छत्तीसगढ़राजनीति

लखमा का वनवास या रणनीतिक घेराबंदी

पड़ोसी राज्य सरकारे कवासी के राह में रोड भी अटका सकती है.?

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बस्तर के कद्दावर नेता विधायक कोंटा कवासी लखमा के लिए कोर्ट का ताज़ा फैसला न केवल एक कानूनी प्रक्रिया है, बल्कि छत्तीसगढ़ की सीमावर्ती राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत भी है। लखमा को छत्तीसगढ़ से बाहर रहने की शर्त पर ओडिशा के मलकानगिरी को चुनना, उनकी गहरी राजनीतिक सूझबूझ और ‘जमीनी पकड़’ को बनाए रखने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा नजर आता है।

“मलकानगिरी ही क्यों?”
भौगोलिक दृष्टि से देखें तो सुकमा जिला मुख्यालय से सटा मलकानगिरी लखमा के लिए किसी ‘रिमोट कंट्रोल’ से कम नहीं है।
कोंटा विधानसभा की सीमाएं ओडिशा और आंध्र प्रदेश से लगती हैं। मलकानगिरी में रहकर वे छत्तीसगढ़ की सीमा के बेहद करीब रहेंगे।ओडिशा के रास्ते वे आंध्र प्रदेश की सीमाओं तक बिना किसी तकनीकी रोक-टोक के आवाजाही कर सकते हैं! जिससे कोंटा के अंतिम छोर पर बैठे समर्थकों से उनका संपर्क बना रहेगा।यह उन लोगों के लिए कड़ा जवाब है जो मान रहे थे कि राज्य से बाहर रहने की शर्त लखमा को अप्रासंगिक कर देगी।


हालांकि, यह रास्ता कांटों भरा भी है। लखमा के लिए राह जितनी भौगोलिक रूप से आसान दिखती है, उतनी ही राजनीतिक रूप से जटिल है! ओडिशा में वर्तमान में भाजपा की सरकार है। ऐसे में लखमा की सुरक्षा और उनकी गतिविधियों पर सरकार की पैनी नजर रहेगी। संभावना है कि प्रशासन उनके ‘जन-संपर्क’ में सुरक्षा के नाम पर रोड़े अटकाए।

दूसरी ओर, आंध्र प्रदेश में टीडीपी की सरकार की मौजूदगी है जो भाजपा गठबंधन की सरकार होने के चलते है। कोंटा से लगे सीमावर्ती इलाकों में भी कवासी की राह आसान न हो सके.? कवासी लखमा जैसे नेता को उनकी कर्मभूमि से दूर रखना आसान है, लेकिन उनकी राजनीति को थामना मुश्किल लगता है।कवासी लखमा ने मलकानगिरी को चुनकर यह साफ कर दिया है कि वे भले ही छत्तीसगढ़ की मिट्टी से दूर रहें, लेकिन कोंटा की नब्ज पर उनकी पकड़ ढीली नहीं होने वाली! मैने अपनी पिछली पोस्ट में लिखा था की कवासी लखमा मलकानगिरि को पहली प्रथमिकता दे सकते है।आज कोर्ट ने मलकानगिरी पर आखिरकार अपनी मोहर लगा दी.✍️
(दिनेश शर्मा)