आकांक्षा है। अपने से कमजोर आदमी को सल्तनत दिल्ली में लाल लाल आंख दिखा सकती है। लेकिन लाल भाजी खाने का जो सुख छत्तीसगढ़ को है। दिल्लीवासियों को कहां नसीब है। हर जगह की अपनी कोई फितरत फसल, भाषा, बोली, अभिव्यक्ति होती है। खुद पर हंसने का शऊर होता है। बार बार गलती करने का इत्मीनान भी होता है। सब कुछ भुलाकर गलबहियां करने का छत्तीसगढ़ी आनंद बिल्कुल अलग तरह का है। मन में कलुश रखना अच्छे नेताओं का लक्षण नहीं है। राजनीति को खेलो। उसे दूकान मत बनाओ। हथियार मत बनाओ। उसको तन में खून की तरह बहाओ। मवाद की तरह मत रखो।

आदरणीय मंत्रियों! कुदरत ने ही सभी मनुष्यों को तीन द्रव दिए हैं। आंसू, खून और पसीना। इन्हें जनता के लिए बहाओ। इनको दलालों और व्यापारियों की तिजोरी में बंद मत करो। नौजवान युवती पर अपनी एक उंगली मत उठाओ क्योंकि कुदरत के मुताबिक तीन उंगलियां अपने आप तुम्हारी ओर उठने लगेंगी। शब्द तो हवा में, ईथर में घुल जाते हैं। उनको पकड़ने की कोशिश क्यों करते हो? जेन जी पीढ़ी को उसकी जुबान में खेलने दो। आपने मंत्री के रूप में संविधान की शपथ ली है। उसे रोज सुबह उठकर पढ़ा करो। जनता ने संविधान के अनुच्छेद 51 (क) में अपने मूल कर्तव्य पढ़े हैं। जनता पालन कर रही है। आकांक्षा टोप्पो ने निजी हैसियत में नहीं जनता की रहनुमाई करते, जनता के वास्ते कुछ कहा है। तो हमारी छत्तीसगढ़ी परंपरा के मुताबिक उसे सजा देने के बदले ‘दूध भात‘ बोल दो। और क्या?

बहादुर पुरखों ने हमारा संविधान रचा। उस बहस में एक जांबाज सदस्य के. टी. शाह ने कहा था ये जो उद्योगपति हैं। व्यापारी हैं। काॅरपोरेट हैं। ये तो देश की दौलत। जनता की दौलत के खून के प्यासे हैं। रक्तपिपासु हैं। अंगरेजी में कहा था ब्लड सकर हैं। लेकिन किसी भी उद्योगपति ने पुलिस थाने में रपट नहीं लिखाई। सब कुछ सुन, सह लिया। अगर उस बात को आज के संदर्भ में कहें। तो यही अर्थ तो निकलेगा कि हमारे संविधान निर्माताओं के नज़रिए से ये रक्त पिपासु हैं। जनता का खून पी रहे हैं। तब भी उम्मीद की जाती है कि जनता के रिटायर्ड तोते तो घरघुस्सू रहें। और अपने नौजवान बच्चों को भी आसमान में उड़ने से मनाही कर दें। यह तो खामखयाली है। जिनके पंख निकल रहे हैं। उन्हें उड़ने से कौन रोक सकता है। जो मारने की कोशिश करता है। वह बहेलिया है। ऐसे ही एक बहेलिए ने क्रौंच पक्षी को मार दिया था। तब ही आदि कवि वाल्मीकि ने भारतीय कविता का पहला छंद लिखा था। कविता की शुरुआत नौजवानों के दमन के कारण हुई थी। मैं तो अपनी छत्तीसगढ़ महतारी की सरगुजा की धरती में एक चिड़िया को आसमान में उड़ते हुए देख रहा हूं।

कनक तिवारी जी की पोस्