इज़राइल और अमेरिका के ईरान परहमले का भारत पर क्या असर होगा ?

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह का विश्लेषण
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के तुरंत असर साफ दिख रहे हैं।
लगभग 90 लाख भारतीय नागरिक वहाँ रहते और काम करते हैं। अब वे इस बढ़ते युद्ध के बीच फंस गए हैं। ये लोग सिर्फ़ संख्या नहीं हैं – ये भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का बहुत बड़ा सहारा हैं। इन कामगारों से आने वाली रकम (रेमिटेंस) भारत की कुल रेमिटेंस का कम से कम 38% हिस्सा है। यह पैसा केरल, उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में लाखों परिवारों के लिए बहुत ज़रूरी है।
पश्चिम एशिया भारत के माल का लगभग 15% खरीदता है। इज़राइल अब भारत को सेंसर, मिसाइल, ड्रोन और एयर डिफेंस हथियार देने वाले बड़े आपूर्तिकर्ताओं में से एक बन गया है। यूएई, सऊदी अरब और कतर अब भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर, रियल एस्टेट और टेक्नोलॉजी में निवेश कर रहे हैं। वहाँ के सॉवरेन वेल्थ फंड बड़े-बड़े भारतीय कंपनियों में हिस्सेदार बन चुके हैं।
नई दिल्ली हमेशा कहती है कि पश्चिम एशिया भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र है। भारत की सुरक्षा सिर्फ़ कांडला या कोच्चि से नहीं, बल्कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य और बाब-एल-मंदब से शुरू होती है।
अब यह पूरा क्षेत्र खतरे में है। अगर खाड़ी में मिसाइल और ड्रोन हमले बढ़े तो तेल (ब्रेंट) और एलएनजी की कीमतें बहुत तेज़ी से बढ़ेंगी – चाहे जलडमरूमध्य बंद हो या न हो। अभी से जहाज़ों में डर के कारण देरी हो रही है, बीमा और फ्रेट की लागत बढ़ गई है। भारतीय रिफाइनरी को कागज़ पर तो सप्लाई मिलेगी, लेकिन असल में खाड़ी के देश राजनीतिक सुरक्षा देखकर तेल दूसरी जगह भेज सकते हैं। क्रूड से लेकर कंटेनर तक सबके लिए शिपिंग महंगी हो जाएगी। भारतीय हवाई जहाज़ सीधे पश्चिम नहीं जा सकते क्योंकि पाकिस्तान के ऊपर से रास्ता बंद है। हजारों भारतीय यात्री वहाँ के एयरपोर्ट पर फंसे हुए हैं।
दूसरी तरफ के खतरे (जो कम दिखते हैं लेकिन गहरे हैं)
• खाड़ी में काम कम होने से नई नौकरियाँ घटेंगी, पुराने कामगारों पर भी दबाव बढ़ेगा।
• रेमिटेंस कम होने से गाँवों में खर्च घटेगा, जो पहले से ही मुश्किल में है। राज्य सरकारों को भी नुकसान होगा।
• इंजीनियरिंग सामान, प्रोसेस्ड फूड, ज्वेलरी जैसे निर्यात में ऑर्डर रुक सकते हैं या कम हो सकते हैं।
• स्टॉक मार्केट में खाड़ी और इज़राइल से आने वाला पैसा कम हुआ तो शेयरों के दाम गिर सकते हैं।
भारत सरकार की प्रतिक्रिया:
हमले की खबर आने के कुछ घंटों में ही विदेश मंत्रालय ने बयान दिया:”भारत ईरान और खाड़ी में हो रही घटनाओं से बहुत चिंतित है। सभी पक्ष संयम बरतें, तनाव न बढ़ाएँ, नागरिकों की सुरक्षा का ध्यान रखें। बातचीत से समस्या सुलझाएँ और संप्रभुता का सम्मान करें।”
लेकिन इस बयान में:
• न अमेरिका का नाम लिया, न इज़राइल का
• हमले को गलत नहीं कहा
• ईरान में लड़कियों के स्कूल और घरों पर बमबारी की निंदा नहीं की
• खामेनेई की हत्या का ज़िक्र नहीं किया
• ट्रंप और नेतन्याहू के ईरान में सरकार बदलने के बयान पर कुछ नहीं कहा
यह रवैया भारत के “ग्लोबल साउथ के लीडर” होने के दावे से मेल नहीं खाता। ईरान अब BRICS का सदस्य है और भारत इस समय BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। फिर भी भारत ने साफ़ तौर पर कुछ नहीं कहा। यह सावधानी नहीं, बल्कि डरपोकपन है।
मोदी सरकार पहले भी ट्रंप के दबाव में ईरान से सस्ता तेल खरीदना बंद कर चुकी है। चाबहार बंदरगाह प्रोजेक्ट भी ट्रंप की धमकियों के कारण रुका हुआ है।
भारतीय कंपनियों ने 30 साल से खाड़ी देशों के साथ गहरे रिश्ते बनाए हैं। वे यह मानकर चल रही थीं कि भारत सरकार भू-राजनीतिक जोखिम को कम करेगी। लेकिन अब सरकार की नीति जोखिम को और बढ़ा रही है।
यह रणनीतिक स्वतंत्रता नहीं है – यह जोखिम बढ़ाने वाली नीति है।
सवाल यह नहीं है कि भारत अमेरिका या इज़राइल को नाराज़ कर सकता है या नहीं।सवाल यह है कि क्या भारत एक युद्धग्रस्त पश्चिम एशिया का बोझ उठा सकता है…???Sheetal P Singh
